Saturday, July 02, 2011

चवन्नी छाप इंडिया, चवन्नी छाप सरकार



दो तीन दिन पहले से हर जगह खबरें आने लगी कि चवन्नी की विदाई हो रही है. हालांकि चवन्नी का जाना कोई बहुत बड़ी खबर नहीं थी, क्योंकि चवन्नी बहुत पहले जा चुकी थी. इन दिनों कोई ऐसा सामान नहीं बिक रहा है जिसके लिए चवन्नी अदा करना पड़े. अठन्नी की इज्जत भी अब एलपेनलिबे टाफी के हाथ में ही है. वैसे भी अठन्नी अब जोड़े में ही चलता है अकेले कोई लेना नहीं चाहता. इस लिहाज से चवन्नी को लेकर जो विधवा विलाप चला और चल रहा है वह बहुत बोरिंग है. इस बात का कोई अर्थ नहीं कि चवन्नी हमारी जुबान पर जिंदा रहेगी, बकौल चवन्निया मुस्कान या चवन्नी छाप इंसान. हमारी जबान पर बहुत सारी ऐसी चीजें जिंदा है जो अस्तित्व में नहीं है, उनमें सबसे बड़े तो खुद ईश्वर ही हैं. मगर!
मगर इस बीच मुझे गुजरात के मुख्यमंत्री भाई नरेंद्र मोदी जी का टवीट बड़ा पसंद आया कि बाबा रामदेव तो हजार रुपये का नोट को खत्म करने की बात कर रहे थे. सरकार ने चवन्नी खत्म कर दी. है ना इंटरेस्टिंग. और इसी बात के सहारे मैंने यह निष्कर्ष है कि हमारी सरकार भी चवन्नी छाप है और हमारा नया नवेला इंडिया भी. (इंडिया का भ्रूण १९८४ में राजीव गांधी के साथ अस्तित्व में आया और १९९१ में नरसिंहा राव और मनमोहन सिंह की जोड़ी ने जन्म दिया, इस लिहाज से इसकी उम्र महज २० साल है.)
देशभक्ति की ज्वार पर सफर करने वाले मेरे ऐसे दोस्त जो यह मानते हैं कि इंडिया सुपर पावर बनने की राह में है मुझे माफ करें. अगर यह देश चवन्नी को नहीं बचा पाता है तो इसे चवन्नी छाप कहने में कोई गुरेज नहीं है. क्योंकि आपको शायद यह मालूम होगा कि चवन्नी की बलि इस वजह से दी गयी है क्योंकि चवन्नी में लगने वाले धातु की कीमत चवन्नी से काफी महंगी हो गयी थी. स्टेनलेस स्टील की कीमत बाजार में १९ पैसे से २४ पैसे प्रति ग्राम के बीच है. यानि २.८३ ग्राम की चवन्नी की न्यूनतम कीमत ५० पैसे के आसपास हो जाती है. चवन्नी की मौत की वजह कुछ और नहीं, महंगाई है. और इस महंगाई की वजह कुछ और नहीं सात साल से हमारे कंधे पर सवार मनमोहन सरकार है, जिसके लिए विकास दर मेंटेंन रखना सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, जनता भूखे मरे या पेस्टीसाइड खाकर मरे. पेस्टिसाइड खाकर मरती है तो और अच्छा कम से कम मरते-मरते उपभोक्ता के धर्म का पालन तो करती ही है. पेस्टिसाइड खरीदती है जिससे इस अर्थव्यवस्था में थोडा उछाल तो आता ही है.
दरअसल, हम लोग अब इस देश के नागरिक नहीं रह गये. हम लोग इन बीस सालों में चुपके-चुपके उपभोक्ता में बदल दिये गये हैं. हमारे पास परचेजिंग पावर है तो सबकुछ है, यही पावर सबसे बड़ा पावर हो गया है. ऐसे में बहुत संभव है कि हमारी सरकार चवन्नी को डिलीट कर ऐसा सोचती हो कि हमने प्रगति कर ली है, अब हमारा देश चवन्नी के लेवल से उपर उठ गया है. फिलहाल रिजर्व बैंक ५ रुपये के नोट को भी खत्म करने वाला है और २० रुपये का सिक्का बाजार में उतारने की योजना बना रहा है. भारत सरकार ने एक और दो रुपये का नोट छापना काफी पहले बंद कर दिया है.
एक अर्थशास्त्री के तौर पर मनमोहन यह जरूर समझते होंगे कि चवन्नी का लेबल गंवा देना सफलता नहीं असफलता है. अमेरिका में दो हजार डालर की सैलरी ठीक-ठाक मानी जाती है और हमारे यहां २० हजार रुपये की कोई गिनती नहीं है. अगर चवन्नी गंवा देना बहादुरी है तो सबसे बहादुर देश तो जिम्बाब्वे है जहां लाख से कम में कोई काम ही नहीं चलता. जहां दस करोड़ रुपये का नोट भी मार्केट में है और जहां ५० बिलियन जिम्बाब्बे डालर खर्च करके एक अंडा खरीदा जाता है. जहां २००५ में ५ हजार और १० हजार का सिक्का जारी किया गया. वहीं अमेरिकन डालर ४४.५ रुपये का है और ब्रिटिश पाउंड ७१ रुपये का. इंगलैंड में आज भी एक पेनी, २ पेंस और पांच पेंस के सिक्के बाजार में चल रहे हैं. १९८४ तक आधा पेनी का भी सिक्का चलता था. हालांकि आज भी एक पेनी का मूल्य जिसे वहीं एक पैसा माना जाता है, हमारे आठ आने से अधिक है. चाइनीज युआन का मूल्य सिर्फ ६ रुपये ९० पैसे ही है, मगर वहां भी एक फेन और दो फेन का सिक्का चलता है. १०० फेन का एक युआन होता है. अमेरिका में भी एक सेंट, पांच सेंट और क्वार्टर डालर का सिक्का चलन में है. सौ सेंट का एक डालर होता है. विकसित देशों की श्रेणी में शायद ही कोई ऐसा देश हो जहां एक पैसे(स्थानीय इकाई ), ५ पैसे का सिक्का नहीं चलता हो. हमने चवन्नी तक गंवा दी और अब तो अठन्नी भी बेमतलब होकर रह गया है. बहरहाल हम अपनी तुलना पाकिस्तान से कर सकते हैं, जहां एक रुपये से कम का सिक्का नहीं चलता और ५ हजार तक के नोट बाजार में हैं.
अफगानिस्तान में सिक्के २ रुपये से शुरू होते हैं और नोट दस हजार तक के होते हैं. इराक में २५, ५० और १०० दीनार के सिक्के बाजार में उतारे गये, मगर चले नहीं, फिलहाल न्यूनतम ५० दीनार और अधिकतम २५ हजार दीनार के नोट बाजार में हैं. यह सब बताने का अर्थ सिर्फ इतना है कि लोग समझ लें हम किस दिशा में जा रहे हैं. अफगानिस्तान और इराक की तरफ या अमेरिका और ब्रिटेन की ओर.
हमारा पैसा लगातार कमजोर हो रहा है इसी कारण हमें चवन्नी को खोना पड़ा. अगर हम चवन्नी को बचा लेते तो बहादुरी की बात होती. मगर क्या करें फिलहाल तो सरकार अपनी कुरसी बचाने में जुटी है. उससे मौका मिलेगा तो विकास दर बचायेगी, डूबते सेन्सेक्स को उबारेगी, जेल में जमा नेताओं की फौज को आजादी दिलायेगी, राहुल गांधी का रिपोर्ट कार्ड ठीक करेगी, वगैरह-वगैरह...ऐसे में चवन्नी की फिक्र किसे हो सकती है.

No comments: