Sunday, July 10, 2011

पाइरेटेड सत्याग्रह के इस दौर में


साल 2011 सत्याग्रह, अनशन और पदयात्रओं के लिए याद किया जायेगा और उससे भी अधिक इस बात के लिए कि इसी साल इन गांधीवादी हथियारों को कुछ अगंभीर सत्याग्रहियों ने इतना नुकसान पहुंचाया कि इनकी धार कुंद पड़ने लगी. इसकी शुरुआत जन लोकपाल बिल के लिए चलाये जा रहे अन्ना हजारे के आंदोलन से हुई और बाबा रामदेव की पदयात्रा और अनशन से गुजरते हुए राहुल गांधी की पदयात्रा पर खत्म हुई. इस त्रिस्तरीय यात्रा में इन हथियारों की विश्वसनीयता कितनी गिरी यह किसी से छुपा नहीं है.

अन्ना हजारे और उनकी टीम का आंदोलन कुछ हद तक गांधीवादी जरूर था, मगर उसमें भी कई झोल थे. इस आंदोलन की सबसे बड़ी विसंगति इसका एनजीओवादी ढर्रा था. देश में कई संस्थाएं और संगठन इस तरह के आंदोलन चलाते रहे हैं, जिनमें गुप्त या प्रकट तौर पर देसी-विदेशी एजेंसियां का पैसा लगा रहता है. ऐसे आंदोलन जनता के बीच से नहीं उभरते टाटा स्कूल ऑफ सोशल सांइस या इरमा जैसी संस्थानों से पास करने वाले सामाजिक प्रबंधकों के प्रोजेक्ट प्रोपोजल के जरिये आकार ग्रहण करते हैं. आम तौर पर इस तरह के आंदोलन का कोई नतीजा नहीं निकलता मगर इनके जरिये एक इमानदार विपक्ष का भ्रम कायम रहता है. कुल मिलाकर ऐसे आंदोलन सत्ता पक्ष को सूट करते हैं. ऐसे आंदोलनों के साथ निश्चित तौर पर उन संस्थाओं के हित जुड़े होते होंगे जो इन्हें फाइनेंस करती है.


बहरहाल अन्ना का आंदोलन इन सबसे कितना फरक था यह कहना मुश्किल है, मगर उनके पीछे खड़ी भीड़ में कई लोग ऐसे थे जो इसी वर्ग से आते हैं. हालांकि गांधी जी के आंदोलनों में भी धन्ना सेठों का पैसा लगा रहता था और उनके स्वदेशी आंदोलनों से इन सेठों के उत्पादों की बिक्री में निश्चित तौर पर उछाल आता होगा. इसके बावजूद उन आंदोलनों की सादगी और इन आंदोलनों की भव्यता में कोई साम्य नहीं. फिर गांधीजी की पूरी आंदेलन प्रक्रिया तार्किक हुआ करती थी. चरणबद्ध तरीके से वे मांग करते थे और जब हर तरह के प्रयास चुक जाते तभी वे अनशन नामक हथियार का प्रयोग करते थे. पता नहीं उनका यह हथियार ब्लैकमेलिंग से कितना पृथक था? बहरहाल वे एक छोटी सी चूक पर आंदोलन वापस ले लेते थे. कई बार उन्होंने कहा कि सत्याग्रह करने वाले इंसान में सत्याग्रह की गहरी समझ आवश्यक है. मगर हमने इसी साल देखा कि नेता कर तो सत्याग्रह रहे हैं मगर बातें शिवाजी की करते हैं. हमारे दोनों सत्याग्रहियों की सबसे बड़ी कमजोरी यही रही कि वे बोलते अधिक हैं और बोलते-बोलते अतार्किक हो जाते हैं. जहां तक मेरी जानकारी है उस दौर में गांधीजी का एक बयान सुनने के लिए देश की जनता और सरकार मुंह बाये खड़ी रहती थी और उनके एक-एक शब्द का मतलब निकाला जाता था. सरकार के साथ वार्ता के टेबुल पर अन्ना की टीम जिस तरह फेल हुई और उनके १६ अगस्त के अनशन को लेकर सरकार जितनी कम गंभीर है, उसके पीछे कहीं न कहीं नेतृत्व क्षमता और आत्मबल की कमी है.


जहां तक बाबा रामदेव के आंदोलन और अनशन का सवाल है, उस पर तो विचार करना भी अपने शब्दों को महत्वहीन करना है. वह आंदोलन या तो किसी राजनीतिक दल के प्रोत्साहन पर खड़ा हुआ था या उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा पर. तीसरा आंदोलन सरकारी आंदोलन है जिसे सत्ता के शीर्ष में बैठी पार्टी के प्रमुख डिसीजनमेकर का पुत्र चला रहा है. यह आंदोलन कम पॉलिटिकल पीआर एजेंसी का कैंपेन है. जिसका टारगेट राहुल गांधी को जननेता की छवि प्रदान करना है. पिछले छह सात साल से इस बात के लिए प्रयास किये जा रहे हैं. मैनेजमेंट गुरुओं की टीम भिड़ी है. यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई सिगरेट कंपनी पर्यावरण की रक्षा के लिए वृक्षारोपण करवाती हो. इन तीन आंदोलनों के हश्र के बाद अगस्त में चौथे आंदोलनों की तैयारी चल रही है. मगर वह आंदोलन भी अपना लक्ष्य हासिल करने में कितना सफल होगा कहना मुश्किल है. गांधीजी हर दो आंदोलन के बीच का समय जनता के बीच में जाकर गुजारते थे और समाज सुधार का काम करते थे. मगर अन्ना ने दो आंदोलनों के बीच का वक्त सरकार से तकरार करने में गुजारा है. अब तकरीबन यह तय है कि अन्ना की टीम और सरकार के बीच की लडाई सिर्फ मेरा लोकपाल तेरा लोकपाल की है. अपने तरीके से सरकार अन्ना के टीम की अस्सी फीसदी मांगें मान चुकी है. मसला बीस फीसदी का है. वस्तुतः आम जनता को लोकपाल के मसले से ज्यादा कुछ लेना देना नहीं है. उसके सामने मसला महंगाई और भ्रष्टाचार का है.

अगर आज गांधीजी होते तो वे जंतर-मंतर पर धरना देने के बदले किसी मुखियाजी के द्वार पर धरना देने बैठ जाते और अपने सभी अनुयाइयों को भी ऐसी ही सलाह देते और मांग करते कि वे बिना कमीशन लिए गरीबों को इंदिरा आवास बांटे और नरेगा की मजदूरी में घपला न करे. वे धान की भूसी से जलने वाले चूल्हे का प्रचार करते ताकि रसोई गैस की बढती कीमतों का मुकाबला किया जा सके. मुंबई स्टॉक एक्सचेंज का बहिष्कार करने का आंदोलन चलाते. मोबाइल फेंको अभियान चलाते. गांव-गांव में गुड तैयार करने वाली भट्ठियां और तेल की पेराई करने वाली कोल्हू खुलवाने का अभियान छेड़ते ताकि चीनी और तेल की महंगाई का मुकाबला किया जा सके. बाइक और कार की जगह साइकिलों को प्रमोट करते ताकि स्वास्थ्य भी ठीक रहे और पेट्रोल का खरचा भी बचे. हर घर में एक गाय का आंदोलन चलाते ताकि दूध की महंगाई कम हो. मगर आज के आंदोलन की क्रियेटिविटी यह है कि नारे फेसबुक पर लग रहे है. एसएमएस पर आमंत्रण दिये जा रहे हैं. इस तरह के आंदोलन तो आंदोलनों की साख पर बट्टा लगाने वाले होते हैं. इससे बेहतर आंदोलन तो गुर्जर समाज वाले और तेलंगाना वाले चलाते हैं जो नतीजा लिए बिना मानते ही नहीं.

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