Monday, July 23, 2012

सब टीवी के अनोखे सितारे


इन दिनों पत्रकारिता में दिन की नौकरी करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है. रतजगे से तो मुक्ति मिली ही है, टीवी से भी संबंध गहरे हो रहे हैं. आफिस से लौटता हूं तो सब टीवी खोल कर बैठ जाता हूं. रात ग्यारह बजे तक वही चलता है. मेरे जैसे और भी न जाने कितने आफिस गोअर्स की जिंदगी में यह रूटीन की तरह शामिल हो गया होगा इसका हिसाब नहीं है. इसके हल्के-फुल्के हास्य धारावाहिक दिन भर के कामकाज के तनाव से मुक्ति दिला देते हैं और लोग रात में चैन की नींद सोते हैं.
मैं भी पिछले सात-आठ महीने से इन धारावाहिकों को नियमित देख रहा हूं. तारक मेहता का उल्टा चश्मा, चिड़ियाघर, आरके लक्ष्मण की दुनिया, लापतागंज और अंत में अपनी तरह का एक बकवास एफआइआर. कभी-कभी सोचता हूं, आखिर इन धारावाहिकों में ऐसा क्या है जो लोगों को इस तरह बांधे रखता है. इन धारावाहिकों के कलाकारों में ज्यादातर ऐसे चेहरे हैं जिनमें कोई आकर्षण नहीं है. चाहे तारक मेहता के जेठा लाल हों, आरके लक्ष्मण की दुनिया के भावेश हों या लापतागंज के मुकुंदी लाल गुप्ता. ये सब तो खैर मुख्य किरदारों में हैं, सहायक किरदारों में तो एक से एक अजीबोगरीब चरित्र हैं, लापतागंज के मामा और एलिजाबेथ, तारक मेहता के हाथी डॉक्टर और अय्यर और चिड़ियाघर का गधा प्रसाद, एफआईआर के गोपी हवलदार.
पिछले चार पांच सालों से लगातार ये चरित्र लोगों का मनोरंजन कर रहे हैं. इन हास्य धारावाहिकों की सबसे बड़ी खासियत तो यह है कि मौजूदा दौर के सामान्य प्रचलन से इतर इनमें फूहड़ और द्विअर्थी संवाद न के बराबर हैं. एफआइआर जैसे बेसिर-पैर वाले धारावाहिक में भी मैंने आज तक फूहड़ और ईलता का अंश नहीं देखा. जबकि इसके समानान्तर दूसरे चैनलों के कॉमेडी शो में इन तत्वों की भरमार आसानी से देखी जा सकती है.
इन धारावाहिकों में से दो तो साहित्यिक रचनाओं पर आधारित बताये जा रहे हैं. हालांकि इनकी मौजूदा कथा का शरद जोशी या आरके लक्ष्मण के साहित्य से ज्यादा लेना देना नहीं है, ऐसा करना मुमकिन भी नहीं था. खास तौर पर जब तमाम धारावाहिक 500-500 एपिसोड की सीमा पार कर चुके हैं. इन धारावाहिकों का बड़ा आसान तानाबाना है. पास-पड़ोस में रहने वाले चार या पांच परिवारों के आपसी संबंधों की कहानी(तारक मेहता का उल्टा चश्मा, आरके लक्ष्मण की दुनिया और लापतागंज), एक संयुक्त परिवार के रिश्ते-नाते(चिड़ियाघर) और एक अजीबोगरीब थाना(एफआइआर).
एफआइआर को छोड़ कर बांकी के धारावाहिक कहीं न कहीं आदर्शवादी सामाजिक और पारिवारिक धारणाओं को मजबूत करते हैं. बिल्कुल हृषिकेश मुखर्जी की फिल्मों की तरह. आज टीआरपी की होड़ में भी मेरा अंदाजा है यह चैनल किसी से पीछे नहीं होगा.

1 comment:

रंजीत/ Ranjit said...

जहां तक मैं समझ पाया हूं- भ्रष्टाचार एक ह्यूमैन फैक्टर है। जहां लोग रहेंगे, वहां चोरी होगी। रही इसके संस्थागत स्वरूप लेने की बात, तो यह अचानक नहीं हुआ। अंग्रेज के जमाने में ही भ्रष्टाचार को संस्थागत स्वरूप दिया गया था, जिसे आजादी के बाद की अपनी सरकार ने बट वृक्ष बनाया। जहां तक कैंसर का रूप ले चुके भ्रष्टाचार को खत्म करने की बात है, तो यह अण्णा और रामदेव के बस की बात नहीं है। क्योंकि जो लोग भ्रष्टाचार के साथ हैं, वे इतने पावरफुल और युनाइट और चालाक हैं कि एक नहीं दस अण्णा भी इन्हें परास्त नहीं कर सकते। इनके साथ बाजार है, जो हर मिलिट्री से ज्यादा ताकतवर है। जाति, धर्म, क्षेत्र आदि का वह हथियार है, जो भारत को कभी एक साथ खड़ा नहीं होने देगा। रही बात भ्रष्टाचार के मुद्दे के पीटने का, तो मुझे लगता है जब तक देह में प्राण होता है, वह रोग से लड़ता रहता है। इसलिए जब तक समाज रहेगा, भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठती रहेगी। लेकिन यह अब किसी आंदोलन से दूर नहीं होगा। बल्कि इसका समाधान अब खुद भ्रष्टाचार ही निकालेगा। जब कोई दवा किसी रोग को ठीक नहीं कर पाती है, तो शरीर में इम्यून सिस्टम विकसित होता है, जो उस रोग से लड़ने की शक्ति अर्जित कर लेता है। अगर ऐसा नहीं हो पाता है, तो देह मर जाती है। पर मुझे विश्वास है कि समाज की देह कभी नहीं मरेगी, वह इम्यून जरूर खोजेगी।