Thursday, July 26, 2012

क्या भ्रष्टाचार का मुद्दा भी पिट गया


चलिए मान लेते हैं.. अन्ना का आंदोलन पिट गया.. रामदेव पहले से पिटे हुए हैं.. मगर क्या भ्रष्टाचार का मुद्दा भी पिट गया है? यह एक ऐसा सवाल है जो कल रात से मेरे मन को मथ रहा है. मैं यह मानने को तैयार नहीं कि कोई राजनीतिक दल छल-छद्म और षडयंत्रों से जनता के क्रोध को शांत कर सकता है. मुङो ऐसा लग रहा है कि सत्य की जीत को लेकर मेरे मन में जो प्रबल धारणा थी वह कोई चकनाचूर कर रहा है.
हो सकता है कि अन्ना और रामदेव के आंदोलन में सत्य से अधिक दंभ हो..उनके लड़ाई के तरीके गलत हों..उनके हथियार भोथरे हों..मगर उनका मुद्दा आम जनता का मुद्दा है, जिसे देश चुप-चाप पिछले 50 साल से भुगत रहा है. आजादी के बाद लोगों ने समानता और न्याय की उम्मीद की थी.. अपने देशवासियों से बनी सरकार से सुशासन की उम्मीद की थी. मगर सत्ता तंत्र के इस जाल ने सब गुड़गोबर कर दिया. कुरसी पर जो भी बैठा वही जनात के खिलाफ हो गया. उसने आम लोगों तक सुविधाएं पहुंचने की राह में रोड़े अटकाये और पैसे वालों की बिरादरी के लिए राहें आसान की.
सवाल जाति या आवासीय प्रमाणपत्र या ड्राइविंग लाइसेंसों के लिए लिये जाने वाले रिश्वत का नहीं है. गांव की सड़क का ठेका लेने के लिए मंत्रियों से अधिकारियों तक को देने वाले फिक्स कमीशन का भी नहीं. प्रशासन के हर तंत्र में उपर से नीचे तक रिश्वत की राशि के सरलता पूर्वक पहुंचने वाली प्रक्रिया का भी नहीं है. न ही टूजी स्प्रैक्ट्रम या कॉमनवेल्थ गेम्स या कोल ब्लॉक के लीज पर दिये जाने में बरती गयी अनियमितताओं का. कई बार मुङो लगता है सबसे बड़ा दोष उन नियमों, कानूनों और संविधान में वर्णित अनुच्छेदों का है, जो इंसान को अफसरशाही के आगे आवेदन देने और उसके फैसलों का इंतजार करने के लिए विवश करते हैं.
क्योंकि हर भ्रष्टाचार की शुरुआत उसी जगह से होती है जब आपको एक आदेश, एक स्वीकृति या एक प्रमाणपत्र चाहिए होता है. सरकार इन कानूनों के जरिये अधिक से अधिक अधिकार अपने पास रखती है और उन्हें बांटते हुए उनके कारकून आम जनता से वसूली करते हैं. हमारे अफसरशाह इस काम में बड़े निपुण हैं कि कैसे किस नुक्ते से कमाई की गुंजाइश बनायी जा सकती है. कानून बनते वक्त ही वह नुक्ता गढ़ लिया जाता है.
हमें भ्रम होता है कि सिस्टम में कुछ लोग गड़बड़ हैं जिनके कारण सारी अव्यवस्थाएं हैं.. जैसा कि शरद यादव और दूसरे राजनेता अरविंद केजरीवाल के पूरे संसद को गाली देने के सवाल पर प्रतिक्रिया जताते हुए कहते हैं कि सारे के सारे वैसे नहीं हैं. मगर मेरा दिल नहीं मानता. भ्रष्टाचार ही वह तेल है जिसके सहारे हमारे देश की पूरी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था काम कर रही है. अगर इस व्यवस्था में एक इमानदार इंसान को फिट कर दीजिये तो या तो वह खुद बदल जायेगा या फिर लोग उसे उठाकर बाहर फेंक देंगे. ऐसा भी हो सकता है कि वह पूरी व्यवस्था को बदल दे, मगर यह रेयर है.
हम कई बार कुछ नेता या अफसर के बारे में सुनते हैं कि वह इमानदार है मगर वह अधूरा सत्य होता है. लोग कुछ दिन-कुछ महीने के लिए इमानदार हो सकते हैं.. मगर बाद में उन्हें या तो बदलना पड़ता है या क्विट करना पड़ता है. इस व्यवस्था में इमानदारी की भी अपनी सहूलियतें हैं. अगर आप व्यवस्था के दुश्मन की बेइमानी को एक्सपोज करना चाहते हैं तो आपको इमानदारी बरतने की छूट दी जा सकती है, हीरो भी बनाया जा सकता है. मगर अपनी इमानदारी बरतना बहुत मुश्किल है. एक पूरा ताना-बाना है, सिस्टम है. एक इमानदारी पूरे चेन को भंग कर सकती है.
एक इमानदार दारोगा या तो ट्रेनिंग एकेडमी में पुलिस को ट्रेनिंग दे या बेइमान हो जाये, क्योंकि थाना प्रभारी बनने की शर्त ही रिश्वत है. थाने बिकते हैं..ब्लॉक बिकते हैं.. ट्रांसफर और पोस्टिंग अब सर्विस इंडस्ट्री का रूप ले चुकी है.
खैर मैं बेवजह इतना बकबक कर रहा हूं.. यह किसे नहीं मालूम.. मगर इसका अंत कैसे होगा.. यह कौन बता सकता है.. पिछले साल अन्ना के पीछे जब गली कूचे से राजधानी तक पूरा देश सड़कों पर उमड़ पड़ा था क्या वह बेवकूफी थी?

2 comments:

Vivek Rastogi said...

लगता तो नहीं कि भ्रष्टाचार का मुद्दा चुक गया है, ऐसा लगता है कि लोगों का विश्वास लड़ाई करने वालों से चुक गया है।

रंजीत/ Ranjit said...

जहां तक मैं समझ पाया हूं- भ्रष्टाचार एक ह्यूमैन फैक्टर है। जहां लोग रहेंगे, वहां चोरी होगी। रही इसके संस्थागत स्वरूप लेने की बात, तो यह अचानक नहीं हुआ। अंग्रेज के जमाने में ही भ्रष्टाचार को संस्थागत स्वरूप दिया गया था, जिसे आजादी के बाद की अपनी सरकार ने बट वृक्ष बनाया। जहां तक कैंसर का रूप ले चुके भ्रष्टाचार को खत्म करने की बात है, तो यह अण्णा और रामदेव के बस की बात नहीं है। क्योंकि जो लोग भ्रष्टाचार के साथ हैं, वे इतने पावरफुल और युनाइट और चालाक हैं कि एक नहीं दस अण्णा भी इन्हें परास्त नहीं कर सकते। इनके साथ बाजार है, जो हर मिलिट्री से ज्यादा ताकतवर है। जाति, धर्म, क्षेत्र आदि का वह हथियार है, जो भारत को कभी एक साथ खड़ा नहीं होने देगा। रही बात भ्रष्टाचार के मुद्दे के पीटने का, तो मुझे लगता है जब तक देह में प्राण होता है, वह रोग से लड़ता रहता है। इसलिए जब तक समाज रहेगा, भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठती रहेगी। लेकिन यह अब किसी आंदोलन से दूर नहीं होगा। बल्कि इसका समाधान अब खुद भ्रष्टाचार ही निकालेगा। जब कोई दवा किसी रोग को ठीक नहीं कर पाती है, तो शरीर में इम्यून सिस्टम विकसित होता है, जो उस रोग से लड़ने की शक्ति अर्जित कर लेता है। अगर ऐसा नहीं हो पाता है, तो देह मर जाती है। पर मुझे विश्वास है कि समाज की देह कभी नहीं मरेगी, वह इम्यून जरूर खोजेगी।