Tuesday, August 10, 2010

विभूति से बड़े विभूति बनने लगे हैं लोग


मोहल्ला पर विभूति प्रकरण हंगामेदार होते जा रहा है, इस हंगामे के कारण इस मुद्दे पर किसी सार्थक बहस की गुंजाइश लगभग खत्म हो चुकी है. इसी संदर्भ में मैंने मुहल्ले पर एक टिप्पणी के जरिये बहस को मोड़ने की कोशिश की मगर असफल रहा...

मोहल्ला में प्रकाशित....

मैत्रेयी ने नया ज्ञानोदय से अपनी रचना मंगवाई


किसी पुष्‍यमित्र ने मोहल्‍ला लाइव की कुछ पोस्‍ट पर टिप्‍पणी की है कि नया ज्ञानोदय के अगले “सुपर बेवफा विशेषांक” में मैत्रेयी पुष्‍पा की रचना छप रही है। उन सज्‍जन ने मौजूद प्रसंग में अपना गुस्‍सा जाहिर कर रहे लोगों से थोड़ा इंतजार करने की बात की। इस किसी और ने प्रतिक्रिया दी कि शायद मैत्रेयी पुष्‍पा नया ज्ञानोदय से अपनी रचना वापस ले चुकी हैं। यह सच है – क्‍योंकि मै‍त्रेयी पुष्‍पा ने मोहल्‍ला लाइव को फोन करके बताया कि यह जो दुष्‍प्रचार चल रहा है, उसके पीछे कालिया एंड कंपनी का हाथ है। मैंने एक अगस्‍त को ही उन्‍हें ईमेल करके अपनी रचना वापस मांग ली है। मैत्रेयी जी ने यह भी कहा कि नया ज्ञानोदय अब इस लायक नहीं है कि वहां हम जैसे लेखक अपनी रचना छपने के लिए दें।
दरअसल बेवफा विशेषांक में स्‍त्री लेख‍िकाओं को टार्गेट करने के मसले पर मै‍त्रेयी लगभग जंग की मुद्रा में हैं। विभूति नारायण राय के एक गर्हित बयान और उस बयान को बेबाक कहने की कालिया की संपादकीय दृष्टि के खिलाफ उनके नेतृत्‍व में देश भर के युवा रचनाकार जुट रहे हैं। इस बारे में अगले कार्यक्रम की सूचना के लिए इस लिंक पर जाएं : लेखकों ने “लंपट” वीसी के खिलाफ मुहिम तेज की

मेरी टिप्पणी....


रवींद्र कालिया जी से मेरा कोई व्यक्तिगत परिचय नहीं, उनकी शराबी की डायरी को भी मैनें नहीं छुआ है. क्योंकि इस तरह के साहित्य को समझ पाने लायक बुद्धि मुझे ईश्वर ने नहीं प्रदान की है. ज्ञानोदय के सुपर वेबफाई अंक में छपे विज्ञापन में देखा कि मैत्रेयीजी की रचना वहां प्रकाशित हो रही है, उन्होंने भी सुपर बेवफाई अंक के लिये ज्ञानोदय को कुछ भेज रखा है. आप सभी पाठकों को इसी खातिर मैंने यह सूचना दी. अब पता चला कि उन्होंने अपनी रचना मंगवा ली है.
वैसे मैं भी आप लोगों की तरह विभूति बाबू के शब्दाभिचार का विरोधी हूं. मोहल्ला के सिग्नेचर अभियान में जिन गिने चुने लोगों के हस्ताक्षर थे उनमें इस नाचीज का भी नाम है.
मगर इसका यह अर्थ कतई नहीं कि मैं मैत्रेयीजी की रचनाओं और उनकी रचनाशीलता का आदर करता हूं. अगर विभूति बाबू मैत्रेयीजी के लिए कोई सभ्य विशेषण प्रयोग करते तो मैं भी उसका समर्थन करता. विभूति बाबू के शब्द घृणित हैं मगर उनकी राय बुरी नहीं है, ऐसा मैं मानता हूं. मेरी राय में विभूति बाबू, कालियाजी और मैत्रेयीजी एक ही पर्स के डॉलर हैं. इन्हें साहित्य के प्रसिद्ध होने का स्टंट मालूम है. मैं स्टंट के जरिये पाने वाली अल्प कालीन प्रसिद्धि का विरोधी हूं.
मेरे ख्याल से साहित्य में शब्दों की जिम्मेदारी तय करने की यह लडाई किसी सम्मानित लेखक या लेखिका के नेतृत्व में लड़ी जानी चाहिये थी. जैसे महाश्वेता या कृष्णा सोबती होतीं तो लड़ाई सार्थक होती. विभूतिजी और मैत्रेयीजी में फर्क ही क्या है, उन्होंने भी तो प्रतिकार स्वरुप लफंगा शब्द इस्तेमाल कर ही दिया है. मोहल्ला में कई लोग और भी घृणित शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं.
हम क्या हमेशा दूसरों को जिम्मेदार बनाते रहेंगे, खुद कब जिम्मेदार बनेंगे.
पुनश्चः मैं इस लडाई को डायल्यूट करने की कोशिश या साजिश नहीं कर रहा, लेकिन यह तरीका मुझे रास नहीं आ रहा. विभूतिजी को पद से हटाने की मांग की जानी चाहिये. उन पर पहले भी कई गंभीर आरोप हैं. मगर खुद विभूति बन जाने में क्या तुक है…

संतोष राय की टिप्पणी..


पुष्य मित्र जी आपने सही कहा। मैं भी आपके विचारों से पूरी तरह सहमत हूं। ये लोग खुद बहस को एक मुकाम तक पहुंचाने की बजाय गड्ढे में डाल रहे हैं। अंतत: ऐसा होगा कि इनकी गाली विभूति नारायण राय की गाली से बड़ी हो जाएगी और मामला खत्म। मुझे लगता ही नहीं कि यहां कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति लिख रहा है। इसे बचाइये कहीं ये मुर्खों का मोहल्ला ना बन जाए।

1 comment:

पशुपति शर्मा said...

पुष्य
ये बड़ी समस्या है। किसी बात का विरोध हम विरोध जताने के अंदाज में नहीं बल्कि फैसला सुनाने के अंदाज में करते हैं। ये कुछ कुछ अदालतों की तरह का मसला है। फैसला सुना दिया तो उसे अमल में लाने के लिेए पुलिसिया प्रकोप के इस्तेमाल से गुरेज नहीं। कुछ ऐसा ही विभूति नारायण के केस में भी हो रहा है। उस शख्स ने एक टिप्पणी की... उस टिप्पणी की अहमियत है लेकिन हंगामे के बाद उसने माफी मांगी उसकी कोई अहमियत नहीं।
यहां हमें समस्या उस व्यक्ति से नहीं बल्कि उसके पद से है। उसके पास कुछ छोड़ने को है तो उसे छोड़ता क्यों नहीं। अगर विभूति के पास वीसी की कुर्सी न होती तो शायद माफी से काम चल जाता लेकिन यहां तो मसला कुछ और भी है।