Tuesday, September 07, 2010

बिहार को बदलनी होगी माओवाद के खिलाफ नीति


कभी-कभी ऐसा लगता है कि माओवादियों को शांति के नाम से ही चिढ़ है. वे हर हालात में सरकार के साथ जंग की स्थिति बरकरार रखना चाहते हैं क्योंकि अगर जंग नहीं होगा तो फिर माओवाद का क्या होगा? और अगर माओवाद मिट गया तो फिर उन माओवादियों का क्या होगा जो बंदूक की नाल से क्रांति की विचारधारा में यकीन करते-करते इस कदर बारूद की गंध के आदी हो गये हैं कि उन्हें इसके बिना जीना नामुमकिन लगता है. शायद यही वजह है कि उन्होंने बिहार में चार पुलिस कर्मियों को अगवा करके एक ऐसी सरकार के खिलाफ जंग छेड़ दी है, जिसका मुखिया हमेशा यही कहता आया है कि माओवादी हमारे समाज के अंग हैं, हम बंदूक के जोर पर इस समस्या का समाधान नहीं कर सकते.

माओवादियों के द्वारा उठाये गये इस कदम के कारण बिहार सरकार पिछले चार दिनों से बंधक है. सरकार की दुविधा यह है कि न तो वह माओवादियों के आगे झुक कर एक गलत परंपरा को जन्म देने का दोषी बनना चाहती है और न हीं माओवादियों के कब्जे में फंसे पुलिस कर्मियों को खोना चाहती, जिससे चुनाव के ऐन पहले जनता की सहानुभूति खो देने का खतरा उत्पन्न हो जाये. ऐसे में केंद्र सरकार और खास तौर पर गृह मंत्रालय पूरे प्रकरण का मजा ले रहा है, चिदंबरम ठहाके लगा रहे हैं क्योंकि माओवादियों को समाज का हिस्सा बता कर उनकी नीतियों की आलोचना करने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सांसें अटकी हैं.

बिहार सरकार का माओवादियों के प्रति नर्म रुख नीतीश सरकार के समय की उपज नहीं है. समाजवादी आंदोलन के प्रभाव के कारण बिहार के आम बुद्धिजीवी हमेशा से इसी तरह सोचते हैं. राबड़ी देवी के शासनकाल में भी तत्कालीन डीजीपी ओझा ने प्रयास किये थे कि सरकार और माओवादियों के बीच बातचीत हो जाये, मगर उस वक्त के सरकार की प्राथमिकताओं में यह मुद्दा नहीं आ सका, लिहाजा उस वक्त वार्ता संभव नहीं हो पाई. इसके बावजूद न सिर्फ सरकार बल्कि बिहार का पुलिस प्रशासन भी कभी इन्हें अपने खिलाफ युद्ध छेड़ने वाली शक्ति या आतंकवादी के रूप में नहीं देख पाया.

बिहार हमेशा से यही सोचता रहा कि माओवाद का कारण विकास की असमानता है और माओवादी समाज के वे युवक हैं जो बदलाव चाहते हैं. हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था से उनका भरोसा उठ गया है और वे अपने उग्र स्वभाव के कारण बंदूक के बल पर आनन-फानन में समाधान चाहने लगे हैं, मगर इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार भी उनके खिलाफ बंदूक उठा ले. यही वजह रही कि नीतीश सरकार ने गृह मंत्री पी.चिदंबरम के नेतृत्व में शुरू किये गये ऑपरेशन ग्रीन हंट में शामिल होने में कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई. कोलकाता में जब मंत्रालय ने सभी माओवाद प्रभावित राज्यों के प्रतिनिधियों की बैठक बुलाई तो बिहार के प्रतिनिधि उस बैठक से गैरहाजिर थे. तब चिदंबरम ने कहा था कि लगता है बिहार अलग राह अपनाना चाहता है. इसके बावजूद माओवादियों ने कभी बिहार को नहीं बख्शा. लखीसराय, जमुई और गया के इलाके में उन्होंने अपनी कार्रवाइयां हमेशा जारी रखीं.

दरअलस बिहार द्वारा माओवादियों के प्रति नरम रवैया अपनाने की नीति का आधार ही गलत है. बिहार के नीति नियंता जिस माओवाद की कल्पना अपने मन में संजोये बैठे हैं वह काफी पहले की बात है. दरअसल वह माओवाद है ही नहीं वह तो नक्सलवाद है. अब माओवादियों की लड़ाई में शोषण की खिलाफत को सिर्फ नारे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है. उनकी असली लड़ाई देश के खनिज संसाधनों पर कब्जे की है. गौरतलब है कि माओवाद उन्हीं इलाकों में पसरा है जहां खनिज प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है. आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ से लेकर झारखंड तक. बिहार और बंगाल में भी माओवाद वहीं है जहां खनिज पर्याप्त मात्रा में हैं.

अब माओवादी चीन से सिर्फ विचार नहीं लेते, कहा तो यहां तक जा रहा है कि वे उनसे फंड तक लेने लगे हैं. इसके बदले में वे चीन को भारतीय खदानों से निकला कच्चा माल उपलब्ध कराते हैं. बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं से लेकर झारखंड के सिंह मेंशन तक हर खनिज माफिया इस कारोबार में माओवादियों का हिस्सेदार है. माओवादी पूरे इलाके को अपने कब्जे में लेकर उन इलाकों में प्रशासन के पहुंच को असंभव बनाकर इन माफियाओं को खुलेआम अवैध खनन की छूट का मौका देते हैं और इन्हें चीन भिजवाने में सहयोग करते हैं. इनसे कमीशन लेते हैं और आम जनता, सरकारी अधिकारी, ठेकेदार आदि अनके इलाके के हर पैसे वालों से लेवी वसूलते हैं. इन पैसों से हथियार खरीदे जाते हैं और फौजियों की भर्ती होती है. अब तो लेवी की दर बकायदा अखबारों में छपने लगी है. अपने इलाके में माओवादी अब सरकार बनवाने तक की प्रक्रिया में शामिल होने लगे हैं. कहा जाता है कि झारखंड में शिबू की जीत माओवादियों के रहमो-करम पर हुई थी, वे हर हाल में कांग्रेस और बाबूलाल को सरकार से दूर रखना चाहते थे. अब उनका नया एजेंडा ममता को बंगाल की कुर्सी पर काबिज कराना है.

इन हालातों में अगर बिहार की सरकार यह सोचती है कि माओवादी हमारे समाज का हिस्सा हैं और शोषण के खिलाफ लड़ने वाले भोले-भाले युवक हैं तो यह उनकी सोच का पिछड़ापन ही दर्शाता है और इसी का नतीजा आज नीतीश भुगत रहे हैं. उन्हें लगता था कि उनकी सदाशयता राज्य को माओवाद की समस्या से बचाकर रखेगी, मगर माओवादी इस तरह से नहीं सोच रहे हैं. वे सोचते हैं कि अगर सरकार से शांतिवार्ता हो गई तो लखीसराय-जमुई और मुंगेर में हो रहे अवैध खनन पर रोक लग जाएगी और उनकी आय का एक बड़ा हिस्सा खत्म हो जायेगा. यह कार्रवाई पूरी तरह बिहार सरकार को भड़काने और अपने खिलाफ करने की कोशिश हैं. उन्हें मित्रों की जरूरत नहीं, वे शत्रु चाहते हैं. क्योंकि शत्रु ही उनके हिंसक कार्रवाइयों को जायज ठहराने का आधार बनेंगे, मित्र तो उन्हें अपना कारोबार बंद कर समाज की मुख्य धारा में शामिल होने की सलाह देंगे.

बिहार में उनकी मौजूदा कार्रवाई इसी बात को पुष्ट करती है. पहले वे पुलिसकर्मियों को मार गिराते हैं, फिर बीडियो और चार पुलिसकर्मियों को बंधक लेते हैं. फिर फिरौती के तौर पर अपने आठ साथियों को रिहा करने की अपील करते हैं. पुलिसकर्मियों के परिजनों को फोन कर मुख्यमंत्री आवास पर धरना देने की तरकीब बताते हैं ताकि पूरा मसला मीडिया का अटेंशन खींच सके और नीतीश को कटघड़े में खड़ा कर सके. फिर एक बंधक को मार गिराने का दावा करते हैं ताकि सरकार घबड़ाकर कोई कदम उठाये.

इस प्रकरण में सरकार की सिर्फ यही गलती है कि वह सदमे में है कि आखिर उसकी नीति गलत कैसे साबित हो गई. कहा जा रहा कि पुलिस प्रशासन आंध्र प्रदेश के विधायक अपहरण कांड के इस्तेमाल की गई नीतियों पर चल रहा है. मगर सच्चाई यह है कि इस मसले पर हर तरफ से सरकार की ही हार है. चाहे वह माओवादियों को वार्ता के टेबुल पर बुला ले या माओवादियों को छोड़ कर बंधकों को बचा ले या फिर ठोस पुलिसिया कार्रवाई कर माओवादियों को मार गिराये. हर हालत में सरकार ही कटघड़े में होगी और माओवादी यह साबित करने में कामयाब होंगे कि उनके साथ हर हाल में जंग की मुद्रा ही अपनानी होगी.

1 comment:

पशुपति शर्मा said...

पुष्यमित्र का ये विश्लेषण खतरनाक नतीजों की ओर संकेत करता है। क्या वाकई बस जंग ही एक मात्र रास्ता है? क्या नीतीश ने बातचीत का रास्ता अख्तियार कर गलत फैसला किया, क्या चिदंबरम का ग्रीन हंट ही समस्या का हल है? क्या खनिज पर कब्जा ही बिहार के माओवादियों का एक मात्र लक्ष्य है?
इन सारे सवालों पर पुलिसकर्मियों के बंधक प्रकरण से इतर भी विचार करना होगा