तीन अध्याय : औरत की जिंदगी के बड़े सवाल


तीन अध्याय मूलत: नेपाली उपन्यास है और इसका असली नाम तीन घुम्ती है. इस उपन्यास का हिंदी में अनुवाद करते वक्त अनुवादक फणीश्वरनाथ रेणु ने इसका नाम इतना सपाट (तीन अध्याय) क्यों रखा यह बताने के लिए आज वे हमारे बीच उपलब्ध नहीं है. हम अनुमान भी नहीं लगा सकते.. इस उपन्यास के लेखक नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री(1959-60) विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला रेणुजी के बड़े भाई की तरह थे. उनके छोटे भाई तारिणी कोइराला रेणुजी के हमउम्र और हमसाया था.
भाया फणीश्वरनाथ रेणु: हम सब जनाते हैं कि व्यक्तित्व निर्माण के असली दौर में रेणुजी की फिनिशिंग कोइराला परिवार के संपर्क में हुई. नेपाल के राष्ट्रपिता कृष्ण प्रसाद कोइराला की सरपरस्ती में कोइराला परिवार के दूसरे बच्चों के साथ रेणुजी की पढ़ाई भी विराटनगर के आदर्श विद्यालय से बनारस के काशी हिंदू विश्वविद्यालय तक हुई. रेणुजी इसी वजह से नेपाल को सानो अम्मा(मौसी) कहते रहे हैं. उन्होंने नेपाल की राणाशाही के खिलाफ संघर्ष में अपने मित्रों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध लड़ा और उसी दौर में नेपाल के पहले आकाशवाणी केंद्र की स्थापना भी की. इस पर रेणुजी ने बाद में एक लंबा रिपोर्ताज भी लिखा, जो इन दिनों नेपाली क्रांति कथा के नाम से पुस्तकाकार में उपलब्ध है. अपने रिपोर्ताजों में रेणुजी ने वीपी कोइराला(विश्वेश्वर) की साहित्यिक प्रतिभा का कई दफा जिक्र किया है. हालांकि पढ़ते वक्त हमेशा लगता था कि एक बड़ा लेखक कम चर्चित लेखक को स्थापित करने का प्रयास कर रहा है.
तीन अध्याय(तिन घुमती) पढ़ने के बाद लगा कि यह लेखक कई मामलों में हिंदी के अधिकांश बड़े लेखकों(रेणु समेत) से सोच और कथा रचना के मामले में आगे है. लेखक सचमुच रेणु के गुरु बनने की काबिलियत रखता है. इस उपन्यास को पढ़ने के बाद मन हैरत से भर उठता है कि इसे 1968 में लिखा गया है, नारी स्वतंत्रता के विषय पर हिंदी क्या संपूर्ण भारत में इससे सटीक उपन्यास आज तक नजर नहीं आता. इससे भी अधिक हैरत की बात तो यह है कि इस उपन्यास को लिखने से महज आठ साल पहले लेखक अपने देश के प्रधानमंत्री पद का निर्वहन भी कर चुका है. इसके बावजूद उसकी कलम की धार कुंद नहीं होती. खैर, अब बातें तीन अध्याय की.
सौ पन्नों का एक बड़ा उपन्यास : यह उपन्यास मुश्किल से सौ पेज का है. एक अधेड़ महिला अपने जीवन के पन्नों को पलट रही है. उसकी बेटी का प्रेमी उससे मिलने आने वाला है, वह अपनी बेटी की पसंद पर मुहर लगाने के लिए सौ फीसदी तैयार है. मगर मन उद्विग्न है और वह अपने पिछले जीवन की कहानी पर एक नजर डाल रही है. वह सोचती है कि उसने सिर्फ तीन फैसले लिए इसके अलावा उसके जीवन में और महत्वपूर्ण है भी क्या.. मगर असलियत यह है कि उसके द्वारा जीवन के तीन मोड़ पर लिये गये तीन फैसलों ने उसे एक अनूठा व्यक्तित्व प्रदान किया है जो दुनिया भर की दूसरी महिलाओं के लिए रश्क का विषय हो सकता है.
पहला फैसला : पहला फैसला उसने किशोरावस्था और जवानी की दहलीज पर लिया. वह वैश्य जाति की कन्या थी, मगर उसे प्रेम एक ब्राह्मण युवक से था. हालांकि जातिगत व्यवधान से बड़ा एक दूसरा व्यवधान था. युवक क्रांतिकारी था और उसका परिवार शासन का करीबी. मगर उसने अपने प्रेम को अपनाने का फैसला किया. शहर के एक छोटे से किराये के मकान में जहां वह युवक अकेले रहता था वह भी एक दिन रहने चली गयी. बिना कोई बखेरा किये, माता-पिता ने उससे संबंध तोड़ लिया. मगर उसके प्रेम ने उसका स्वागत किया. यह उसका पहला फैसला था. नयी गृहस्थी शुरू हुई. घर में उसके प्रेमी के अलावा उसके क्रांतिकारी दोस्त जुटते और बहस-मुहाबिसों का दौर चलता रहता. उसने अपने प्रेमी के दोस्तों को ही अपना परिवार मान लिया और उस समूह की एक सदस्य बन गयी. समूह का एक युवक उससे काफी करीब था. चुहुल भी करता और अपनी बातों से उसके दिल को भी सहलाता. जहां उसका पति व्यवहार में औपचारिक रहता वह युवक उसके जीवन में आराम और उमंग लाने की कोशिश करता रहता.
दूसरे फैसले की उधेड़बुन: इसी बीच पुलिस का छापा पड़ा और सारे युवक गिरफ्तार कर लिये गये. अब वह अकेली पड़ गयी. शहर में ही उसका मायका था मगर वहां जाने का सवाल ही नहीं था. वह अकेली ही उस घर में पड़ी रही. सदमे की हालत में उसके दो-तीन दिन गुजरे. तभी एक दिन उससे सहानुभूति जताने वाला युवक उसके घर आ पहुंचा. उसे जेल से छोड़ दिया गया था. उस युवक को देख कर उसे लगा कि जैसे खोयी हुई जिंदगी दुबारा मिल गयी. कई दिन बाद उसने घर में खाना बनाया, उस युवक को खिलाया और अपने पति के लिए जेल भिजवा दिया. युवक उसके साथ ही रहने लगा. वह उसकी सारी तकलीफों का ख्याल रखता, जरूरी सामान खरीद कर लाता और उसे खुश रखने की कोशिश करता. वह भी जीवन को दुबारा र्ढे पर लाने में जुट गयी. रोज पति के लिए खाना बनाती, उसके कपड़े साफ करती और जेल भिजवाती, शेष समय उस युवक के साथ हंसी-खेल में गुजारती. हालांकि वह युवक उसके पति के लिए खाना पहुंचाने और उस युवती द्वारा अपने पति अधिक ख्याल रखने की बात को पसंद नहीं करता. वह हमेशा अनमनापन दिखता और कई बार संकेत देता कि वह उस युवती के प्रति आशक्त है. युवती को भी वह युवक पसंद था, उससे आकृष्ट भी थी, मगर वह उसका पति नहीं था न ही हो सकता था यह उसे पता था. कुछ दिनों बाद युवक उससे शारिरिक संबंध की अपेक्षा करने लगा. युवती ने उसका विरोध किया. वह पशोपेश में थी. युवक का साथ, उसका व्यवहार उसे भाता था, यह प्रेम जैसा ही कुछ था. एक दिन उसने सोचा कि यह आखिर हो क्या रहा है.. क्या वह अपना शरीर अपने पति के लिए बचा कर रख रही है..? .. और हृदय..? हृदय में सबसे ऊंचे स्थान पर आज भी उसका पति ही है.. मगर यह युवक जो उसके पति का साथी है.. अभ उसका भी घनिष्ट साथी बन चुका है.. वह पूरे दिन अपना आनंद, अपना दुख और अपनी इच्छाएं उससे बांटती है.. नहीं बांटती है तो सिर्फ अपना शरीर.. अपना शरीर नहीं बांटने के पीछे तर्क क्या है..? यह शरीर उस युवक के स्पर्श से जूठा हो जायेगा क्या.? उसने अपने मन को टटोला क्या उसके मन में शरीरिक सामिप्य और संभोग की लालसा नहीं है.. ? अगर यह लालसा है तो क्या सिर्फ इसे इसलिए रोका जाये कि इस पर सिर्फ उसके पति का अधिकार है..? आज उसके मन में प्रेम की दहक है और सामने एक पात्र है जो उससे प्रेम की अपेक्षा रखता है.. मगर उसका अपने शरीर पर इतना अधिकार नहीं है कि खुशी के चार पल अपनी इच्छा से जी ले.. वह अपना हृदय तो बांट सकती है मगर शरीर नहीं.. और शरीरिक भोग का किसी संबंध के अस्तित्व से क्या लेना देना..?
शरीर किसका है : उसने फैसला कर लिया.? यह उसका शरीर है.. वह अपने शरीर को कुंठित नहीं करेगी.. उसका पति भी उसकी इस आजादी का सम्मान करेगा.. उसने दूसरा फैसला लिया और अपने इस साथी के साथ शरीर को प्यार करने की आजादी दी और यह प्रेम कई दिनों तक चला. मगर इस प्रेम ने उस प्रेम (अपने पति के साथ) की भावना को मिटाया नहीं. वह रोज उसे संवेदना के साथ अपने पति के कपड़े धोती, उसके लिए खाना बनाती और उसे जेल भिजवाती.. समय गुजरता गया. उसने एक अनूठा प्रेम किया था.. मगर उस अनूठे प्रेम को पाने वाला साधारण मनुष्य था.. वह प्रेम पाकर उससे दूर होता गया.. वह विवाहित भी था.. इसलिए जिम्मेदारी से और दूसरे विवाद से डरता था. उसे लगता कि अगर बात खुली तो उसका अपना जीवन चौपट हो जायेगा.. अब वह सिर्फ जरूरत के सामान भिजवा देता और आने के नाम पर बहाने बना देता.. युवती गर्भवती थी.. उसके बच्चे की मां बनने वाली थी.. मगर उस युवती के लिए यह किसी और का बच्च नहीं था.. उसका अपना बच्च था.. उसके अपने प्रेम की निशानी.. अपने शरीर का टुकड़ा .. इस बीच सारे क्रांतिकारी जेल से छूटने लगी.. मगर उनके बीच इस युवती की बदनामी की कहानी गूंज रही थी. बाद में यह भी पता चला कि उसका प्रेमी गद्दार था.. वह मुखबिर बन गया था.. इसलिए उसे दो-तीन दिन में ही छोड़ दिया गया .. दूसरे क्रांतिकारी साथियों के लिए वह एक गद्दार की प्रेमिका थी.. उसने अपनी छोटी सी खुशी के लिए एक नाजायज संबंध बना लिया.. खैर उसे दूसरों की प्रतिक्रियाओं से कुछ लेना देना नहीं था.. उसका पति उसके लिए ईश्वर स्वरूप था. उसे लगता था कि वह उसकी भावनाओं और विचारों को समझेगा, उसका सम्मान करेगा..
पुरुष कब समझेंगे : उसका पति जिस दिन जेल से छूटा वह अस्पताल में अपनी बेटी को जन्म दे रही थी. जेल तक उसकी कहानी पहुंच चुकी थी. उसका पति तनाव में था. वह अस्पताल में अपने पति का इंतजार करती रही.. मगर उसका पति नहीं आया. वह घर गयी तो पति की आंखों में वही तिरस्कार देखा जो दुनिया भर की आंखों में था. उससे कहीं अधिक ही था. उसे सदमा लगा, मगर उसने सोचा जो बात स्वत: समझी न जा सकी उसे वह बोल कर समझाने का प्रयास करेगी. मगर कई दिनों तक अबोला जारी रहा. पति की आंखों का नफरत मिटा नहीं. एक दिन उसने ही कोशिश की.. तो पति ने कहा तुम उससे प्यार करती हो तो उसके पास जा सकती हो..मुङो कोई परेशानी नहीं. उसने पति को समझाने की कोशिश की .. यह इसके और उसके वाला मामला नहीं है.. और प्यार खांचों में नहीं बंटता.. मगर पति समझने की अवस्था में नहीं था. एक दिन पति ने कहा, अगर तुम मेरे साथ रहना चाहती हो तो इस बच्ची को उसे दे आओ या अनाथालय में रखवा दो.. फिर सब ठीक हो सकता है.. इस पर युवती ने कहा कि मैं तुम्हें प्रेम करती हूं इसी वजह से तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं.. मगर तुमसे प्रेम करने का अर्थ यह नहीं कि मैंने जिसे इतने अरमानों से जन्म दिया है उसे प्रेम नहीं करती.. इसे खुद से जुदा नहीं कर सकती. इस बीच दिन गुजरते रहे.. पति उसकी बेटी की तरफ देखता भी तो काफी गुस्से से इससे वह बच्ची उससे डरने लगी.. उसे देखकर चीखने लगती.. उस बीच उसके प्रेमी ने भी संदेश भिजवाया कि वह उसके लिए रहने और खाने की व्यवस्था कर सकता है.. मगर यह संदेश उसके लिए तिरस्कार से कम नहीं था.. वह रहने और खाने के लिए किसी पर आश्रित नहीं थी.. वह अगर किसी के साथ थी या साथ रहने का फैसला किया था तो सिर्फ इसलिए कि वह उससे प्रेम करती थी.. वह न तो आश्रिता थी और न ही बनना चाहती थी.. सहजीवन का आधार उसके लिए सिर्फ प्रेम हो सकता था.. मगर इस बात को उसका पति भी नहीं समझ रहा था.. उसने भी एक दिन कह डाला कि वह कहीं अगल कमरा ले ले.. वह उसे हर माह कुछ पैसे भिजवा देगा..
तीसरा फैसला : अब तीसरे फैसले की घड़ी थी. उसने फैसला लिया. अपने पति को एक चिट्ठी लिख कर अपनी बातें जाहिर की और घर छोड़कर अनजाने सफर की ओर निकल पड़ी.. उसे शिक्षक की नौकरी मिल गयी और बेटी के साथ उसका जीवन गुजरने लगी. आज उसकी बेटी इतनी बड़ी हो गयी थी कि वह अपने जीवन का पहला फैसला लेने जा रही थी. उसने तय किया था कि यह फैसला सिर्फ उसकी बेटी का होगा. .उसकी राय वही होगी जो बेटी चाहेगी.. यहां आकर उपन्यास खत्म हो जाता है और हमारे सामेन कुछ अनुत्तरित सवाल रह जाते हैं. एक जीवन और उसको लेकर लिये गये तीन स्वतंत्र फैसले किस तरह एक औरत की आजादी को सुनिश्चित करते हैं.. यह इस कहानी में बहुत साफ तरीके से बताया गया है. यह एक आदर्शवादी कथा है. इसमें कई विंदुओं पर कई तरीके से विवाद की स्थिति बन सकती है. मगर वाद-विवाद से परे यह उपन्यास इतने गंभीर सवाल छोड़ जाती है जिसका जवाब देने में पीढ़ियां गुजर जाती हैं..
अंत में मेरी ही एक पुरानी कविता..

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