Friday, August 20, 2010

राजीव की जयंती पर परमाणु विषवृक्षों के सौदे

आज पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का 66वां जन्मदिन है. इस साल उनका नाम भोपाल गैस त्रासदी को लेकर उठे विवाद में जबरदस्त तरीके से घसीटा गया. उन पर यूनियन कारबाइड के सीईओ वारेन एंडरसन को संरक्षण देने और सेफ पैसेज देने का गंभीर आरोप लगा. एक अमेरिकी एजेंसी ने तो यहां तक कह डाला कि वारेन एंडरसन के बदले इंदिरा गांधी के चहेते ड्राइवर के बेटे को छोड़ने की डील हुई थी और इसमें राजीव गांधी की बड़ी भूमिका थी. संयोगवश हमारी केंद्र सरकार ने आज का ही दिन न्यूक्लियर लायेबिलिटी बिल पर संसद में बहस कराने के लिये चुना है. आज तय होना है कि परमाणु हादसे होने की स्थिति में कंपनियों को कितना मुआवजा चुकाना होगा. ऐसे में राजीव गांधी सरकार के उन फैसलों की सहज याद आ जाती है कि किस तरह उन्होंने यूनियन कारबाइड को नाम मात्र के मुआवजे के बाद छोड़ दिया था. इस मौजूदा सरकार की नीयत उस सरकार की नीयत से जुदा होगी ऐसा लगता नहीं खास तौर पर इस तथ्य के मद्देनजर कि इस सरकार की सरपरस्ती उन्हीं की विधवा सोनिया गांधी कर रही है. इतालवी मूल की इस महिला कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने पति की जन्मदिन की पूर्व संध्या पर कुछ ऐसी ही घोषणा की है. उन्होंने कहा है कि लोगों को अब भोपाल मसले को भूल जाना चाहिये और गड़े मुर्दे को उखाड़ना बंद कर देना चाहिये. बड़े भोलेपन के साथ वे कहती हैं कि इसमें कोई शक नहीं कि भोपाल मसले पर हर सरकार ने लापरवाही बरती. वे भूल जाती हैं कि वह हर सरकार जिसने लोगों के जख्मों के साथ खिलवाड़ किया था वे कांग्रेस की ही थी. ऐसी घिनौनी हरकत करने वालों की सूची में सबसे उपर उनके स्वर्गीय पति का नाम आता है. उन्हें इस मौके का उपयोग अपने पति की गलतियों की माफी मांगने के लिये करना चाहिये था. मगर वे अमेरिका को खुश करने के लिये डाउ केमिकल को क्लीन चिट देने की प्रकिया की दिशा में सार्थक कदम बढ़ा रही हैं.
शायद वे भूल जाती हैं कि भोपाल के शिकार सिर्फ गड़े और जला दिया गये मुरदे ही नहीं हैं, लाखों ऐसे लोग भी हैं जो जिंदा लाशों की तरह हैं. हिरोशिमा-नागाशाकी के पीड़ितों से बेहतर नहीं है भोपाल पीड़ितों के हालात. पूरी दुनिया 65 साल बाद भी हर साल उसी संवेदनशीलता और आत्मीयता के साथ उस तारीख को मनाती है जब इन शहरों पर परमाणु हमले हुए. इन तारीखों और इन जख्मों को इसलिये भी नहीं भूला जाता ताकि परमाणु हमलों की भीषणता को याद रखा जाये और दुनिया को इससे बचाने की कोशिश की जाये. मगर हमारी सरकार भोपाल को भुला देना चाहती हैं और देश भर में परमाणु रिएक्टरों के विष वृक्षों को जगह-जगह रोप देना चाहती हैं. जी हां, हमारी मौजूदा सरकार जिन परमाणु रिएक्टरों के बूते पर पूरे भारत को जगमगा देने का दावा कर रही हैं वे रोशनी का सोता नहीं आग की लपटें हैं. यह अपना घर जलाकर मुहल्ला रोशन करने जैसी तरकीब है. इसका नमूना पूरे देश ने देखा जब दिल्ली विश्वविद्यालय के एटोमिक स्क्रेप से कई जानें गईं. जिन्हें और बेहतर नमूना देखना है वे झारखंड के जादूगोड़ा की सैर कर लें. यहां यूरेनियम कॉरपोरेशन लिमिटेड की खदान है. इस खदान के आसपास रहने वाले अधिकांश लोग अपंग नजर आते हैं, बच्चे तक अपंग पैदा होते हैं. और अगर कुछ नजर नहीं आता है तो बुढ़ापा. वहां काम करने वाले मेरे एक मित्र ने बताया कि आसपास के इलाके में उसने कोई बूढ़ा देखा ही नहीं. क्योंकि कोई बूढ़ा होता ही नहीं है लोग जवानी में ही गुजर जाते हैं. अगर और उदाहरण देखना चाहते हैं को पंजाब के उस इलाके में जायें जहां पानी में यूरेनियम मिलने लगा है, नतीजन बच्चों पर कितना खतरनाक असर पड़ रहा है.

परमाणु रिएक्टर कितने खतरनाक हैं यह अब पूरी दुनिया जान चुकी है. इसमें काम करने वालों की छोटी से छोटी गलती का खामियाजा हजारों लोगों को भुगतना पड़ता है. इसके अलावा इससे निकलने वाला कचरा कितना नुकसान देह है यह दिल्ली विश्वविद्यालय वाले मामले से स्पष्ट है चुका है. वहीं एक ऐसे देश में जो आतंकवाद और माओवाद से बुरी तरह त्रस्त है परमाणु रिएक्ट किसी परमाणु बम से कम नहीं. विकीपीडिया में अब तक हुए नागरिक परमाणु हादसों की पूरी सूची इस लिंक पर है- http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_civilian_nuclear_accidents. इसके बावजूद हमारे हुक्मरान हमें परमाणु रिएक्टरों की सौगात देने पर आमदा हैं. और तो और वे इस बात के लिये कोशिशें कर रहे हैं कि अगर कोई हादसा हो तो इन कंपनियों पर कम से कम मुआवजा लगाया जा सके ताकि हमारे अमेरिकी आका हमसे खुश रहें.

इससे भी दुःखद बात यह है कि भारतीय जनता के साथ किये जा रहे इस विश्वासघात के वक्त एक भी राजनीतिक दल लोगों के साथ नहीं है. जब परमाणु करार पर संसद में बहस हो रही थी तो उन्हीं लोगों ने सरकार का साथ दिया जो आज लायेबिलिटी बिल पर सरकार के खिलाफ हैं. और जो दल परमाणु करार पर बहस के वक्त सरकार के खिलाफ थे वे आज सरकार का समर्थन करने को तैयार हैं. बचा एक वाम दल जो परमाणु करार पर सरकार से समर्थन लेने के बाद इस तरह पतन की दिशा में बढ़ता जा रहा है कि उसका जिक्र ही बेकार है. मगर जिस तरह करार के बाद उस दल के नेताओं ने दावा किया था कि वे जनता को इस मसले पर जागरूक करेंगे उसके लिये उन्होंने क्या किया यह सवालों के घेरे में है.

आज फिर हम लोगों के साथ सरकार ठगी का खेल-खलेने जा रही है, नरेंद्र मोदी के मसले पर भाजपा ने सरकार के आगे घुटने टेक दिये हैं. एक सहाबुद्दीन एनकांउटर की सजा पूरा देश भुगतेगा. बताया जा रहा है कि विपक्ष की आपत्तियों के बाद कैबिनेट ने बिल से एंड नाम का एक शब्द हटा लिया है, जिससे रिएक्टर लगाने वाली कंपनियों को कुछ हद तक जिम्मेदार बनाया जा सके. देश जश्न मनाये क्योंकि आज राजीव गांधी की जयंती है. देश का हर अखबार उनके विज्ञापनों से अंटा पड़ा है. विरोध का कहीं कोई स्वर नहीं है.

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