माओवादियों का जातिवाद


बिहार में हुई हाल की घटनाओं ने साबित कर दिया है कि माओवादी अब महज डकैतों और माफिया गुंडों का समूह है जिनसे सिर्फ डरा जा सकता है. विचारधारा और शोषण के खिलाफ लड़ने के उनके जज्बे के कारण लोगों में उनके प्रति जो सम्मान बचा था वह भी अब खत्म होने की कगार पर है. मगर इस क्राइसिस के बाद जो सबसे चौकाने वाली बात उभर कर सामने आयी है वह इन समूहों की वास्तविकता बन चुके जातिवादी झगड़े हैं. यह कोई अनुमान नहीं बल्कि कटु सच्चाई है, बिहार के बंधक विवाद के दौरान जिस तरह ईसाई आदिवासी बीएमपी हवलदार लुकस टेटे की हत्या कर दी गई और अभय चादव, रूपेश सिंहा व एहसान खान को छोड़ दिया गया उसके कारण माओवादियों के बीच जड़ जमा चुका यह विवाद सतह पर आ चुका है. बहुत संभव है कि इस झगड़े के कारण आने वाले दिनों बिहार और झारखंड में माओवादियों के बीच गैंगवार की स्थिति उत्पन्न न हो जाये.



लखीसराय के माओवादियों द्वारा बंधकों में से एक ईसाई आदिवासियों की हत्या किये जाने के कारण झारखंड के आदिवासी माओवादियों में गहरा रोष है. बताया जाता है शीर्ष माओवादी जोनल कमांडर बीरबल मुर्मू ने लखीसराय के जोनल कमांडर अरविंद यादव के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए कहा है कि उसने जहां एक ओर एक आदिवासी पुलिस कर्मी की हत्या करा दी वहीं अपनी जाति के बंधक अभय यादव की जान जानबूझकर बख्श दी. मुर्मू का कहना है कि अगर हत्या ही करना था तो चारो बंधकों की हत्या करते, किसी एक को मारना और तीन को छोड़ देना एक गलत परंपरा को जन्म देता है. यह भी कहा जा रहा कि आदिवासियों को शोषण से मुक्ति दिलाने के नाम पर लड़ाई लड़ने वाले माओवादियों ने जिस तरह एक आदिवासी की हत्या कर ही और गैरआदिवासियों को बख्श दिया उससे समाज में गलत संदेश गया है.



हालांकि माओवादियों को संदेश की परवाह अधिक नहीं. हकीकत यह है कि झारखंड के जिन इलाकों में माओवाद का गढ़ है वे आदिवासी बहुल हैं और स्थानीय लोगों के सहयोग और संरक्षम के कारण ही वे इस इलाके में कायम हैं. उनके लड़ाका कैडर में भी आदिवासियों की संख्या ही अधिक है. माओवादी किसी सूरत में झारखंड के जोन के कमजोर हो जाने का खतरा नहीं उठा सकते क्योंकि अवैध खनन वाले इन्हीं इलाकों से उन्हें सर्वाधिक आय होती है. ऐसे में लुकास टेटे की हत्या उनके लिये आत्मघाती साबित होने वाली है.



झारखंड के आदिवासियों के हाल के दिनों में माओवाद के खिलाफ जंग की लड़े जाने की भावना सामने आने लगी है. पिछले दिनों कई गांवों में आदिवासियों ने जातीय सभा बुलाकर माओवादियों के खिलाफ जंग छेड़ने का ऐलान किया है. ऐसे में निश्चित तौर पर टेटे की हत्या आग में धी का काम करने वाली है. आने वाले दिनों में अगर आदिवासी समुदाय अधिक संगठित होकर माओवादियों के खिलाफ जंग का ऐलान कर दे तो इसमें किसी को अचरज नहीं होना चाहिये.



हालांकि कई लोग ऐसा भी मानते हैं कि टेटे की हत्या को ईसाई वर्सेज गैर ईसाई की जंग के तौर पर भी देखा जा सकता है. क्योंकि ईसाई आदिवासी आर्थिक तौर पर गैर इसाईयों के मुकाबले अधिक समृद्ध है और वह आम तौर पर माओवाद का समर्थक नहीं माना जाता. इसके बावजूद यह मसला इतना महत्वपूर्ण नहीं कि आदिवासियों के बीच आपसी विवाद का कारण बन सके. क्योंकि जब आदिवासी बनाम गैर आदिवासी की बात होती है तो सभी आदिवासी एक होते हैं. लुकस की पत्नी ने भी यह कह कर माओवाद के खिलाफ आदिवासियों के बीच एका स्थापित करने के प्रयासों को बल दिया है कि उसके पति को इस लिये मारा गया क्योंकि वह आदिवासी था.



बहरहाल टेटे का हत्यारा पिंटो दा और उस हत्या का आदेश जारी करने वाला अरविंद यादव बिहार पुलिस की हिरासत में है. बिहार पुलिस ने इसके अलावा सात अन्य शीर्ष माओवादियों को गिरफ्तार किया है. कहा जाता है कि बंधकों की रिहाई के पीछे इन्हीं गिरफ्तारियों का हाथ है. लालू चुप हैं और भद्र मानुषी भाषा बोल रहे हैं. इससे ऐसा लगता है कि नीतीश ने इस प्रकरण में लालू की काट तलाश ली है. नीतीश भी चुप हैं, शायद वे इस प्रकरण पर अपने पत्ते बाद में खोलेंगे. बहरहाल अगर सचमुच माओवादियों के बीच जातीय जंग छिड़ी तो वह बिहार-झारखंड में उसकी बरबादी का कारण बनेगा और इसके लिये हमेशा इस प्रकरण को याद किया जायेगा.

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