जहां घर नर और सड़कें मादा नहीं हैं!

हाल ही में मैनें एक किताब पढ़कर खत्म की है। किताब का नाम है, जहं-जहं चरन परे गौतम के। यह संभवतः गौतम बुद्ध की सबसे रोचक जीवनी है। मगर मेरे लिए इस किताब का नाम भी कम रोचक नहीं। चरण नहीं चरन, पड़े नहीं परे। शब्दों का यह चयन हम बिहारियों के हिंदी उच्चारण की हीन ग्रंथी पर मरहम लगाने सरीखा है। हम लोग अक्सर इस तरह के उच्चारण के लिए दूसरे प्रदेशों में उपहास के पात्र बनते रहे हैं और आज तक यही समझते रहे कि हमारा यह उच्चारण दोष हमारी अयोग्यता का प्रमाण है। इस पुस्तक का शीर्षक पढ़ कर पहली बार यह समझ आया कि इस तरह का उच्चारण हम बिहारियों के सदियों पहले प्राकृत और पालि भाषी होने के कारण है। इन लोक भाषाओं में उच्चारण इसी तरह किया जाता रहा है और बौद्ध धर्म की प्रतिष्ठा के बाद इन भाषाओं को शासकीय स्वीकृति भी मिली। बहरहाल हमारी जीभ उस वक्त जिस तरह उमेठी गयी, उसका असर अब तक कायम है। बिहार के लोग बमुश्किल सौ-सवा साल से हिंदी बोल रहे होंगे, उससे पहले तो इन्हीं या इनकी अपभ्रंश भाषाओं-बोलियों से हमारा काम चलता रहा। चाहे वह भोजपुरी हो या मैथिली, मगही हो या अंगिका। कहने को आज इन्हें हिंदी की बोलियां कह दिया जाता है, पर हकीकत में यह हिंदी से काफी पुरानी बोलियां हैं और प्राकृत व पालि जैसी भाषाओं का ही अपभ्रंश हैं।

यहां मेरा अभिप्राय हिंदी भाषा को कमतर बताना नहीं है। हिंदी आज उत्तर भारत की सर्वमान्य भाषा है। भले इसकी उम्र छोटी है, मगर प्रभाव व्यापक। सबसे बड़ी बात कि इस भाषा की बदौलत इस नयी सदी में हम जैसे लाखों लोगों की रोजी-रोटी चल रही है। मेरा आशय सिर्फ खुद जैसे बिहारवासियों की उस हीन ग्रंथि पर मलहम लगाना है, जो उच्चारण और लिंगदोष के नाम पर हम चुपचाप झेलते आये हैं।

उच्चारण दोष का अभियोग तो आवाज की दुनिया के कई दोस्तों को झेलना और भुगतना पड़ता ही है और इस कारण कई बार उन्हें पर्दे के सामने आने का मौका नहीं मिल पाता। मगर अखबारी दुनिया के बिहारवासी साथी ज्यादातर लिंगदोष के मारे हैं। दूसरे प्रांतों के हमारे वरिष्ठ द्विआर्थी तरीके से इस शब्द का उच्चारण करते हैं और हम चुपचाप झेंपते हुए मुस्कुराते रहते हैं। अब जाकर मैंने गौर किया कि हमारी बोलियों में तो संस्कृत की तरह तीन लिंग होते हैं। पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और उभय लिंग। यानि हम लोग लिंग विहीन चीजों को लिंग के खांचे में नहीं बांटते। राम पुल्लिंग है और सीता स्त्रीलिंग, मगर राम और सीता का घर हिंदी में भले ही पुल्लिंग होता है, संस्कृत की तरह हमारी बोलियों में उभय लिंग ही होता है। बड़ा पापुलर मजाक है, न्यूज रूम में अक्सर उल्लेख किया जाता है कि हवा बहता है या बहती है का जब फैसला करना हो तो हवा बsहs है कर देना चाहिए। पर हकीकत में हमारी बोलियों में यह इसी तरह इस्तेमाल होता है। हवा बsहs है या हवा बहै छय। घर पुराना हो गया को मैथिली में कहते हैं घर पुरान भs गेल। यहां घर लिंग विहीन है। सचमुच घर लिंग विहीन ही होता है। घर भी, हवा भी, आम भी और हवाई जहाज भी। क्या किसी ने इनका लिंग देखा है? खैर हिंदी वालों ने इनमें स्त्रीत्व और पुरुषत्व तलाश लिये और अब हम भी घर को नर और सड़क को मादा के रूप में देखने की आदत डाल चुके हैं। आने वाले समय में लेस्बियन, गे और किन्नर दावा करने लगे तो हिंदी में संशोधन की जरूरत होगी, मगर फिलहाल घर और सड़क दावा करने वाले नहीं। लिहाजा हमने अपना नजरिया बदल लिया है और अपनी शर्ट को एक खूबसूरत हसीना मानकर खुश होते हैं कि वह हमारे बदन से लिपटी तो है।

उसी तरह हमारी बोलियों में का के की भी अलग नहीं है। मैथिली और भोजपुरी में इन तीनों के बदले सिर्फ के प्रयुक्त होता है। जैसे राम के मेहरारू, राम के कनिया, अहमदिया के दुआर। वहीं अंगिका में इनकी जगह र इस्तेमाल होता है। राम र दुलहिन और अहमदिया र दरबज्जा। कहीं किसी लिंगात्मक विश्लेषण की जरूरत नहीं। आपकी कसम के बदले भोजपुरी भाई कहते हैं तोहार किरिया। हमार भौजी। हम बिहारवासी कई बार कह देते हैं तुम्हारा पापा, तुम्हारा मम्मी और हंसी के पात्र बन जाते हैं। वह इसलिए कि हम अपनी स्थानीय बोलियों में तोहार, तोरे, तोहर से ही बड़े, छोटे सबका का काम चला लेते हैं। मसलन तोहर बाबू या तोहर माय। अगर किसी बड़े को कहना होता है तभी अहां के बाबूजी या अपने के माताजी कहते हैं। यहां हिंदी में कहना पड़ता है, तुम्हारे पिताजी और आपका बेटा। बिहार में तो बेटा भी अहां के और पिताजी भी अहां के ही होता है।

बिहार में मूलतः चार भाषाएं हैं। भोजपुरी, मैथिली, अंगिका और मगही। इन्हें बोली कहकर इनका महत्व कम नहीं किया जा सकता है। मैथिली और भोजपुरी तो आज भी अंतरराष्ट्रीय सम्मान हासिल कर रही है, जहां तक मगही और अंगिका का सवाल है, ये भी प्राचीन इतिहास के दौर में अंतरराष्ट्रीय भाषाएं रह चुकी हैं। इनका हजारों साल का इतिहास है। अंगिका की अपनी लिपि है। इन भाषाओं का वर्तमान भले ही गर्त में हो मगर इतिहास कई भाषाओं से अधिक समृद्ध रहा है। हमें इन्हीं मातृभाषाओं का सूत्र पकड़ कर हिंदी का दामन थामना पड़ा है। अगर बंगाली, तमिल या कन्नड़ की टूटी-फूटी हिंदी को हम सहिष्णुता दर्शाते हुए झेल लेते हैं तो फिर राजस्थान के मारवाड़ियों, मध्यप्रदेश के बुंदेलियों और बघेलियों और भोजपुरियों, मैथिलों, अंगिका भाषियों और मगहियों को क्यों नहीं। भोपाल में मैं नहीं मे होता है और पत्थर नहीं, फत्तर। पंजाब में स्कूटर नहीं सकूटर होता है और धर्मेंद्र नहीं धरमेंदर। हमारे यहां भी सरक हेमामालिनी का गाल जैसा बनता है जनाब।

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