कश्मीर को आखिर इतना भाव क्यों


हमारे प्रधानमंत्री ने कल कश्मीर की स्वायत्ता पर बहस का मुद्दा उछाल दिया है. उनके हिसाब से इस बहस की तपिश में झुलस का कश्मीर का हालिया विवाद ठंडा पड़ जायेगा और जो नौजवान इन दिनों पत्थरबाजी में मशगूल हैं वे इस बात को भूल कर इस बहस में भिड़ जायेंगे कि क्या स्वायत्ता कश्मीर की समस्याओं का हल है, या इसका हल क्या है, भारतीय हुकूमत को इस जलते हुए प्रदेश के जख्मों पर मरहम लगाने के लिये आखिर क्या करना चाहिये, बगैरह-बगैरह. हालांकि देश के तथाकथित प्रगतिशील तबके ने एक स्वर में प्रधानमंत्री जी के इस प्रगतिशील बयान का स्वागत कर डाला, मगर घाटी के विद्रोही और युवा शायद इससे भी बड़ी बारगेनिंग करना चाहते हैं और उन्होंने एक सेंटीमेंटल बयान दे मारा है कि सवाल न तो स्वायत्तता का है और न ही किसी पैकेज का सवाल इस बात का है कि कश्मीर के दर्द को लोग समझें. मगर इस लोकतांत्रिक और प्रगतिशील बयार के बीच मैं पूछना चाहता हूं कि आखिर कश्मीर को इतना भाव क्यों दिया जा रहा है या जाता रहा है..

यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि यह आलेख न तो पंडित दीनदयाल जी के विचारों से प्रभावित होकर लिखा जा रहा है न हीं इसके पीछे कश्मीरी हिंन्दुओं से साथ हुए अत्याचार की दुखद स्मृतियां. एक सामान्य भारतीय नागरिक के तौर पर यह सवाल अपने मन में लिये मैं कई सालों से मंथन कर रहा हूं और आज आपके सामने पेश करने की जहमत उठा रहा हूं कि आखिर कश्मीर को इतना भाव क्यों दिया जा रहा है. आखिर कश्मीर या कश्मीरियों की समस्या क्या है ? मुझे कश्मीरवासी इस बात के लिये माफ करेंगे कि इतने हंगामे के बावजूद मैं आज तक समझ नहीं पाया कि उनकी समस्या क्या है और वह हम सामान्य हिंदुस्तानियों से किस तरह भिन्न है ? आखिर वे किस बात का रोना इतने दिनों से रोते आ रहे हैं और किस बात के लिये बरसों से एक दूसरे का खुन बहाते आ रहे हैं ? अपनी समझ के मुताबिक इस बात के जो कारण मुझे लगता हैं, मैं उन पर अपनी बात करने की कोशिश कर रहा हूं.

समस्या - कश्मीर भारत में शामिल नहीं होना चाहता था, उसे जबरन भारत में शामिल कराया गया. कभी उसकी राय नहीं ली गई.

जवाब- क्या बिहार, यूपी, मध्यप्रदेश, कर्नाटक आदि राज्य भारत में शामिल होना चाहते थे ? उन्हें किस आधार पर भारत में शामिल कराया गया ? क्या इस बात के लिये कोई जनमत सर्वेक्षण हुआ ? क्या जूनागढ़, हैदराबाद और दूसरे कई रियासतों ने भारत में शामिल होने से इनकार नहीं किया था ? क्या इसके बावजूद उन्हें हिंदुस्तान में शामिल नहीं कराया गया ? क्या नगालैंड भारत में शामिल होने के खिलाफ नहीं रहा है ? क्या उसका दोष सिर्फ इतना है कि वह मुस्लिम नहीं है ?

कहा जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर की मुस्लिम आबादी के कारण वह स्वभाविक रूप से पाकिस्तान में शामिल हो सकता है. मगर आजादी के वक्त कश्मीर की जनता ने कभी पाकिस्तान में मिलने के वैसी उत्कंठा का प्रदर्शन नहीं किया जैसा हैदराबाद की जनता ने पाकिस्तान में नहीं मिलने के लिये किया था.

दरअसल बंटवारे के वक्त अधिकांश राज्यों के अस्तित्व का फैसला इसी तरह बिना किसी जगह की जनता की राय पूछे अपनी मरजी से कर लिया. अधिकांश फैसले तो माउंटबेटेन के डायनिंग टेबुल पर हुए और जो फैसले वहां नहीं हुए उसे सरदार पटेल ने तोपों के निशाने पर करा लिया. और आज इनमें से अधिकांश राज्य अमन चैन की जिंदगी जी रहे हैं और प्रगति के पथ पर अग्रसर हैं.

कश्मीरवासी जिस ऐतिहासिक संदर्भ का जिक्र कर करके इतने सालों से बारूद के साये में अपने जीवन को तबाह कर रहे हैं. वह एक कंफ्यूजन है, जिसके मुताबिक कश्मीर को लगता है कि वह पाक मुल्क पाकिस्तान का हिस्सा हो सकता था. वह एक आजाद मुल्क भी हो सकता था. यह कंफ्यूजन उन्हें अपने ही प्रांत के कश्मीरी हिंदू पंडित नेहरू की ढुलमुल नीति से सौगात में मिली है. वे अपनी तुलना न तो हैदराबाद से करते हैं जहां इस भ्रम के खत्म होने के कारण दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है और न ही लाइन आफ कंट्रोल के उस पर बसे कश्मीर के अपने लोगों से जो एक तथाकथित पाक मुल्क में कई दशक पिछड़ी जिंदगी जी रहे हैं.

दरअसल नेहरू जी ने कश्मीर से संदर्भ में जो जटिलता पैदा की है वह न देश के लिये हितकर साबित हुआ और न ही कश्मीर के लिये. हैरत की बात यह है कि देश के किसी दूसरे नेता ने इसमें सुधार लाने की कोशिश भी नहीं की और न ही यह समझने की कोशिश की कि धारा 370 और स्वायत्तता का कोई अर्थ नहीं है.

अगर कश्मीरी हिंदुस्तान में नहीं रहना चाहते तो उन्हें यह अनुभव कर लेने दिया जाना चाहिये कि वे जंगी और आर्थिक समस्याओं से घिरे अस्थिर पाकिस्तान में रह लें या फिर नेपाल या बांग्लादेश की तरह आजाद रहकर तय तक लें कि प्रगति के दौर में वह कहां तक जा पाते हैं. हालांकि इस देश ने अपने किसी वासी को यह तय करने का मौका नहीं दिया कि वह देश में रहना चाहता है या नहीं मगर अगर कश्मीर खुद को थोड़ा अलग महसूस कर रहा है तो उसे मौका दिया जाना चाहिये. बनिस्पत उसे हर साल दसियों हजार करोड़ के स्पेशल पैकेज दिये जायें और उसमें अपनी हजारों फौजों को मौत से मुकाबला करने के लिये ढकेल दिया जाय.

धारा 370 और स्वायत्तता निश्चित तौर पर कश्मीर को दिये जाने वाले लालच के फंदे हैं. जैसे कोई मर्द अपनी खूबसूरत बेगम को तोहफे देता है कि वह उस पर मेहरबान रहे और उसकी दूसरी औरतें जो उतनी खूबसूरत नहीं होती वह दाने-दाने के लिये मोहताज रहती हैं जैसे कि बिहार... बिहार से अलगाववाद की मांग नहीं उठती इसलिये सरकार उसे उसका हक तक नहीं देना चाहती और कश्मीर पर अरबों-खरबों लुटाती है कि वह उससे अलग न हो जाये. कश्मीर आखिर हिंदुस्तान की मजबूरी क्यों है ? साथ रहना है रहे न रहना है न रहे. क्या अब हिंदुस्तान उस स्थित में नहीं पहुंच गया है कि लोग खुद तय करें कि वे साथ रहना चाहते हैं या अलग? मुझे लगता है कि अगर कश्मीर की जनता को यह तय करने दिया जाएगा तो वह खुद ही पाकिस्तान के बदले हिंदुस्तान को चुनेगी. मगर जनमत सर्वेक्षण के खौफ में भारत बार-बार कश्मीर को राजनीतिक और आर्थिक प्रलोभनों की सौगात देता रहा है जो देश के दूसरे हिस्से के लोगों के लिये खतरनाक ट्रेंड है.

Comments

कश्मीर समस्या को कैसे हल किया जाए, इसका कोई फार्मूला सरकार के पास नहीं। अगर होता तो 60सालों में उसका असर जरूर दिखता।
दो महीने के हिंसक दौर के बाद स्वायत्ता और पैकेज का राग रोग को दबाने की कोशिश भर है, रोग का इलाज नहीं।