खुश होइये कि आप झारखंड में हैं


यह जो मेरे आलेख का शीर्षक है यह पहली नजर में किसी ट्रैवल स्पॉट के विज्ञापन का पंचलाइन लग सकता है. आप थोड़ा और दिमाग लगायेंगे और झारखंड से ठीक-ठाक जुड़ाव रखते होंगे तो कहेंगे कि इस लेख में मैं झारखंड की अजब और गजब कहानियों पर कोई व्यंग्य लिखने जा रहा हूं. मगर जब मैं यह कहूंगा कि यह कशीदा जो मैंने शीर्षक के रूप में लिखा है वह मेरे दिल से निकली हुई सच्ची आवाज है तो आप हैरत में पड़ जायेंगे. बहुत दिमाग लगायेंगे कि आखिर क्या कोई ऐसी वजह है जिससे झारखंड में रहने वालों को खुशी हो सकती है?
झारखंड जो संसाधनों की कॉरपोरेट लूट और उसके विरोध के नाम पर जारी नक्सली गतिविधियों, राजनेताओं के भ्रष्टाचार की नंगई, हर महीने चार दिन होने वाली बंदी और माफिया राज के कारण मशहूर है, वहां होने की वजह से भला मैं क्यों इतना खुश हो गया हूं कि आपसे भी कह रहा हूं कि खुश होइये कि आप झारखंड में हैं?
मैं पिछले छह माह से झारखंड में हूं और अब तक मेरे मन में भी झारखंड के प्रति करीब-करीब वही भाव रहा है जो मैंने इससे पहले वाली पंक्ति में जिक्र किया है. मगर पिछले दिनों मैंने दो समारोह में हिस्सा लिया और वहां का माहौल देख कर मेरे विचार बदल गये. पहला सेमिनार प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश जी की पुस्तकों के विमोचन का था. उस समारोह में मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, विधानसभा अध्यक्ष सीपी सिंह के साथ हरिवंशजी तो मंचासीन थे ही, रांची एक्सप्रेस के संपादक बलवीर दत्त भी मौजूद थे.
समारोह के दौरान झारखंड के हालात पर हरिवंश जी ने स्वाभाविक तौर से कई टिप्पणियां कीं. उन्होंने सरकार, राजनेता, उद्योगपति और अफसरों की कुछ इस तरह खिचाई की जैसे कोई अभिभावक अपने बच्चों की करता है. मैंने देखा कि तीनो राजनेता जिनमें एक सीएम, दूसरा पूर्व मुख्यमंत्री और तीसरा विधानसभा अध्यक्ष था, बड़े शिष्ट भाव से उनकी बातों को सुन रहा था.
यह अपने-आप में एक रोचक अनुभव था, खास तौर पर समय के उस दौर में जब एक पड़ोसी राज्य में हमने सुना कि एक व्यंग्यकार को मुख्यमंत्री पर व्यंग्य लिखने की बड़ी भीषण टाइप सजा भुगतनी पड़ी थी. यह वही समय है जब केंद्र सरकार सोशल मीडिया की नकेल कसने का विचार कर रही है और सत्ताधारी दल का एक सांसद मीडिया को औकात में लाने के लिए एक विधेयक पेश करने जा रहा है. मैं आपको बताऊं कि हैरत तो मुङो तब हुआ जब रांची एक्सप्रेस के संपादक बलवीर दत्त जी ने बोलना शुरू किया. उन्होंने अपने चुटीले अंदाज में सरकारों की कलई खोल कर रख दी. मुख्यमंत्री से मुखातिब होकर बलवीर दत्त जी ने कहा कि एक विधायक ने इन्हें मंत्री पद देने के बदले कुछ लाख रुपये प्रति माह रिश्वत देने की पेशकश कर डाली थी. उन्होंने झारखंड निर्माण के दस सालों की राजनीतिक कारगुजारियों पर खुल कर टिप्पणी की. अर्जुन मुंडा के चेहरे पर थोड़ी शिकन जरूर आयी, मगर वे विचलित नहीं हुए. बाद में बड़ी शालीनता से उन्होंने कई आरोपों के जवाब दिये, मगर अपने खिलाफ आरोपों को सुनने का उनका धैर्य लाजवाब था. बलवीर दत्त जी के प्रति भी उन्होंने अभिभावक जैसे सम्मान का ही प्रदर्शन किया.
दूसरा आयोजन एक मीडिया वर्कशाप का था. इस समारोह में भी संयोगवश हमारे प्रधान संपादक मौजूद थे. उप मुख्यमंत्री जब हॉल में पहुंचे तो उन्होंने सबसे पहले हरिवंश जी के पास जाकर सम्मान प्रकट किया. लोगों की बातें सुनी और पूरी विनम्रता प्रदर्शित करते हुए अपनी बातें रखी. कोई दंभ नहीं, उनकी कई मामलों में कुख्याति है, मगर दूसरों को सुनने का धैर्य उनमें भी है और दूसरों को सम्मान देने की भावना भी. वर्कशाप के दूसरे दिन का माहौल बड़ा रोचक था. एक तरफ योजना आयोग के सचिव थे तो दूसरी तरफ पंचायतों के मुखिया और जिला परिषद के उपाध्यक्ष.
सचिव महोदय ने ब्यूरोक्रेटिक हुनर के साथ सरकार की सदाशयता का बखान किया, मगर जिला परिषद के उपाध्यक्ष ने जमीनी हकीकत का बयान करते हुए उन्हें ऐसा धोया कि मंचासीन ग्रामीण विभाग के सचिव तो तनाव में नजर आने लगे. बहरहाल, सचिव महोदय उनकी और उनका पक्ष लेने वाले पत्रकारों के आरोपों को सुनते रहे और बाद में ब्यूरोक्रेटिक चतुराई का परिचय देते हुए उनका जवाब भी दिया. यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि यह सेमिनार सरकारी था और सचिव महोदय खुद आयोजक थे.
फिर आदिवासी एक्टिविस्टों की बारी आयी. उन्होंने तो सरकारी नीतियों और बाबुओं की कार्यप्रणाली की बैंड बजा दी. सेमिनार के विषय को पूरी तरह बकवास करार दिया. मगर लोगों ने इस पूरी बहस को पूरे धैर्य के साथ सुना और आरोपों के जवाब दिये. असहमति के स्वर को सुनने का यह धैर्य आज की तारीख में बहुत कम हुक्मरानों में बचा है. अगर झारखंड के लोगों के पास यह आजादी है तो निश्चित तौर पर यह खुश होने का विषय है. तमाम भ्रष्टाचार और विसंगतियों के बावजूद.

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