उन्हें लगता था मैं कोर्ट नहीं जाऊंगा : रोहित


यह उस युवक के संघर्ष की दास्तान है जिसे उसे जन्म देने वाला पिता अपना नाम नहीं देना चाहता था. उसे उसकी पहचान से वंचित रखना चाहता था. आम तौर पर ऐसे मामले में लोग शर्मिदगी के कारण चुप लगा जाते हैं और ताउम्र एक गलत पहचान के साथ जीते हैं. मगर रोहित ने शर्मिदगी को परे ढकेलते हुए अपनी पहचान की लंबी लड़ाई लड़ी और आखिरकार जीत हासिल की. ओपन पत्रिका की रिपोर्टर सोहिनी चट्टोपाध्याय से उन्होंने कभी अपनी बात साझा की थी जिसे सोहिनी ने एक आलेख का रूप दिया था. इस आलेख को पढ़ कर हम रोहित के संघर्ष को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं. मूल आलेख के हिंदी अनुवाद का दूसरा भाग -
2002 से 2005 के बीच हम कई बार मिले, मुङो हमेशा होटल में ठहराया जाता था. कमरे में जब हम लोग अकेले होते थे तो वे हमेशा अपनी प्लेट से खाने के लिए मुङो प्रोत्साहित करते थे. एक से अधिक बार मेरे सामने वे बोल चुके थे, यह तो हमारा बेटा है यह अपना रास्ता खुद बनायेगा. मगर कमरे से बाहर वे बिल्कुल अलग इनसान होते थे. एक सुबह वे अपने समर्थकों से मुलाकात कर रहे थे, उस वक्त मैंने उनके कमरे में जाने की कोशिश की तो उनके अंगरक्षकों ने मुङो यह कहते हुए रोक दिया कि नहीं साहब इस वक्त नहीं. एक बार मेन गेट के बाहर मैं खड़ा था आसपास कई दूसरे लोग भी उनके इंतजार में खड़े थे. वे जब बाहर आये तो उन्होंने मुझसे निगाहें तक नहीं मिलायी.
एक-दो बार मैं उनको कह चुका था कि मैं पूरी गंभीरता से इस मसले को अदालत में ले जाने का मन बना चुका हूं. मगर वे हमेशा सोचते कि मैं ऐसा नहीं करूंगा. मेरे कई दोस्त और रिश्तेदार भी कहते थे कि बड़े लोगों में तो यह सब चलता है. मगर मैं इस बात तो मानने के लिए तैयार नहीं था कि बड़े और पावरफुल लोगों को कुछ भी करने की छूट है. यह तो सामंती मानसिकता है. मैं अपने और अपनी मैं के लिए यह पहचान हासिल करना चाहता था, क्योंकि हमनें इस दर्द सहा था.
मैं दिसंबर 2005 में उनसे आखिरी बार मिला. वे किसी काम के सिलसिले में दिल्ली आये थे और मानसिंह रोड स्थित ताज होटल में ठहरे थे. मैं मेरी मां और मेरी नानी उनसे मिलने गये थे, मगर उन्होंने हमारी तरफ देखा तक नहीं. वे कई लोगों से घिरे थे. एक घंटे से अधिक समय तक इंतजार करने के बाद हमने एक चिट में उनके लिए संदेश भिजवाया, जब भी आपको फुरसत हो आप हमारे घर आयें और हमारे साथ एक कप चाय पीने का मौका निकालें. मगर जब वे बाहर आये तो उन्होंने हमें इंतजार करता देखा. उस वक्त उन्होंने हमें दिखाते हुए उस चिट को गोल बनाकर बाहर फेंक दिया.
यही वह वक्त था जब मैंने फैसला कर लिया.
हर्ट अटैक, सेरेब्रल स्ट्रोक और मुकदमा
मेरे वकील और मैंने खूब रिसर्च किया, वकील नर्वस था क्योंकि यह अनोखा मुकदमा था. इसके अलावा मिस्टर तिवारी पावरफुल आदमी थे. मैं भी डरा हुआ था. मुङो इस बात का भी डर था कि कहीं मेरे केस को पब्लिसिटी स्टंट मानकर खारिज न कर दिया जाये. इसके अलावा रात को आने वाले फोन कॉल की मुसीबत अलग थी. पिछले एक दशक से हमें इस तरह के धमकी भरे फोन आते रहते थे कि मुङो टुकड़े-टुकड़े कर देंगे और गटर में फेक देंगे. मिस्टर तिवारी हमेशा इस मामले से अपना कनेक्शन होने की बात से मुकर जाते, कहते जरूर हमारा कोई दुश्मन होगा.
5 जुलाई 2007 को मुङो दिल का दौरा पड़ा. मैं घर में बैठकर विंबलडन के मुकाबले देख रहा था कि मुङो पीठ में जबरदस्त दर्द का अहसास हुआ. मुङो देखने घर आये डॉक्टर को यह समझ नहीं आया कि मुङो हर्ट अटैक आया है, उन्होंने मुङो कोई दर्द निवारक दवा दे दी. मैं अपना काम करता रहा. सितंबर 2007 तक हमलोग मुकदमा दायर करने के लिए तैयार थे. 12 सितंबर की रात मुङो मस्तिक आघात आ गया, क्योंकि पिछले हर्ट अटैक ने मेरे हर्ट में दो थक्के छोड़ दिये थे. 13 सितंबर को मैं अस्पताल के बिस्तर पर अचेत पड़ा था उसी दौरान मेरे वकील ने मुकदमा दायर किया. मेरे स्ट्रोक के सदमे में उससे एक तकनीकी भूल हो गयी. अगर आप किसी महत्वपूर्ण सरकारी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा करते हैं तो आपको दो माह पहले उसे नोटिस भेजना पड़ता है.जब मेरी मेडिकल रिपोर्ट आयी तो उसमें हर्ट अटैक और सेरेब्रल स्ट्रोक का कारण तनाव और इन्सोमिया बताया गया था. इसके बाद मैंने योग, ध्यान करना और हिंदुस्तानी क्लासिकल म्यूजिक सीखना शुरू कर दिया. मैं धीरे-धीरे ठीक हो रहा था, लेकिन मेरा बायां पैर ठीक से काम नहीं रहा था.
अप्रैल 2008 में मैंने दुबारा दिल्ली हाई कोर्ट में मुकदमा दायर किया. 25 नवंबर 2008 को कोर्ट ने मिस्टर तिवारी के नाम से समन जारी कर दिया. वे अब ऐसे पहले गवर्नर बन गये थे जिनके नाम कोर्ट का समन जारी हुआ हो. मिस्टर तिवारी ने इस आदेश का इस आधार पर विरोध किया कि गवर्नर के रूप में उन्हें कोर्ट में हाजिर होने से छूट मिलनी चाहिये. नवंबर 2009 में दिल्ली हाई कोर्ट ने मुकदमे को तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया, मगर मैंने उस आदेश को चुनोती देने का फैसला किया.
(यह एक लंबा आलेख है, इसका शेष भाग अगले पोस्ट में)

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