Saturday, May 19, 2012

प्रकृति से प्रेम और परंपराओं की छांव


जब भी मैं पर्यावरण के बारे में सोचता हूं, यह मुङो हमेशा से एक भारी भरकम शब्द की तरह लगता रहा है. जैसे किसी विदेशी आका ने गंवार भारत वासियों को एक लंबा-चौड़ा कठिन होमवर्क दे डाला हो और हम मन मार कर इसे पूरा करने का दिखावा करते रहते हैं. वृक्षारोपण की रस्म अदायगी सरकारी और गैरसरकारी मंचों पर उबाऊ भाषणों के साथ होती है और पांच-छह महीने बाद कोई गाय या बकरी बाड़ा तोड़कर मंत्री, विधायक या अफसर द्वारा लगाये गये पेड़ को चर जाती है. मगर जब अपनी परंपराओं की पड़ताल करता हूं तो प्रकृति से प्रेम के अनुष्ठान यत्र-तत्र बिखरे नजर आते हैं.
कोसी की भीषण बाढ़ के बाद जब मैं सहरसा-मधेपुरा और सुपौल के गांवों में अपने मित्र रूपेश के साथ भटक रहा था, तो एक गांव में एक सज्जन ने बताया कि महज 50 साल पहले तक कोसी के इलाके में तालाब या कुएं की खुदाई होती थी तो खुदाई के बाद उसका विवाह संस्कार संपन्न कराया जाता था. यह विवाह संस्कार सामान्य विवाह की तरह ही होता था, उसमें दूल्हे भी होते थे जो गांव के युवक होते थे. विवाह के उपरांत वे युवक गांव भर के दामाद माने जाते थे. युवक के माता-पिता और भाई-बहन भी उन्हें दामाद जी कहकर ही बुलाते थे. मैंने इस जानकारी की इस्तेमाल सुन्नैर नैका में किया है.
खैर! इस पोस्ट में मैं मुख्य तौर पर रविवार को होने के वाले वट सावित्री पूजन का जिक्र करना चाह रहा हूं. लगभग पूरे देश में ज्येष्ठ माह में बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है. पूजन विधि भी तकरीबन एक जैसी ही है. महिलाएं देवी सावित्री की याद में व्रत रखती हैं और बरगद के पेड़ के नीचे बैठ कर उसके सतीत्व की कथा सुनती है. वैसे सतीत्व शब्द आजकल बुद्धिजीवियों के बीच अस्पृश्य हो गया है. इसका अर्थ संकुचित कर दिया गया है और इसकी चर्चा करने वाला व्यक्ति बौद्धिक अपराधी मान लिया जाता है. बहरहाल अपने देश की अधिकांश महिलाएं अभी तक बुद्धिजीवी होने का दर्जा हासिल नहीं कर पायी हैं और न ही उन्हें इस वर्ग से बहिष्कृत होने का कोई अफसोस भी होता है. वे आम तौर पर अपने पति और बच्चों के बारे में अधिक सोचती हैं और सावित्री उनके लिए आज भी आदर्श हैं जो यमराज से अपने पति को जीत लेती हैं. वे इस मौके पर बरगद के पेड़ में जल डालती हैं और धागे से इसके तने को बांध कर बरगद से अपना रिश्ता और प्रगाढ़ करती हैं. हमारे धर्म ग्रंथ कहते हैं कि बरगद के पेड़ के जड़ में ब्रrा, तना में जनार्दन(विष्णु) और शिखर पर शिव का निवास होता है. चुकि बरगद की आयु बहुत लंबी होती है इसलिए इसे दीर्घायु होने का प्रतीक भी माना जाता है. हालांकि पहली नजर में लोग इसे दीर्घायु होने की इच्छा के साथ किया जाने वाला अनुष्ठान मान सकते हैं, मगर मुङो इस पर्व में अपने पूर्वजों के प्रकृति प्रेम की झलक मिलती है.
वर्तमान पर्यावरण संबंधी धारणाओं के अनुसार पेड़ का महत्व भले ही धरती को प्रदूषण मुक्त रखना भर हो, मगर हमारे ग्रामीण पूर्वजों के लिए जेठ के महीने में बरगद की छांव किसी वरदान से कम नहीं थी. उन्हें यह शायद ही पता होगा कि यह विशाल पेड़ आक्सीजन की मात्र बढ़ाता है और आक्सीजन हमारे स्वास्थ्य के लिए जरूरी है. मगर इतना उन्हें पता था कि भरी दुपहरी में थोड़ा सुस्ताने के लिए इससे बेहतर कोई दूसरी जगह नहीं.
उनके घर भी नहीं जिनकी खिड़कियां आम तौर पर बहुत छोटी होती थीं. उन दिनों आम तौर पर पूरा का पूरा टोला दोपहर का वक्त ऐसे ही पेड़ों या आम के बगीचों में गुजारता था. आज भले ही वट सावित्री पूजन के लिए हमें बरगद का पेड़ ढूंढना पड़ता है, उन दिनों बरगद गांव का हिस्सा हुआ करते थे, जो पीढ़ियों को अपने सामने बड़ा होते देखते. तभी रेणुजी ने अपनी पहली कहानी का सूत्रधार बरगद के पेड़ को ही बनाया जो एक गांव की कहानी कहता है. इन दिनों मैं रांची में हूं और पहली बार पत्नी को अकेले वट सावित्री पूजन करना पड़ रहा है. बरगद का पेड़ तो मिल गया है(कोकर मुहल्ले के हैदर अली रोड के ठीक समाने). मगर उसकी हालत दयनीय है. दो दुकानों के बीच यह बुरी तरह फंसा है. सामने वाला हिस्सा तो नजर आ रहा है. पीछे वाले हिस्से से होकर गुजरने का रास्ता नहीं है. पता नहीं औरतें कैसे धागा लपेटती होंगी. वैसे उस पेड़ में काफी धागा लपेटा हुआ नजर आ रहा है. किसी न किसी तरह से लपेटा ही गया होगा. कोकर चौक से लालपुर तक के रास्ते में संभवत: यही इकलौता वट वृक्ष है.
रविवार को अचानक बरगद बाबा का भाव बढ़ जायेगा. पूरे मुहल्ले की औरतें वहां सज-धजकर पहुंचेंगी और उनकी अभ्यर्थना करेंगी. मगर फिर एक साल के लिए लोग उन्हें बिसार देंगे. ऐन सड़क पर होने के बावजूद वह हर किसी के लिए अदृश्य हो जायेगा. लोग ऑटो पकड़ने के लिए वहां खड़े होंगे, उन्हें सिर पर छाया का अहसास होगा मगर इतनी फुरसत नहीं होगी कि पता कर सकें यह छांव किसकी है.

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