Saturday, June 13, 2009

महारास्ट्रेलियाई मानसिकताएं

कुछेक साल पहले की बात है, उन दिनों महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान प्रचार के सिलसिले में मुम्बई में एक जनसभा को संबोधित कर रहे थ्ो। उस जनसभा में पासवान ने महाराष्ट्र के लोगों की तारीफ में कसीदा गढ़ते हुए कह दिया था कि अरे हम लोग तो राष्ट्र में रहते हैं आप लोग महाराष्ट्र में रहते हैं। अगर इस बार के विधानसभा चुनाव के दौरान खुदा ना खास्ता आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री मुम्बई पहुंच गए तो वे भी पासवानजी के तर्ज में ही कहेंगे। अरे हम तो आस्ट्रेलियाई हैं आप लोग तो महारास्ट्रेलियाई हैं।
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खैर यह तो एक चुटकुला था, अब जरा मुद्दे की बात हो जाए। पिछले दिनों हमने शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे का एक तड़कता-भड़कता बयान सुना कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को कड़े कदम उठाते हुए आस्ट्रेलियाई क्रिकेटरों के आईपीएल में भाग लेने पर रोक लगा देना चाहिए। संदर्भ था भारतीय छात्रों के साथ आस्ट्रेलियाई धरती पर दुर्व्यवहार और मारपीट की घटनाएं। काफी दिनों बाद सेना प्रमुख के इस बयान से उनके उग्र राष्ट्रवाद समर्थक तेवर की याद ताजा हो गई और उन्हें पूरे देश में एक खास तबके से अच्छी-खासी सराहना मिली। बिहार के लोगों ने भी सीनियर सरकार के इस बयान पर जमकर तालियां पीटीं। उस वक्त लोगों ने इस बात को भुला दिया कि यह इसी ठाकरे परिवार के विषवृक्षों का कारनामा है जिसके कारण महज चंद माह पहले महाराष्ट्र की सड़कों पर बिहार के लोगों के साथ मारपीट, उनके प्रतिष्ठानों में तोड़फोड़ और लूट-पाट की गई थी। क्या वे घटनाएं आस्ट्रेलिया में इन दिनों होने वाली घटनाओं से अलग थीं? क्या दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं एक जैसी नहीं थीं, सिवा इसके कि आस्ट्रेलिया की घटनाओं की जड़ में नस्लवाद के कीटाणु हैं और महाराष्ट्र के उपद्रवों के पीछे भाषावाद के। इन हालातों में भूतपूर्व कार्टूनिस्ट और वर्तमान राजनेता बाल ठाकरे को ऐसे बयान जारी करने का क्या हक बनता है? क्या वे ऐसा कहकर खुद कार्टूनिस्ट से कार्टून में तब्दील नहीं हो गए हैं? और सबसे बड़ी बात तो यह कि बिहार के लोगों ने उनके इस बयान पर आपत्ति दर्ज कराकर उन्हें हिप्पोक्रेट नहीं कहा तो ऐसा लगा कि सूचना क्रांति के इस दौर में लोगों की याददास्त कमजोर होती जा रही है। मगर महाराष्ट्र के लोगों ने एक बार फिर अपनी भावनाओं से अवगत कराकर उन यादों को ताजा कर दिया है। इस बार भाषावाद का विद्बेष फैलाने की जिम्मेदारी राज ठाकरेनुमा मुम्बइया टपोरियों ने नहीं पुणे लॉ इंस्टीच्यूट की प्रवेश परीक्षा में साक्षात्कारकर्ता की महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बुद्धिजीवी तबके ने ली है। उन्होंने इंटरव्यू के दौरान बिहार के छात्रों से ऐसे-ऐसे सवाल किये कि छात्रों को यह सोचने पर विवश होना पड़ा कि वे कैसे यहां आ फंसे। उनके सवालों की बानगी तो देखिए- क्या आप इस बात से सहमत हैं कि बिहार देश का क्राइम कैपिटल है? क्या बिहार के बारे में राज ठाकरे की मानसिकता से आप सहमत हैं? क्या बिहार के लोग अपराध को अंजाम देने के इरादे से यहां नहीं आते? छात्रों ने अपने तरीके से उन लोगों की मनोवृत्ति बदलने की भरपूर कोशिश की मगर असफल रहे। हालांकि उनलोगों को यह बताने की जरूरत थी कि दाउद इब्राहिम, अरुण गवली, छोटा राजन जैसी विभूतियों को हमने नहीं पैदा किया है और न ही क्राइम के इरादे से आपके पास भ्ोजा है। अगर इन्हीं उदाहरणों पर गौर किया जाए तो देश के क्राइम कैपिटल की उपाधि मुम्बई छोड़कर किसी और को नहीं सौंपी जा सकती है। हमारी केंद्रीय सरकारों ने हमेशा बिहार से जफा और पंजाब, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों से वफा की। उसी का नतीजा है कि आज बिहार में बेहतर शिक्षण संस्थानों और रोजगार के अवसरों की कमी है। ऐसे में हमें दूसरे राज्यों की शरण लेनी पड़ती है। मगर इसका अर्थ यह नहीं कि अपने ही देश में कोई हमसे दुर्व्यवहार करे। हमारे साथ ऐसे दुर्व्यवहार होते रहने का एक बड़ा कारण हमारे राजनेता भी रहे हैं। उन्होंने या तो इन बातों पर ध्यान ही नहीं दिया या फिर इसके जरिये राजनीतिक रोटियां सेंकने की कोशिश की। पहली बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ने इस मामले में कड़ा और बेहतर स्टैंड लिया है। उन्होंने सूचना मिलते ही गृहमंत्री पी.चिदंबरम और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चाह्वान को पत्र लिखकर अपनी नाराजगी से अवगत करा दिया और कड़ी कार्रवाई का अनुरोध किया। उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से खासतौर पर यह अनुरोध किया है कि वे इस मामले में अपील जारी करें ताकि उनके राज्य में बिहार के लोग सुरक्षित महसूस करें और ऐसे विघटनकारी तत्व हतोत्साहित हों। इस मामले में अब निश्चित तौर पर ठोस कदम उठाने और बिहार के सभी राजनेताओं द्बारा एकजुट होकर दोनों सरकारों पर दबाव बनाने से ही सकारात्मक बदलाव होंगे।

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