हे वधु से वेश्या तक चुनने के अधिकारी


अजीज मित्र जयंत मास कम्यूनिकेशन ग्रेजुएट हैं, मगर कैरियर के रूप में उन्होंने रेलवे की नौकरी चुनी. कहा जाना चाहिए इस नौकरी ने ही इन्हें चुन लिया. लखनऊ में रहते हैं.. नौकरी के सिलसिले में पूरा देश घूमते हैं. कोर्स करने के बाद जो लिखने का सिलसिला छूटा वो दस साल बाद अब जारी हुआ जब विभाग की ओर से एक प्रतियोगिता आयोजित कराई गयी. इस प्रतियोगिता में उन्होंने महिला सशक्तिकरण पर यह आलेख लिखा है. आलेख पढ़िये और उनकी भाषा की धार को एक बार फिर से महसूस कीजिये.. धार तेज है.
कहानी पुरानी है मगर प्रसंग नया. मुङो समझने के लिए बहस करो. नीति-नियमों में आजतक बांधे रखा. फिर भी आत्मीय संतुष्टि नहीं मिली. मैं तो कहती हूं सड़क से संसद तक खुले मंच पर बहस करो. तुमने कोई कसर नहीं छोड़ी हमें रोकने की. कभी चार दीवारी तक सीमित किया. कभी पढ़ने नहीं दिया. पर्दा को मेरा श्रृंगार, चौखट को मर्यादा बनाकर सीमाएं तय की तुमने.तुम कितने महान हो, घर के मुखिया हो, तुम्हारी पहचान है. तुम्हें अपने नाम पर गर्व है, जबकि हमें तो पप्पू की मां कहके ही नवाजा. वधु से वेश्या तक चुनने के अधिकारी हो. मैं गलत नहीं हूॅ तो शासन की परिभाषा आप मुझसे जानो. पहले पिता का, फिर भाई का, उसके बाद पति परमेश्वर का, फिर पुत्र का. जब तक इहलीला समाप्त नहीं होती शासन ही शासन.
तुम्हे बेशर्म कहूॅ तो गलत नहीं होगा. तुमने कहां था मैं झुकता नहीं हूॅ परन्तु विपदा के पल तुम झुके थे एक स्त्री की प्रतिमूर्ति के सामने. वो दुर्गा थी, काली थी, वो भी एक स्त्री थी. पर शायद वहां जरूरत थी. अब क्या.. बीत गये दु:ख के पल, आ गयी खुशहाली. भूल गये तुम भी, थी कोई औरत. खैर छोड़ो तुम्हारी आत्मीयता तो गुलाम है ओछी मानसिकता की. जिसमें केवल सिर्फ अहंकार का वास है.
मेरी एक पहचान थी. प्राचीन काल में हम शिक्षित थे. तुम्हारे बराबर के दज्रे में थे. हमारी योग्यता का लोहा माना तुमने ही. विश्वास न हो तो पंतजलि, कात्यायन के पन्नों को खोल के देखो. साध्वी, गार्गी, मैत्रेयी, मीरा सभी मिलेंगी. ऋग्वेदिक ऋचाएं आज भी गवाह हैं हमारी. आज भी जेहन में सभी बातें दफ़न हैं.तुम्हें विज्ञान पर भरोसा है, तो सुनो. मानव जाति को केवल पुरुष या स्त्री में ही नहीं बांटा जा सकता हैं. हम क्या हैं, कैसे हैं, यह क्रोमोसोम तय करते हैं. यह जोड़े में आते हैं. हम में क्रोमोसोम के 23 जोड़े रहते हैं. हम पुरुष हैं या स्त्री, यह 23 वें जोड़े पर निर्भर करता है. अब बताओ, इसमें मेरी क्या गलती जो तुम मुङो दासी समझते आये हो.
बाल विवाह के समय हाथ नहीं कांपे तुम्हारे. उल्टे गाली दी तुमने. प्यारी नहीं डायन, कुल्टा, अभागन, बनायी गयी. अभी कहां पूरी हुई तुम्हारी दिल की मुराद. तुमने जलती चिता पर मुङो लिटाया. नाम दिया सती. एक पावन पुनीत धार्मिक कार्य.तुम्हारी आत्मीयता आज भी जिंदा है. बलात्कार, दहेज कांड, छेड़खानी के बहाने. हे पुरूष परमेश्वर कब समझोगे अपनी मर्यादा. लाज करो शान मत बघारो. तुम याद रखो-
मैं न कैदी हूॅ न भिखारी मेरा हक है एक समूची साबुत आज़ादी. मेरी सुनो
अन्तत: तुमने हमें विवश किया एक आन्दोलन के लिए. हम कहां चुप बैठने वाले थे. सम्भाली कमान बनाये कई कीर्तिमान. आज प्रतिभा राष्ट्र को संबोधित करती तो किरण की नई ऊर्जा ने नई दुनिया दिखायी. किया क्या एक प्रयास. शस्त्र उठायी, शासक बनी, तुम्हारी प्रिय कुलटा विश्व सुन्दरी बनी. रेल से जेल तक हमारा राज. जम़ी तो क्या आसमान भी हमारा गुलाम. सड़क से संसद तक छायी हूॅ. शांति पुरस्कार मेरे पास, मदर टेरेसा मेरी पहचान. कैसे रोकोगे मुङो. 9 मार्च को मिले आजादी के हिसाब से केवल 60 साल लगे हमारे प्रयास को. अभी आगे बढ़ी थी कि तुमने 33 प्रतिशत आरक्षण में बाधकर दायरे को सीमित करना चाहा. अब सभी तरह की गतिविधियां हमारे सामने छोटी है. शिक्षा, राजनीति, मीडिया, कला और संस्कृति, सेवा क्षेत्र, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आदी में हम बराबर के हिस्सेदार है.
मेरी बहुत-सी बहनें आज भी दासता की जंजीर से बंधी है. अशिक्षित हैं. पुरुषों के अत्याचार से बंधी है. उनके पल्ले बंधे हैं शराबी, जुआरी, बलात्कारी, पतियों का साथ. उन्हें भी आजादी दिलानी होगी. मुसलिम महिलाएं शरीयत कानून के तहत अधिकारों से वंचित हो रही हैं. तीन तलाक की व्यवस्था की आलोचना करनी होगी. बाल विवाह की प्रथा तो समाप्त हुई लेकिन बाल मजदूरी की प्रथा ज्यों की त्यों बनी हुई है, इसे खत्म करो. मुनिया को स्कूल भेजों. वैसे भी लड़कों की तुलना में बहुत ही कम लड़कियॉ स्कूलों में दाखिला लेती हैं. कई बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ देती हैं. इसका खास कारण लड़कों और लड़कियों के बीच लालन-पालन में हो रही असमानता है. कुछ राज्यों में साक्षरता दर को हासिल किया है. परन्तु कुछ राज्य से ही महिलाओं की स्थिति नहीं बदलती. ग्रामीण इलाकों में 18 साल से कम उम्र में शादी करने की परम्परा भी अहम हिस्सा है. समय से पहले विवाह का होना, फिर बच्चों के लिंग को चयन करने में कई बार भ्रूण हत्या जैसे अपराध भी किये जाते है. जिसका सीधा सम्बन्ध महिला के स्वास्थ्य से जुड़ता है. भारत में मातृत्व संबंधी मृत्यु दर दुनिया भर में दूसरे सबसे ऊंचे स्तर पर हैं. केवल 42 प्रतिशत जन्मों की निगरानी पेशेवर स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा की जाती है. ज्यादातर महिलाएं अपने बच्चे को जन्म देने के लिए परिवार की किसी महिला की मदद लेती है. जिसके पास अक्सर न तो इस कार्य की जानकारी होती है और न ही मॉ की जिंदगी खतरे में पड़ने पर उसे बचाने की सुविधाएं. यूएनडीपी विकास रिपोर्ट (1997) के अनुसार 88 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं 15-49 वर्ष की आयु में एनीमिया से पीड़ित हो जाती है. दूसरी ओर देश के तराई क्षेत्र से अशिक्षित महिलाओं को अनैतिक तरह से तस्करी करके महिलाओं को वेश्यावृति के धंधे में डालने की प्रवृति को रोकना होगा.
राधिका जैसी न जाने कितनी महिलाओं को दहेज़ के कारण जान देनी पड़ती है. प्रत्येक वर्ष लगभग 5,000 राधिका रसोई घर में जलती है. जलती नहीं उसे जलाया जाता है दहेज की आग में और तो और इस अपराध पर शर्म करने के वजाय कहते हो ‘दुल्हन की आहुति’(ब्राइड बर्निग).
पर मैं खुश हूॅ, तुम कुछ तो हुए. वरना तुम्हारी सहिष्णु चुप्पी लगातार मेरा अपमान करती चलती है. तुम्हारी प्रतिक्रियाओं के बिना मेरी अगली लड़ाइयों के नक्शे अधूरे हैं. (दोनों कविताओं के अंश ममता कालिया के कविता-संग्रह से संदर्भ के रूप में लिए हैं.)

Comments

भाई, यह तो स्‍त्री विमर्श की एक सुंदर-सी कहानी बन गई है। अदभुत रवानगी है इसके पोर पोर में। किसी साहित्यिक पत्रिका में इसे भेजिए। स्‍त्री विमर्श पर किसी को बोर नहीं करने वाली रचना है। इसे सभी पढ़ना चाहेंगे। इसे फेसबुक पर भी शेयर करें तो बेहतर होगा।
Anonymous said…
jayant bhi sandar.
जयंत को पहली बार पढ़ा है... अच्छा लगा... अगर जयंत इसके अंत में मिसेज जयंत लगा दे... तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा... पुरुष मन ने नारी मन को अच्छी तरह भांपा है... साधुवाद
Gulshan Toppo said…
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Gulshan Toppo said…
जयंत जी....आपकी लेख ससक्त रुढ़िवादी मानशिकता को दर्शाता है !!!

मैं यंहा कुछ जोड़ना चाहता हूँ, जंहा आप दहेज़ को, महिलाओ के चूल्हे मैं जलने का करण मान रहे है !!!

मेरा तजुर्बा कहता है लड़के की शादी मैं दहेज़ की सबसे ज्यादा मांग लड़के के माँ (बहुओ को यही माँ जलती है कोई और नहीं) ही करती है !!!