Monday, July 02, 2012

असम की बाढ़, कोसी के लिए इशारा


असम इन दिनों भीषण बाढ़ का सामना कर रहा है. सौ से अधिक लोग इस बाढ़ की भेंट चढ़ चुके हैं, इसके अलावा राज्य के 23 में से 21 जिलों के 20 लाख से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित होकर विस्थापन का दंश ङोल रहे हैं. विश्व प्रसिद्ध काजीरंगा नेशनल पार्क पूरी तरह जल प्लावित हो गया है. आम तौर बिल्कुल पड़ोस में रहने के बावजूद हम कोसी वासी असम के संकट से बिल्कुल निस्पृह रहते हैं. इसमें कुछ दोष स्थानीय मीडिया का भी है, जो पूरे उत्तर पूर्व की खबरों को जगह की बरबादी मानकर रिजेक्ट कर देता है. मगर असम की बाढ़ की खोजखबर रखना हम कोसी वासियों के लिए नितांत आवश्यक है. क्योंकि वह ब्रह्मपुत्र नदी के आसपास जो घटनाएं घट रही हैं, वे कोसी के इलाके के लिए इशारा हैं. अगर हम समय से न चेते तो आने वाले वर्षो में हमारे साथ भी ऐसी ली घटनाएं पेश आएंगी.
अगर आप खबरों पर पैनी नजर रखते हैं तो आपको मालूम होगा कि असम बाढ़ से प्रभावित होने के मामले में पूरे देश में सबसे अव्वल है. तकरीबन हर तीसरे साल यहां ऐसी ही विनाशकारी बाढ़ आती है और भारी तबाही मचाती है. हर बार जैव उद्यान्नों के साथ-साथ बड़े-बड़े चाय बगान डूब जाते हैं. लाखों लोग सड़क पर आ जाते हैं. बाढ़ असम के लिए एक रूटीन आपदा का शक्ल ले चुकी है. ठीक उसी तरह जैसे दरभंगा-मधुबनी-समस्तीपुर के इलाके में हर तीसरे साल बाढ़ आ ही जाती है. हर बार सरकार, स्थानीय प्रशासन और आवाम डट कर बाढ़ का मुकाबला करते हैं, मगर बाढ़ के मूल कारण पर हाथ रखने में परहेज करते हैं.
दरअसल इस आपदा की वजह ठीक वही है जो कोसी और उत्तरी बिहार के दूसरे इलाकों में आने वाली बाढ़ का कारण है. वह है तटबंध. पता नहीं किस दौर में हमारे अभियंताओं ने बाढ़ से बचने के लिए इस बेहूदा तरकीब को ढ़ूंढ़ निकाला था? ऐसा क्यों सोचा गया था कि नदियों के किनारे मिट्टी की दीवार खड़ी कर दी जाये तो बाढ़ का खतरा टल जायेगा? जैसे कोसी, बागमती, गंडक और महानंदा नदियों को मिट्टी की दीवारों से घेर दिया गया, ठीक वैसे ही ब्रह्मपुत्र को भी कैद करने की कोशिश की गयी. 1958-59 के आसपास यह तटबंध बना, इस तटबंध ने लगभग 25 साल तक असम की थोड़ी बहुत रक्षा की. मगर जैसे 1984 में सहरसा के नवहट्टा में तटबंध टूटने के बाद कोसी के तटबंधों का नाकारापन सामने आने लगा वैसे ही असम में 1986 के बाद तटबंध फटाफटा टूटने लगे. वजह वही थी. सिल्ट के कारण तटबंधों के बीच नदी उथली हो गयी थी. कैचमेंट एरिया में थोड़ी सी बारिश के बाद हालात बेकाबू होने लगे. तकरीबन हर दूसरे-तीसरे साल तटबंध टूटने लगे और ब्रह्मपुत्र का कहर बरपने लगा.
इन दिनों वहां जिओ फेब्रिक ट्रेक्सटाइल इंबेकमेंट बनते हैं. दरअसल जिओ फेब्रिक एक ऐसा टेक्सटाइल है जो तटबंध को दरार पड़ने से बचाता है. अपने इलाके में जो बोल्डर क्रेटिंग की तकनीक अपनायी जाती है वह इंजीनियर और ठेकेदारों को तो मुफीद लगती है मगर जिओ फेब्रिक टेक्निक इससे कम खर्चीली और ज्यादा उपयोगी होती है. मगर यह तकनीक भी फेल हो रही है. सबसे ऊपर वाली तस्वीर में जिओ फेब्रिक टेक्सटाईल तटबंध की हालत साफ़ नजर आ रही है. इस बार भी असम में तटबंध 12 जगहों पर टूटा है. वहां के हालात कोसी से अधिक खतरनाक हैं. इसकी वजह यह है कि ब्रह्मपुत्र बड़ी नदी है. इसमें अपेक्षाकृत अधिक पानी आता है. इसका कैचमेंट एरिया भी बड़ा है. यहां तटबंधों के बीच कोसी से अधिक सिल्ट भर गया है.
आने वाले दिनों में कोसी की भी यही हालत होने वाली है. कोसी में भी सिल्ट का भराव काफी अधिक है. तटबंध पर खड़े होकर समझा जा सकता है कि तटबंध के अंदर का तल बाहर के तल के मुकाबले कितना ऊंचा हो गया है. मगर हमारे यहां भी मुद्दे पर गौर करने की परंपरा का उतना ही अभाव है जितना असम में है. फिलहाल सरकार तटबंधों को मजबूत कर उस पर पक्की सड़क बनवाने में जुटी है. नदी के आर-पार एक पुल बन चुका है दूसरा सहरसा में बनने वाला है. एक और बराज के निर्माण की योजना है..मगर तटबंध की अवैज्ञानिकता को लेकर कहीं कोई बहस नहीं है. अगर ऐसा ही रहा तो आने-वाले कुछ सालों में हमारा भविष्य भी कुछ ऐसा ही लोगा. हर तीसरे साल तटबंध कई-कई विंदुओं पर टूटेंगा. इसका लाभ वशिष्ठ कंस्ट्रक्शन जैसी कंपनियों, हर साल तटबंध बचाने में जुटे अभियंताओं और बाढ़ के बाद राहत चलाने वाली संस्थाओं को होगा. आम कोसी वासियों को तो हर साल बाढ़ झेलना ही पड़ेगा. कोसी के संकट के बारे में मेरी एक पुरानी पोस्ट..

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