Friday, May 11, 2012

सेलिब्रिटी का सत्य


एक कहावत बड़ी मशहूर है..लीक छोड़ तीनो चले..शायर, शेर, सपूत.. मतलब साफ है. शायर, शेर और सपूत तीनों बनी बनायी लीक पर चलना पसंद नहीं करते. अपनी राह खुद बनाते हैं. मगर बदलते जमाने के साथ कहावत का अर्थ भी काफी बदला है.
आज ब्रेक द रूल ही रूल बन गया है. अगर आपको कोई नहीं जानता और नजर में आना चाहते हैं तो भी या फिर मशहूर हैं और कैरियर में आई स्थिरता की स्थिति में बदलाव चाहते हैं तो भी.
बने-बनाये र्ढे पर अगर आप चलेंगे तो किसी को नजर ही नहीं आयेंगे. ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं. हर जगह, हर फील्ड में. यह कोई नयी बात नहीं. चाहे आप राखी सावंत और पूनम पांडे को देखें, चाहे निर्मल बाबा या फिर इमरान हाशमी और इरफान जैसे अभिनेता. फिल्मी दुनिया तो जैसे रूल ब्रेकरों के उदाहरण से भरी है. अमिताभ तभी छाये जब उन्होंने राजेश खन्ना के रोमांसवाद को झटका देकर एंग्री यंग मैन छवि को पेश किया. शाहरुख ने बाजीगर और डर की नेगेटिव भूमिका स्वीकारी और बादशाह बन बैठे. हालिया उदाहरण देखिये विद्या बालन का डर्टी पिर के इमेज ब्रेकिंग किरदार ने उसे हीरोइन से हीरो बना दिया. जहां तक आमिर खान का सवाल है वे तो जैसे इमेज और रूल दोनों को ब्रेक करने के लिए ही बने हैं. पिछले 24 साल से हिंदी फिल्मों की दुनिया पर राज करने वाले 47 वर्षीय आमिर ने शुरुआत चाकलेटी भूमिका से की मगर जल्द ही जो जीता वही सिकंदर की मदद से एक संवेदनशील कलाकार की छवि बनाने में कामयाब हुए. उस छवि के सहारे रंगीला और राजा हिंदुस्तानी तक का सफर तय किया. फिर सरफरोश से छवि बदलने की कोशिश की. लगान के जरिये तो उन्होंने फिल्म निर्माण में ही छलांग लगा दी.
लगान कई मामलों में उनके जीवन का टर्निग प्वाइंट साबित हुई. इस फिल्म की अपार सफलता के बाद उन्हें लगा कि देश और समाज को केंद्र में रख कर फिल्में बनानी चाहिए. इससे पैसे तो बनते ही हैं, छवि भी निखरती है.
दरअसल भारतीय दर्शन को ठीक से समझने वाले जानते हैं कि महज पैसा कमाने से एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति संतुष्ट नहीं हो सकता. वह जय-जयकार भी चाहता है. महत्वाकांक्षा के कई स्तर होते हैं. यही वजह है कि एमजी रामचंद्रन, एनटी रामाराव और अमिताभ जैसे अभिनेता राजनीति में कूद पड़ते हैं. राजकपूर मेरा नाम जोकर बनाकर अपनी गाथा सुनाने निकल पड़ते हैं. बिल गेट्स जैसे कई धनी अपनी संपत्ति दान करने पर उतारू हो जाते हैं.
बहरहाल आमिर ने भी लगान के बाद रंग दे बसंती जैसी देशभक्ति फिल्म और तारे जमीं पर व थ्री इडियेट्स जैसी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करनी वाली फिल्में स्वीकारी. अब लोगों के सामने सत्यमेव जयते है. संभवत: आमिर की सबसे महत्वाकांक्षी पेशकश. वे इस पेशकश के जरिये पूरे देश पर छा जाना चाहते हैं और लगभग छा रहे हैं. उनकी पब्लिसिटी टीम ने कोई कसर नहीं छोड़ी है. टीम को पता है कि पहले एपिसोड के बाद क्या माहौल बनेगा और उसे कैसे कैश कराया जा सकता है. अशोक गहलोत से शायद पहले ही बात हो चुकी होगी. अगले एपिसोड के लिए भी कोई ऐसी ही योजना होगी. मगर..
मगर, यहां दो सवाल है. पहला यह शो जिस कथित उद्देश्य से बनाया गया है उसमें वह कितना खरा है? दूसरा इससे अजिर्त छवि कितनी टिकाऊ होगी?
पहले पहला सवाल. जैसा अभी तक लग रहा है, यह शो भारतीय समाज की मूलभूत सामाजिक समस्याओं को पेश कर देश और समाज में एक सार्थक बहस शुरू कराना चाहता है. एक आम टीवी शो के नजरिये से हमें इसकी गुणवत्ता की समीक्षा करनी चाहिए. जैसे कि मूवर्स एंड शेकर्स एक टीवी शो है, इंडियन आइडल दूसरा, एक कॉफी विद करण भी है, एक सच का सामना भी है. जहां तक सत्यमेव जयते का सवाल है, उसने दूसरे शोज के बरक्श मनोरंजन को कतई तरजीह नहीं दी है. संदेश ही उसका मकसद है. शो ने आमिर को प्रेजेंटर चुना है ताकि संदेश प्रभावशाली बन सके और अधिकतम लोगों तक जा सके. जैसे कोई विज्ञापन धोनी या सचिन को या शाहरुख को रखता है. केबीसी ने अमिताभ को रखा और दस का दम ने सलमान को. इस लिहाज से आमिर शो के प्रेजेंटर भी हैं और ब्रांड अंबेस्डर भी. ये दोनों चीजें इस शो का प्लस प्वाइंट हैं. अब अभिनय की कसौटी पर इसे तौला जाये. आमिर ने जिस तरीके से शो को पेश किया, उनकी एंट्री, संवाद अदायगी, साक्षात्कार लेने का तरीका, आंकड़े पेश करने का तरीका और आंसू बहाना भी. शो को गंभीरता से देखने वाला हर इनसान यहां तक कि आमिर का अंध प्रशंसक भी कहेगा यह शो का सबसे कमजोर पहलू है. बिल्कुल नाटकीय,
न एंट्री ठीक थी, न संवाद अदायगी, न तीनों महिलाओं से बात करने का तरीका और न ही आंसू बहाने का अंदाज . इसकी तुलना जरा अमिताभ के केबीसी से या शेखर सुमन के मूवर्स एंड शेकर्स से करें. शाहरुख के पांचवीं पास, सलमान के दस का दम या यहां तक कि राखी सावंत के शो से भी नहीं कर सकते. आमिर बिल्कुल बेजान प्रेजेंटर लग रहे थे. शो में महिलाओं के नकली आंसू न होते तो लगता लोकसभा टीवी पर कोई टॉक शो चल रहा है.
अब शो के कंटेंट पर बात करें, तीन पीड़ित महिलाओं की कहानी सुनायी गयी, कुछ आंकड़े पेश किये गये और यह बताया गया कि लिंग भेद शहरी समाज में अधिक है. दिल्ली की डाक्टर कथा शो का प्लस प्वाइंट थी, मगर एक पीड़ित महिला का वीभत्स चेहरा दिखाना शो के कंटेंट की कमजोर कड़ी. आपमें दम नहीं था इसलिए एक वीभत्स तस्वीर दिखाना पड़ा. समाचार चैनलों में खास तौर पर एनडीटीवी में इस तरह के इश्यूज बड़े शानदार तरीके से दिखाये जाते रहे हैं. निर्माता-निर्देशक को इन शोज से सीखना चाहिये था कि कैसे एक हार्डकोर इश्यू को बेहतर प्रेजेंटेशन के साथ पेश किया जा सकता है. अब सवाल है कि क्या इस शो से आमिर खान को मेधा पाटेकर या अन्ना हजारे या बाबा आम्टे जैसी छवि हासिल हो पायेगी? पहले एपिसोड ने आमिर को बड़ा हाइप दिया है. टीवी से लेकर फेसबुक तक उनकी जय-जयकार है. मगर कुछ विरोध के भी स्वर हैं. कुछ सवाल हैं. सवाल इसलिए हैं कि एक सेलिब्रिटी चाहे तो रातो रात सांसद बन जाता है या समाजसेवक बन जाता है.
आमिर को समझना होगा कि फिल्म की कहानी और समाज के मुद्दों में फर्क होता है. यहां महज अभिनय से काम नहीं चलता. लोग बरसों रास्ते की धूल फांकते हैं. अस्वीकार और अवहेलना सहते हैं. समझ विकसित करते हैं, पीड़ितों के जीवन का हिस्सा बनते हैं. लाठियां खाते हैं, जेल जाते हैं तब जाकर नायक बनते हैं. गरीब की कुटिया में घुस कर रोटी खाने और उसकी कहानी सुनते नकली-आंसू बहाने से लोग नायक नहीं बना करते.
अगर कोई समाज इस आंसुओं को देखकर भावुक हो जाता है तो इसे उस समाज की कमजोरी समझना चाहिये. समझना चाहिये कि हम आज भी राजसत्तात्मक मनोवृत्तियों से उबर नहीं पाये. दुख है बुद्धिजीवी वर्ग के लोग भी बड़ी संख्या में अह्लादित हैं. वे आमिर की पिछली फिल्म डेल्ही बेली का डीके बोस और उनकी पहली बीवी और बच्चों का दुख भूल जाते हैं. अगर आमिर सिर्फ पैसों के लिए ऐसा कर रहे हैं तो ज्यादा चिंता की बात नहीं, पर यदि वे सचमुच समाजसुधार बनना चाह रहे हैं तो उन्हें हूट करने की जरूरत है. साथ ही
ऐसे ट्रेंड को भी अंगूठा दिखाने की जरूरत है जो सेलिब्रिटी को रातोरात कुछ भी बनने की सहूलियत देता है.

1 comment:

sainti said...

achha lekh hai sir,

amir ki khichai se aap bhi lime lite me aa gaye hai.
santram sahu