Friday, May 25, 2012

पूर्णिया के भादुरी और भादुरी की जागरी


पिछले दिनों संयोग से दो पुरानी किताबें मेरे हाथ लगीं. कहां मिली ये नहीं बताउंगा, जगह भले ही कहने को लाइब्रेरी थी मगर किताबें वहां सालों से डंप थी. मैंने दोनों अमूल्य किताबें चुरा लीं. मैं इस चोरी का पाप अपने ऊपर लेने और अगर कहीं इसकी सजा मिलती है तो भुगतने को तैयार हूं. सच पूछें तो मेरे मन में अब भी यह विलक्षण भाव बैठा है कि मैंने चोरी नहीं की है इन किताबों को जेलखाने से आजाद कराया है. बरसों बाद इन बड़ी किताबों को पाठक मिला, नहीं तो इनका दीमक का शिकार हो जाना तय था. दीमकों ने हमला शुरू कर भी दिया था..
बहरहाल मैं बकवास बंद कर इन किताबों के बारे में बताना शुरू करता हूं. पहली किताब जागोरी(हिंदी में जागरी) तो हिंदी पाठकों के बीच आज भी मशहूर है मगर मैं पिछले दस सालों से इसे तलाश रहा था मुङो कहीं मिली नहीं. सिर्फ सूचना मिली कि एनबीटी (नेशनल बुक ट्रस्ट) ने इसका हिंदी अनुवाद छापा था मगर.. कई बुक फेयर में एनबीटी वालों से पूछताछ की मगर उनके जेहन में यह किताब नहीं थी. मैं इस किताब को इसलिए तलाश रहा था कि इसके लेखक सतीनाथ भादुरी न सिर्फ मेरे गृह जिला पूर्णिया के वाशिंदे थे बल्कि मेरे प्रिय लेखक फणीश्वरनाथ रेणु के गुरु भी रह चुके हैं.
रेणुजी के लेखन पर भादुरी जी की दूसरी प्रसिद्ध रचना ढोढाई चरितमानस के प्रभाव की चर्चा और उस दौर के विद्वजनों द्वारा मैला आंचल को ढोढाई चरितमानस का अनुवाद करार देने के गरमागरम विवाद अपने जमाने में काफी मशहूर रहे हैं. बहरहाल उस जमाने में हिंदी साहित्यकारों ने ढोढाई चरितमानस का हिंदी अनुवाद कराया, तब जाकर यह विवाद शांत हुआ और कहा जाने लगा कि रेणुजी पर भादुरी जी की शैली का प्रभाव भर है..
हालांकि भादुरीजी हमेशा इस विवाद को नकारते रहे. मगर इसका नतीजा यह हुआ कि ढोढाई चरितमानस का हिंदी अनुवाद तो तड़ाक से हो गया. भादुरी जी के सबसे चर्चित कृति जागोरी का अनुवाद देर से हुआ. ढोढाई चरितमानस (लोकभारती प्रकाशन)आज भी मिल जा रही है मगर जागरी कहीं मिलती नहीं. मैंने ढोढाई चरितमानस पढ़ा है. सचमुच अद्भुत कृति है. एक अनाथ दलित (ततमा) युवक की स्वतंत्रता सेनानी में बदलने की कहानी को भादुरी जी ने रामचरित मानस के विभिन्न कांडों के आधार पर लिखा है. उस उपन्यास में भी बाल कांड से लेकर सुंदर कांड होते हुए लंका कांड तक की कथा है. इसके अलावा भादुरी जी की अन्य चर्चित रचनाएं हैं चित्रगुप्तेर फाइल और ओपरिचित. दोनों हिंदी में नहीं है इसलिए पढ़ नहीं पाया. मगर दोनों रचनाओं का परिवेश पूर्णिया जिला का है, ये कहने भर को बांग्ला उपन्यास हैं. इसमें कई शब्द ऐसे मिल जाते हैं जिन्हें सिर्फ पूर्णिया का वासी ही समझ सकता है. बहरहाल..मुङो जागरी की कहानी बताना है.
जागरी भादुरी जी का पहला उपन्यास है. मगर इसने अपने प्रकाशन के साथ बांग्ला पाठकों के बीच हलचल मचा दी ऐसा कहा जाता है.
कहानी पूर्णिया केंद्रीय कारा की है. जहां एक फांसी का कैदी है, उसे अगले सुबह फांसी लगनी है. वह फांसी सेल में बंद है. समय भारत छोड़ो आंदोलन के अंतिम दौर का है. युवक समाजवादी आंदोलनकारी है, उस पर तोड़फोड़, थाने में आगजनी जैसे आरोप हैं. उस दौरान मेरे गांव धमदाहा के थाने में आग लगाई गयी थी, संदर्भ वही है. उसी जेल में युवक के गांधीवादी कांग्रेसी पिता पॉलिटिकल वार्ड में बंद हैं, महिला वार्ड में उसकी माता हैं और जेल के बाहर युवक का छोटा भाई जो कम्युनिष्ट है, बैठा है. कहने को तो वह फांसी के बाद अपने भाई का शव लेने के बैठा है मगर उसके मन में हलचल मची है. उसी की गवाही पर उसके भाई को फांसी की सजा सुनायी गयी है. वह बार-बार सोच रहा है कि उसका बड़ा भाई समझ पायेगा कि सवाल फांसी का नहीं विचारधारा का है और उसका भाई समझ पायेगा कि उसने जो कुछ किया वह उसकी विचारधारा का तकाजा था. वह अपने विचार से कैसे पलट सकता था?
हलचल तो उस जेल में बंद फांसी की सजा का इंतजार कर रहे युवक और उसके माता-पिता के मन में भी है. सभी विचारधारा को जीवन का आधार मानते हैं और अपने मन में मचे हलचल को उजागर नहीं होने देना चाहते. किताब चार अध्याय में बंटा है. पहले अध्याय में फांसी के बंदी युवक के मन में शाम से लेकर भोरउआ(ब्रह्म महूर्त) तक उमड़ने वाले ख्यालों का खाका है. दूसरे में उसके गांधीवादी पिता का जो चरखा कातते हुए रात गुजारने की कोशिश कर रहे हैं. तीसरे में उद्विग्न माता है जो खुद को ही हत भागिनी मानती है और चौथे में युवक के छोटे भाई की कहानी जो सबसे अधिक परेशान है.
चारो अध्याय में विचारों से होते हुए भावनाओं तक की यात्र है. हर चरित्र खुद को जस्टिफाइ करता है, होनी को दिल से और असहजता का परिचय दिये बगैर स्वीकार करने की कोशिश करता है, मगर अंत में जब फांसी की घड़ी आने वाली होती है सभी पिघल कर मोम हो जाते हैं.
कसी हुई कथा और जीवन के विविध रंगों से भरपूर यह उपन्यास भारतीय साहित्य का एक क्लासिक है. मुझ जैसे साहित्य के छात्र के लिए एक पाठय़क्रम की तरह. (दूसरे उपन्यास तीन अध्याय की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, इंतजार करें..)

4 comments:

Girindra Nath Jha/ गिरीन्द्र नाथ झा said...

हम इंतजार कर रहे हैं

pushya mitra said...

कल सुबह प्रसिद्द लेखक मधुकर गंगाधर जी से रेणुजी और परती परिकथा पर लम्बी बात हुयी ... वे सुन्नैर नैका में रेणुजी का उल्लेख किया जाना ठीक नहीं मन रहे.. मन वहीँ अटका है... खैर आज तीन अध्याय की कहानी लिखूंगा..

चिन्मया नन्द सिंह said...

हम ऐसे नहीँ मानेँगे। अब जब पूर्णिया आइयेगा तो किताब लेकर आएं,मैँ फोटो कॉपी करवाकर पढ़ूंगा।

manavadhikar said...

जागोरी तो मैंने पढ़ी है. भला हो किताब चोरों का,यह किताब अब मेरे पास भी नहीं है. मगर ढोढाई चरित मानस नहीं पढ़ी है. मुझे मिली ही नहीं. जागोरी एक पुस्तक मेले में मिल गयी थी.

अरुण कुमार