Friday, July 04, 2008

राष्ट्रहित की धूम

इन दिनों पूरे देश में राष्ट्रहित की धूम मची है. यह सब कुछ.कुछ वैसा ही है, जैसा कारगिल युद्ध और उससे पहले परमाणु परीक्षणा के दिनों में हुआ करता था. आजकल देश की हर बङी राजनीतिक पार्टी, राजनीति के बदले राष्ट्रहित करने का दावा करने लगी है और राष्ट्रहित के नाम पर एक दूसरे को गलत साबित करने में जुट गई है. अब जैसे लोहियाजी के आदर्शों पर चलने का दावा करने वाली समाजवादी पार्टी के मुताबिक परमाणु करार के लिए यूपीए के साथा हो जाना राष्ट्रहित है, अपने पक्ष में उसने पूर्व राष्ट्रपति कलाम तक से सहमति ले ली है।गुरुवार की शाम से इस पार्टी के प्रवक्ता ऐसा बयान तक जारी करने लगे हैं. हालांकि जैसा माननीय मुलायमजी ने अपना रेपुटेशन बना रखा है, लोग किसी भी सूरत में उन्हें और उनके महासचिव अमर सिंह के राष्ट्रहित पर भरोसा नहीं करते, यह बात दोनों महाशयों को भी मालूम था, इसलिए दोनों ने इसमें कलामजी का एंगिल भी फिट करवा लिए. ऐसे में देश की बहुसंख्यक उत्साही जनता ने भी मानना शुरू कर दिया कि राष्ट्रहित एशिया कप जीतने में नहीं बल्कि परमाणु करार में ही है.
मगर आज दोपहर वामपंथियों ने फिर से पूरे देश को कंन्फयूज कर दिया. लंम्बी चौङी बैठक के बाद उनके नेता प्रकाश करात ने घोषणा कर दी कि इस राष्टविरोधी सरकार से समर्थन तो वापस लिया ही जाएगा, 14 अप्रैल से पूरे देश में अभियान चलाकर लोगों को बताया जाएगा कि परमाणु करार किस तरह राष्टहित के खिलाफ है. वैसे तो अपने देश की आबादी का बङा हिस्सा मानता है कि वामपंथी जो कहते हैं सच अक्सर उसके उलट होता है, यानी अगर वे करार को राष्ट्रहित के खिलाफ बता रहे हैं, तो मुलायम की बातों में कुछ न कुछ सच्चाई जरूर होगी. कुछ प्रगतिशील जनता के लिए आज भी वाम का स्टैंड ही अंतिम सत्य होता है. लिहाजा राष्ट्रहित के सवाल पर वे कुछ कन्फूज हो गए. अगर कन्फ्यूजन सिर्फ इतना ही होता तो चल जाता, मगर इन सब के पैरलल देश की एक और बङी राजनीतिक शक्ति ने अलग कन्फ्यूजन फैला रखा है कि राष्ट्रहित का परमाणु करार से कोई लेना देना नहीं, न इसके समर्थन से न ही इसके विरोध से. राष्ट्रहित का संबंधा अगर किसी बात से है तो वह श्राइन बोर्ड की जमीन पर उठे विवाद से है. हम सबों को श्राइन बोर्ड की जमीन छीने जाने की साजिश का मुकाबला करना चाहिए, वह भी राष्ट्रहित में-

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