Wednesday, June 06, 2012

चकई के चकधुम, मकई के लावा


कल ही गांव से लौटा हूं.बाल और दाढ़ी में मकई का रेशा बरकरार है. हर दुआर पर बोलरी(दाना हटा लेने के बाद बचा भुट्टा) और डंठल का ढेर निगाहों से नहीं हटता.जब तक सोचा कि तसवीरें खीच लूं, देर हो चुकी थी और मैं गाड़ी पर सवार था.फिर भी सोनवर्षा से महेशखूंट के रास्ते में चलती गाड़ी से कुछ तसवीरें खीचने की कोशिश की जो काम चलाऊ भी नहीं है.मगर उन्हें आपके जेरेनजर पेश कर रहा हूं.. साथ में यह मिथलांग गपास्टक भी जो भुट्टों के बारे में है..
बचपन में हम एक दूसरे को पहेलियां बुझाते थे भुट्टे के बारे में .हरी थी मन भरी थी..लाख मोती जड़ी थी..राजा जी के बाग में ..दुशाला ओढ़े खड़ी थी.मगर मैंने कभी मकई को किसी राजा या रईस के बाग में नहीं देखा. भले मक्के दी रोटी गरीब की थाली से उठकर फाइव स्टार होटल तक पहुंच गयी, मगर मक्के की फसल हमेशा की तरह आज भी गरीबों की ही फसल है. जब पूरा मध्य और दक्षिणी बिहार सब्जियों की खेती से तसवीर और तकदीर बदलने में जुटा है. कोसी के किनारे बसने वाले लाखों किसानों ने न जाने क्यों मकई की खेती का रोग लगा लिया है.
कोसी के इलाके में मकई की फसल का फैलना मुङो नीतीश राज में सड़कों के निर्माण से जुड़ा नजर आता है. इस इलाके में पिछले कुछ सालों से चमचमाती सड़कों का जाल बिछ गया है और उन सड़कों के आधे हिस्से पर साल में छह महीने मकई सूखते हुए बड़े आराम से देखा जा सकता है. मगर मकई की खेती ही क्यों.. मुङो इसका जवाब नहीं मिलता.. इससे पहले लोग केले की खेती करते थे, जब इलाके में सड़कें नहीं थी. अक्सर किसान केला काटकर ट्रक पर लाद देते थे और टूटी सड़कों पर कलकत्ता(कोलकाता) या गोरखपुर की मंडी के लिए निकला नवगछिया का केला पसराहा के पास कहीं जाम में फंस जाता और साल भर की मेहनत ट्रक में गल जाती.. सड़कें ठीक हुई तो जाम लगना बंद हुआ..मगर लोगों ने केले की खेती करना ही छोड़ दिया.मकई के पीछे पड़ गये. पूरे इलाके में डिकाल्ब और मोनसेंटो जैसी बीज कंपनियों के इतने पोस्टर चिपके नजर आते हैं कि लगता है कंपनियों ने इस इलाके को गोद ले लिया है. पिछले सालों तक इन कंपनियों के बीज में गड़बड़ी की शिकायतें होती थीं और मकई में दाने ही नहीं आते..फिर किसान बीडीओ के दफ्तर के आगे जाकर फसल के ठूठ को जलाते..ब्लॉक स्तर के रिपोर्टर उनकी तसवीरें खींचकर अपने दफ्तर भेज देते.शुरुआत में यह पेज वन पर छपता फिर अंदर के पन्नों पर रूटीन की औकात में आ जाता..
बहरहाल इस बार कुछ अलग कहानी है. फसल जबरदस्त हुई है.. बंपर ..इतनी कि आंगन से लेकर दुआर तक सोने के कमरे में चौकी के नीचे तक हर जगह मकई ही मकई भरा नजर आता है..पुराना जमाना होता तो बच्चे घर छोड़कर भाग जाते, क्योंकि उस दौर में मकई से दाना खुद छुड़ाना पड़ता था.. मैं खुद इस हालात को ङोल चुका हूं.. सुबह होते ही शुरू हो जाता था.. खाना-नहाना और शौच छोड़कर जितनी तरह के काम होते.वह मकई छुड़ाते-छुड़ाते ही किये जाते थे.. अंगुलियां लहरने लगती..खैर! अब थ्रेसर मशीन आ चुकी है. पल भर में भुट्टे के दाने अलग हो जाते हैं.. थोड़ा शोर होता है, थोड़ी गर्द उड़ती है..मगर हाथों में छाले नहीं पड़ते..
मैं बता रहा था कि इस दफा बंपर फसल हुई है, मगर किसानों के चेहरे पर बंपर खुशी वाला भाव नहीं है. चेहरे से लावा फूट रहा है. कारण इस बंपर फसल को आठ रुपये किलो खरीदने वाला खरीदार भी आसानी से नहीं मिल रहा. किसान ऑफर दे रहे हैं, दो महीने बाद पैसा दे देना. मगर खरीदार मकई के ढेर में हाथ घुसाकर आइडिया लेता है, अभी कच्च है.. दो दिन और सुखाइये. किसान आसमान की ओर देखता है..भीषण गर्मी में भी बच्चों के शरीर पर हर जगह उग आई घमोरियों को देखकर भी ईश्वर से प्रार्थना करता है..चार दिन और रुक जाइये इंद्रदेव.फिर बरसियेगा जितना बरसना होगा..
व्यापारी दो दिन बाद की बात कह कर चला जाता है, मगर किसान को उसकी बात पर भरोसा नहीं. परसों वह सुबह से ही उसके दरवाजे पर खड़ा हो जायेगा. रिक्शे पर बिठा कर दरवाजे पर लायेगा. 5 क्विंटल मकई यानी महज 4 हजार रुपये.. उसे याद आ रहा है. इतना तो खर्च ही हो गया था.. फायदा तो एक पैसे का नहीं हुआ.. मगर दाम तो निकालना ही पड़ेगा नहीं तो धान कैसे रोपेगा..? इलाके में कई लोग व्यापारी हो गये हैं.. किसान को दो माह बाद पैसे देने का वादा कर लिया है.. महज ट्रक का किराया देकर गल्ले का बिजनेस शुरू है.. योजना है कि मुहदब्बू लोगों को तो साल भर टरकाया जायेगा.. जितने निखट्ट थे सब व्यापारी हो गये हैं.. मगर किसान को खुद व्यापारी बनने की हिम्मत नहीं..
वह मर कर फसल उपजायेगा और जैसे-तैसे फसल बेच कर जो पैसा मिला उससे साल भर खेपने की कोशिश करेगा.. जिस साल किसी फसल का बेहतर दाम मिल गया.. कांवर सजा कर बोलबम चला जायेगा या बेटी का बियाह कर लेना.. छुट्टा हुआ तो गांजा पीके ताश खेलने का हुनर सीख लेगा और मन फिर भी नहीं संभला तो एक ठो मडर करके जेल में जा बैठेगा..मगर बिजनेस उससे नहीं होगा.. फसील को व्यापारी को ही बेचेगा..
एक मित्र के घर गया था.. लौटते वक्त सहरसा-बैजनाथपुर वाला रास्ता पकड़ा गया. सड़क के किनारे एक धूर जमीन ऐसी नहीं मिली जिस पर मकई, बोलरी या डंठल न हो.. पता नहीं क्यों इस साल पूरे कोसी वालों ने एक साथ मकई की खेती क्यों कर डाली.. अब आठ रुपये में दो महीने के उधार पर बेचने के लिए व्यापारी के दरवाजे का चक्कर लगा रहे हैं.
शाम ढलने लगी हैं..सोचते-सोचते आंखों के आगे धुंधलका छाने लगता है.. हर तरह मकई का पीला रंग किसी जल समूह सा नजर आने लगता है.. ऐसा लगता है फिर से बाढ़ आ गयी है.. कोसी वाले फिर से एक डूब का शिकार हो गये हैं.. सफर जारी रहता है..कंडक्टर उठाता है.. उठिये महेशखूट आ गया है.

2 comments:

सचिन .......... said...

कहने से कम होता है दुख, लिखने से आधा रह जाता है दर्द। लेकिन दिक्कत यह है कि ऐसे दर्द का अंबार है। अभी अभी एक रिपोर्ट देख रहा था। लहसुन किसान परेशान है। पांच रुपये किलो में किसान से खरीदा गया लहसुन रसोई में पहुंचते पहुंचते 100-150 रुपये प्रति किलो हो जाता है। ईश्वर को मरे हुए अरसा हो चुका है, और सरकारी ईश्वर अपने बाथरूम पर खर्च किए गए 35 लाख रुपयों पर मुतास कर रहे हैं।
लाल पट्टी फैल नहीं रही और उम्मीद भी नहीं, तो क्या वोट से ही भविष्य बदल जाएगा?
तहरीर चौक किसी चिड़िया का नाम है, सचमुच यह इसी दुनिया में घटित कोई घटना है।

पशुपति शर्मा said...

किसानों की ये 'डूब' कितनी खतरनाक है... ताश की गड्डियों से जेल की सलाखों तक का खाका... किसानों के हक में क्यों पड़ता है फाका?