रोहित शेखर को पिता मुबारक


मेरे इस पोस्ट का जो शीर्षक है उसे कृपया व्यंग्य के रूप में न लिया जाये. यह संभवत: दुनिया के इतिहास में पहली घटना है जब एक बेटे ने अपने बाप को जन्म दिया. यह उस युवक के संघर्ष की दास्तान है जिसे उसे जन्म देने वाला पिता अपना नाम नहीं देना चाहता था. उसे उसकी पहचान से वंचित रखना चाहता था. आम तौर पर ऐसे मामले में लोग शर्मिदगी के कारण चुप लगा जाते हैं और ताउम्र एक गलत पहचान के साथ जीते हैं. मगर रोहित ने शर्मिदगी को परे ढकेलते हुए अपनी पहचान की लंबी लड़ाई लड़ी और आखिरकार जीत हासिल की. ओपन पत्रिका की रिपोर्टर सोहिनी चट्टोपाध्याय से उन्होंने कभी अपनी बात साझा की थी जिसे सोहिनी ने एक आलेख का रूप दिया था. इस आलेख को पढ़ कर हम रोहित के संघर्ष को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं. मूल आलेख का हिंदी अनुवाद
आप मेरे नाजायज बाप हैं-रोहित
मैं शायद दुनिया का पहला ऐसा इनसान हूं जो बास्टर्ड साबित होने की लड़ाई लड़ रहा हूं. लोग सम्मान के लिए लड़ते हैं, जायज संतति साबित होने के लिए लड़ते हैं. लेकिन मैं दुनिया को बताना चाहता हूं कि मैं मिस्टर एनडी तिवारी की नाजायज औलाद हूं.
जब मैं बड़ा हो रहा था, मैं त्रिशूल फिल्म को बार-बार देखता था. उस फिल्म में अमिताभ बच्चन संजीव कुमार से कहते थे, तुम मेरे नाजायज बाप हो. उनका यह डायलॉग मुझे काफी प्रभावित करता. मैं अमिताभ का फैन था, उनकी हर फिल्म देखना पसंद करता था. लेकिन जब मैंने यह जाना कि मिस्टर तिवारी मेरे जैविक पिता हैं और मिस्टर शर्मा जो मेरे स्कूल में मेरे पिता के रूप में पैरेंट्स-टीचर मीटिंग अटेंड करते हैं मेरे जैविक पिता नहीं है, मुझे लगने लगा कि यह फिल्म मेरी कहानी बता रही है. इस बात ने मेरे अंदर इस जुनून को पैदा किया कि में मिस्टर तिवारी को बताऊं कि आप मेरे नाजायज बाप हैं.
वैसे में उनसे बहुत जुड़ाव महसूस नहीं करता था. इस बात की कोई गुंजाइश भी नहीं थी. हालांकि मैं उनसे 14 साल की उम्र से ही लगातार मिला करता था. वे हमें अपने पास नहीं रखते थे, हम उनसे मिलने जाया करते थे. हर तीन महीने में हम उनसे मिलने जाया करते थे. मां मुझे स्कूल से पिक कर लेती थी और हम उनके दिल्ली वाले मकान पर जाते थे. उन दिनों वे अपने राजनीतिक कैरियर के शीर्ष पर थे. या तो वे मुख्यमंत्री होते या केंद्र में कैबिनेट मंत्री. उनके बंगले पर जबरदस्त सुरक्षा होती, सैकड़ों लोग उनसे मिलने के लिए इंतजार करते रहते. मगर हमें आने जाने में कोई रोक नहीं होती. वहां के स्टाफ मुझसे बड़े प्यार से व्यवहार करते, मुझे घर का बच्चा मानते. मेरे साथ खेलते, बात करते और मुझे कुछ न कुछ खिलाते. मैं चकित हो जाता कि ऐसा क्यों है. मुझे स्पेशल ट्रीटमेंट क्यों मिल रहा है. हमारे लिए यह इनसान क्या है. यह मेरे बर्थडे पार्टी में क्यों आता है. मुझे इतने उपहार क्यों देता है. जब मिस्टर तिवारी विदेश दौरे पर जाते तो मेरे लिए बड़े खूबसूरत पेंसिल बॉक्स लाते. उन दिनों विदेशी चीजें बड़ी मुश्किल से दिखती थीं. मैं उन्हें अपने स्कूल में दिखाता था. जब वे विदेश नहीं भी जाते तो मेरे लिए सेब और आम के बक्से भिजवाते. आप अगर जानते हों कि राजनेता किस तरह तोहफे भिजवाते हैं तो आप इसे समझ सकते हैं.
एक बार हम लोग उनसे मिलने लखनऊ गये थे. उस वक्त वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. मैं उस वक्त आठ या नौ साल का था, मैंने देखा कि अमिताभ बच्चन सफेद कुरता पायजाम में उनसे मिलने के लिए उनका इंतजार कर रहे थे. अमिताभ उस वक्त इलाहाबाद के एमपी थे. मैंने मिस्टर तिवारी से कहा कि मैं अपने अपने हीरो के साथ एक तसवीर खिचवाना चाहता था. जब उन्होंने कहा कि यह मुमकिन नहीं है तो मैंने उनके स्टेट एयरक्राफ्ट में उड़ने की फरमाइश की. मैंने उनकी गोद में बैठ कर एयरक्राफ्ट में पूरी दिल्ली का चक्कर लगाया था.
नानी ने मुझे बताया था
मैं अपनी तरफ ध्यान दिया जाना पसंद करता था. मगर जब मैं नौ या दस साल का था, मैंने लोगों से पूछना शुरू कर दिया कि क्यों यह इनसान मुझे इतने तोहफे देता है. मेरा एक बड़ा भाई भी है, जो मेरी मां के कानूनी पति बीपी शर्मा का बेटा है. उसे इतना तोहफा नहीं मिलता, हालांकि मुझे जरूर उन तोहफों को उनके साथ शेयर करने कहा जाता. और यह भी कि मेरी मां क्यों उसे अपने साथ तिवारी के पास नहीं ले जाती.
मैं गौर करता कि उनसे मुलाकात के बाद मेरी मां रोती हुई वापस होतीं. जब-जब उनसे मुलाकात होती उसके कुछ दिन बाद मेरी मां को अस्थमा का दौरा आ जाता. ज्यादातर वो और मेरी मां अकेले में बातें करते और उनमें तीखी बहस होती. उस वक्त मिस्टर तिवारी मुङो बाहर खेलने के लिए भेज देते, अपने स्टाफ के साथ. उसी दौरान मैंने महसूस करना शुरू कर दिया कि बेडरूम एक निजी क्षेत्र है और लिविंग रूम सार्वजनिक. मेरी मां क्यों एक ऐसे आदमी से मिलने आती है, जो उनके साथ इतना बुरा व्यवहार करता है. मेरे प्रति भी उनका व्यवहार बदलने लगा था. कई बार वह मेरे साथ खेलते, बातें करते और गाना गाते. गाना उन्हें काफी पसंद था. मगर कई बार ऐसा भी होता कि वे मेरी मौजूदगी पर ध्यान तक नहीं देते.
एक बार जब मैं 11 या 12 साल का था मेरी नानी ने मुझे बताया कि मिस्टर तिवारी मेरे असली पिता हैं. मैं उनकी बात सुनकर हंस पड़ा. जब मैंने अपनी मां से यह बताया तो उन्होंने कहा कि यह सच है. इसी कारण मिस्टर तिवारी से उनकी बहस होती है. वे उनपर दवाब डाल रही हैं कि वे मुझे अपना बेटा स्वीकार करें. लेकिन वे कहते हैं उनकी पत्नी इस बात के लिए तैयार नहीं है.
मेरे नाना उनके लिए गुरु सरीखे थे
नारायण दत्त तिवारी तब मेरी मां के नजदीक आये जब वह मेरे नाना प्रोफेसर शेर सिंह से मिलने उनके पास आया करते थे. यह सत्तर का दशक था. मेरे नाना उस वक्त केंद्रीय मंत्री थे और वे हरियाणा राज्य के संस्थापकों में से एक थे. मेरे नाना उनके लिए गुरु सरीखे थे. मेरी मां का वैवाहिक संबंध सुखद नहीं रहा और वे उस दौरान नाना के साथ रहा करती थीं. हालांकि मिस्टर बीपी शर्मा मेरे लिए अच्छे पिता साबित हुए मगर वे मेरी मां के लिए अच्छे पति नहीं थे. मेरे नाना इस बात को समझते थे. मिस्टर तिवारी को भी इस बात का अहसास था. उन्होंने मेरी मां से कला कि उनकी शादी भी असफल साबित हुई है. वे उस दौरान पचास के लपेटे में थे. उन्होंने मेरी मां से कहा कि वे उनसे एक बच्च चाहते हैं, क्योंकि उनकी बीवी उन्हें यह सुख दे पाने में सक्षम नहीं है. उन्होंने मेरी मां से वादा किया कि जैसे ही उनका तलाक हो जाता है वे उनसे शादी कर लेंगे. मेरे नाना ने उन पर भरोसा किया और मेरी मां भी सहमत हो गयीं.
जब मेरा जन्म हुआ तो मां ने मुङो रोहित शेखर नाम दिया, उन्हें भरोसा था कि मिस्टर तिवारी मुङो पुत्र के रूप में स्वीकार कर लेंगे. जब बर्थ सर्टिफिकेट पर हस्ताक्षर करने की बारी आयी तो मिस्टर तिवारी ने यह बहाना बनाया कि इससे उनके राजनीतिक कैरियर पर नकारात्मक असर पड़ेगा. आखिरकार बीपी शर्मा को उस पर हस्ताक्षर करने पड़े. मगर उन्होंने कभी मुङो रोहित शेखर शर्मा नहीं कहा, उन्हें विश्वास था कि मिस्टर तिवारी अपनी बात से पलटेंगे नहीं.
मैं एक गुस्सैल और संशयग्रस्त किशोर था और कई बार अपनी मां पर बरस पड़ता था कि उन्होंने मेरा जीवन बरबाद कर दिया. 1993 में मिस्टर तिवारी की पत्नी गुजर गयीं और मेरी मां ने सोच अब अंतत: वे मुङो अपना पहचान दे देंगे. लेकिन मिस्टर तिवारी ने हमसे सारे नाते तोड़ लिये.
मैं कह सकता हूं कि उन दिनों मेरी जिंदगी नरक में गुजर रही थी. मुङो पढ़ने में और सोने में परेशानी होती थी. मैं गुस्से से भरा था और खुद को अपमानित महसूस करता था. उस दौरान मैं कालेज में थे, मैं डिप्रेशन और इन्सोमिया से पीड़ित था. मैं किसी तरह क्लास जाता और पढ़ाई करता.
मैंने फिर से 2002 में उनसे मुलाकात की. उस वक्त वे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री थे. मैंने पहली बार उनसे चेतावनी भरे लहजे में बात की. मगर उनका रुख सहयोगी था, उन्होंने अकेले में मुङो पुत्र के रूप में स्वीकारा.
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(यह एक लंबा आलेख है, इसका शेष भाग अगले पोस्ट में)

Comments

एक जरुरी आलेख. मज़ा आ गया. अगली कड़ी की प्रतीक्षा में...
Arvind Mishra said…
बिलकुल सटीक शीर्षक .....रोहित को बहुत बहुत बधाई.....इस लम्बे अवसाद भरे सतत संघर्ष के लिए ...
डी एन ऐ फिंगर प्रिंटिंग तकनीक ने पितृत्व का मामला हल कर दिया ...सोचिये अगर यह तकनीक न रही होती तब.....?
रील स्टोरी सी लगी यह रियल स्टोरी .आज ही दूसरा भाग पूरा कर देना था न -भले ही ब्लॉग पोस्ट का प्रोटोकोल टूटता -
ऐसे ही अवसर पर ही बंध खुल जाते हैं ! यह एक ऐतिहासिक क्षण है -भारतीय न्याय व्यवस्था और आधुनिक तकनीक और एक व्यक्ति की अदम्य जीजिविषा का .......
सब कुछ उजागर करती अच्छी सी पोस्ट |