Saturday, June 30, 2012

वासेपुर के मुकाबले खड़ा है विशनीटीकर


जहां देश भर में वासेपुर के रंगदारी और गुंडागर्दी की चर्चा है धनबाद के पड़ोसी जिले गिरिडीह के विशनीटीकर गांव के लोगों ने शांति और व्यवस्था की ऐसी मिसाल कायम की है जिस पर दुनिया भर के काबिल मुल्कों को भी रश्क होगा. कभी अपराध और आंतक के लिए कुख्यात इस गांव के लोगों ने 18 साल से थाना-कचहरी का मुंह तक नहीं देखा है. इस गांव के लोगों ने यह कमाल सिर्फ साथ बैठने की समझदारी विकसित कर किया है. आज गांव के तमाम विवाद ग्राम सभा में सुलझा लिये जा रहे हैं. दरअसल अनुराग अपनी फिल्म में जिस वासेपुर को दिखा रहे हैं वह दौर बिहार और झारखंड में काफी पहले बीत चुका है. नई सदी ने इन दो राज्यों को शांति का उपहार दिया है. यहां के लोग वासेपुर की बदनाम कहानी को नहीं सुनना चाहते हैं. उन्हें विशनीटीकर जैसे गांवों की कहानियां अधिक लुभाती है. गिरिडीह के एक पत्रकार बंधु विनोद पांडे ने विशनीटीकर की कथा लिखी है. इस कथा को हमने इस बार पंचायतनामा में प्रकाशित किया है. पूरी कथा आप वहां पढ़ सकते हैं. कहानी की छोटी सी झलक इस पोस्ट में..
गावां प्रखंड मुख्यालय से दस किलोमीटर की दूरी पर बसा यह गांव पहले काफी पिछड़ा हुआ गांव माना जाता था. अस्सी और नब्बे के दशक में गांव में अपराध इस कदर बढ़ गया था कि लोग बाग इस तरफ फटकने से घबराते थे. इसी बीच 1993 में यहां ग्रामीणों ने राजकुमार यादव और बैजनाथ यादव के नेतृत्व में ग्राम सभा का गठन किया और इस सभा ने विशनीटीकर की तकदीर बदल दी. गांव में ग्राम सभा के गठन के बाद पिछले 18 वषों से एक भी मामला थाना नहीं पहुंचा. ऐसी बात नहीं कि मामला को थाना जाने से रोका जाता है. बल्कि परिस्थितियां इतनी बदल गयी है कि अब थाना जाने की जरूरत नहीं होती.
गांव में हर सप्ताह ग्राम सभा की बैठक होती है जहां विवादों को आपस में बैठ कर सुलझा लिया जाता है. पिछले 18 वषों में इस सभा ने 200 से ज्यादा विवाद निबटाये हैं. सभा अपराध के अनुरूप अपने स्तर से दोषी को दंडित भी करती है. यह गांव मिश्रित आबादी की बस्ती है. जहां हरिजन, मुस्लिम, यादव, ब्राह्मण जाति के करीब दो हजार लोग रहते हैं. किंतु गांव में जातीय विवाद और द्वंद का अब नामोनिशान नहीं है. विशनीटीकर की यह सभा केवल विवादों के निबटारे तक ही सीमित नहीं है बल्कि गांव के विकास के लिये सरकारी राशि की भी मुहताज नहीं. श्रमदान से यहां लोगों ने पालमो तालाब, खां आहर और गुडरी तालाब का निर्माण किया और उसकी मरम्मत की. इस तालाब से भीषण गरमी में भी यहां फसल लहलहा रही है. ग्रामीण सजग हुए तो मनरेगा और कई योजनाओं की अच्छी तसवीर झलक रही है. सरकारी मदद से गांव में 13 कूप, 5 चापानल लगाये गये. जिस गांव में कभी कायदे की पगडंडी नहीं थी, वहां मालडा से नीमाडीह तक पक्की सड़क है. गुणवत्ता भी ऐसी कि तीन वर्ष बाद भी सड़क चकचक करता है. ग्राम रक्षा दल के सहयोग से गांव में सखुआ, महुआ के करीब 20 हजार वृक्ष सुरक्षित हैं. इसी तरह शिक्षा पर भी अब गांव में विशेष बल है. ग्राम सभा में ही विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति पर चर्चा होती है व खर्च जन सहयोग से उठाया जाता है. दस वर्ष पूर्व ही गांव में बिजली आ गयी.

1 comment:

ratnakar mishra said...

विशनीटीकर एक अच्छा उदहारण है ,जहाँ लोग वासोपुर
कि चर्चा कर रहे है वहाँ इस गावँ कि भी चर्चा होनी चाहिए ..