Sunday, August 08, 2010

क्रिकेट के भगवान और अंधभक्त मीडिया


मीडिया सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट का भगवान मानता है और उसकी पूजा के लिये बहाने ढूंढता है. और अपनी इस कोशिश में कई बार मीडिया इतना अतार्किक हो जाता है कि उसपर हंसने की भी इच्छा नहीं होती.

संदर्भ, कोलंबो में कल भारत की जीत पर मीडिया की प्रतिक्रिया से संबंधित है. मैच के बाद देश के दो प्रमुख चैनलों ने इस जीत पर विशेष कार्यक्रम चलाया जिनका नाम उन्होंने रखा था, जीत के त्रिदेव और त्रिदेव का कमाल या ऐसा ही कुछ. दोनों कार्यक्रमों का मानना था कि यह जीत हमें तीन खिलाड़ियों की बदौलत मिली है, सचिन, सहवाग और लक्षमण. देख कर बड़ा अश्चर्य हुआ कि लक्षमण जिन्होंने शतक लगाकर टीम को जीत दिलाई उनका योगदान समझ आता है, सहवाग जिन्होंने पहली पारी में शतक लगाया और दूसरी पारी में तीन विकेट झटके उनका योगदान भी समझ आता है, मगर सचिन ? उन्होंने तो आखिर पारी में महज फिफ्टी लगाई थी, उन्हें क्यों त्रिदेव में शामिल किया जा रहा है.

उनसे बड़ा योगदान तो प्रज्ञान ओझा का था जिन्होंने शानदार गेंदबाजी करते हुए मैच में सात विकेट झटके. अगर त्रिदेव बनाना ही था तो प्रज्ञान हकदार थे, मगर हमारी मीडिया ने शामिल किया सचिन को, जबकि मैच में उनसे ज्यादा रन तो सुरेश रैना ने बनाये हैं. पहली पारी में 62 और दूसरी में 41. रैना का यह जीवन का दूसरा मैच है जबकि इस मैच के साथ वे दुनिया में सबसे अधिक टेस्ट खेलने वाले खिलाड़ी बन गये हैं. सचिन ने तो पहली पारी में 41 और दूसरी पारी में 54 रन बनाये हैं. क्या अमित मिश्रा का योगदान सचिन से अधिक नहीं है जिन्होंने चार विकेट भी झटके और 40 रनों की अविस्मरणीय पारी भी खेली जिसकी बदौलत भारत श्रीलंका से लीड ले सका. क्या अभिमन्यू मिथुन का योगदान अधिक नहीं जिन्होंने गेंदबाजी तो शानदार की ही जरूरत पड़ने पर शानदार 46 रनों की पारी भी खेली.

मगर नहीं, हमारी मीडिया की नजरों में इन पारियों का कोई योगदान नहीं. उसे तो बस अपने देवता को खुश करना था इसलिये चोर दरवाजे से उसकी एंट्री करवा दी और लक्षमण व सहवाग के साथ फेंट कर उसे भी त्रिदेवों में शामिल करा दिया. दरअसल मीडिया एक दिन पहले से अपने इस भगवान के गुणगान की तैयारी में जुटा था. चौथे दिन जब भारत का स्कोर 3 विकेट पर 53 रन ही था तो मीडिया ने घोषणा कर दी थी कि अब टीम इंडिया की लाज भगवान भरोसे है, यानि सचिन के भरोसे. भगवान चले तो ठीक वरना भारत की हार तय है. मगर भगवान नहीं चले, चले वीवीएस लक्षमण. इस पर कुछ टीवी वालों ने इस तरह पैकेजिंग की कि राम का काम लक्षमण ने किया, मगर कइयों का इससे जी नहीं भरा तो उन्होंने भगवान को घुसा कर त्रिदेव बना डाला.

सोचने वाली बात है कि अगर कल के मैच में सचिन ने शतक और लक्षमण ने अर्धशतक जड़े होते तो क्या हमारी मीडिया लक्षमण को याद करती? ऐसे में तो शायद मीडिया सहवाग तक को भूल जाता और घंटे-दो घंटे सचिन के ईश्वरत्व पर प्रवचन होता व्याख्या होती. अभी इसी मैच में सहवाग ने अपने टेस्ट केरियर के सात हजार रन पूरे किये. मैचों के मामले में यह सबसे तेज था और पारियों के मामले में यह दूसरे नंबर पर था मगर मीडिया में इसकी ठीक से चर्चा तक नहीं हुई, मगर पिछले मैच में जब सचिन ने दोहरा शतक जड़ा तो पूरी मीडिया उसकी दीवानी हो गई.

यहां गौरतलब है कि सचिन से आधे मैच खेलकर सहवाग ने सचिन से ज्यादा दोहरे शतक जड़े हैं और जब तिहरे शतक का जिक्र होता है तो पूरे भारत में इसे इंज्वाय करने वाले अकेले सहवाग ही नजर आते हैं. उन्होंने यह कारनामा दो बार किया है जबकि सचिन इसे एक बार करने के लिये भी तरसते रहते हैं. इसके बावजूद मीडिया सहवाग को सचिन के क्लोन के रूप में याद करती है. यह सचमुच हिप्पोक्रेसी की हद है.

1 comment:

पशुपति शर्मा said...

भगवान के प्रति अतिरिक्त आस्था कोई नई बात नहीं। अगर दूसरों के कर्मों का क्रेडिट भगवान के खाते में न डाला जाए तो भगवान का प्रभामंडल कम न पड़ जाए। कुछ ऐसा ही सचिन के मामले में भी है। सचिन के लिए न्यूज 24 पर भी एक कार्यक्रम बनाया गया सचिन चरित मानस, जो ऐसे ही मौकों की तलाश में रहता है।