सात हजार में देश की चौहद्दी नापने का जुनून


पर्यटन एक महंगा शौक है. समय खपाऊ और खर्चीला. जबकि घुमक्कड़ी इसके ठीक विपरीत है. यहां पर आप देखेंगे किस तरह कम समय और सस्ते में बेहतरीन घुमक्कड़ी की जा सकती है. घुमक्कड़ी के लिये रु पये-पैसे की जरूरत नहीं है, रुपये -पैसे की जरूरत है टैक्सी वाले को, जरूरत है होटल वाले को. अगर यहीं पर कंजूसी दिखा दी तो समझो घुमक्कड़ी सफल है.
नीरज जाट की ये पंक्तियां उसके ब्लॉग मुसाफिर हूं यारों पर परिचय वाले कॉलम में दर्ज है. इसके अलावा उनके ब्लॉग पर पिछले तीन साल में उनके द्वारा की गयी घुमक्कड़ी की कई कहानियां और तसवीर भी नुमायां हैं. नीरज जितने अच्छे घुमक्कड़ हैं उतने ही अच्छे ब्लॉगर भी. यात्रओं के बारे में उनके वृत्तांत इस बात की गवाही देते हैं. 292 लोग उनके इस ब्लॉग के सदस्य हैं.
पिछले दिनों उनके ब्लॉग पर एक रोचक जानकारी नजर आयी. वे रेल यात्र के जरिये पूरे देश की चौहद्दी नापने की योजना बना चुके हैं और आठ अगस्त को इस 13 दिवसीय यात्र पर निकलने वाले हैं(जब यह आलेख प्रकाशित होगा वे इस अनूठी यात्र के लिए निकल चुके होंगे). ऐसे में हमने पंचायतनामा के लिए उनसे इस यात्र के बारे में विस्तार से बातचीत की.
देल्ही मैट्रो के जूनियर इंजीनियर नीरज जाट को बचपन से ही घुमक्कड़ी का शौक रहा है. खास तौर पर रेल यात्र और हिमालय की सैर उनकी कमजोरियों में शामिल है. उन्हें जब भी मौका मिलता है, छुट्टी लेकर अपना शौक पूरा करने वे निकल पड़ते हैं. नीरज बताते हैं कि शौक तो बचपन से ही था मगर पूरा करने का मौका नौकरी मिलने के बाद मिला. 24 वर्षीय नीरज पिछले साढ़े तीन साल से इस नौकरी में हैं और पिछले साढ़े सात साल में 533 बार रेल यात्र कर 73663 किमी की दूरी नाप चुके हैं. इस बार उन्होंने इस घुमक्कड़ी को एक आकार देने का फैसला किया है, वे देश की चौहद्दी नापने निकल रहे हैं.
घुमक्कड़ी क्यों? जब यह सवाल नीरज से पूछा तो उन्होंने कहा, निरुद्देश्य. घुमक्कड़ी निरुद्देश्य ही हो सकती है. मगर हर बार ऐसा नहीं होता. भारत भ्रमण के इस प्रोग्राम के बारे में खुद नीरज लिखते हैं.
अक्सर मेरी सोच ज्यादा लम्बी नहीं चलती, बस एक महीने आगे की ही सोच सकता हूं. जून का महीना जब चल रहा था, तो मेरी सोच मात्र जुलाई तक ही सीमित थी, अगस्त के बारे में कि कहां जाना है, मैं सोच भी नहीं सकता था. लेकिन अब जमाना बदल गया है. हमने भी लम्बा-लम्बा सोचना शुरू कर दिया है. उसी का नतीजा है यह धाकड़ प्रोग्राम. वे बताते हैं, इस योजना के बारे में पहला ख्याल जून में आया.
जून में जब मैं गौमुख गया था तो हमारे दिमाग ने स्पेशल सोचा. वहीं ट्रेकिंग करते-करते अपने दिमाग में आया कि एक लम्बी ट्रेन यात्र की जाये. वहीं समय भी तय हो गया कि अगस्त में चलेंगे. क्योंकि अगस्त तक प्राय: मानसून पूरे भारत पर कब्जा जमा लेता है और धरती का रंग रूप बदल जाता है. वापस आकर इस दिशा में काम शुरू कर दिया. यह इतना आसान नहीं था. खूब दिमाग की खिचडी बनाई और तब जाकर फाइनल हुआ कि ट्रेन से भारत की परिक्र मा करेंगे.
योजना बनाकर नीरज ने रूटचार्ट तैयार किया और तय किया कि क्लॉकवाइज देश की परिक्रमा करेंगे. हर दो ट्रेन के बीच ऐसा माजिर्न रखा कि एक ट्रेन के लेट होने पर दूसरी ट्रेन मिस न हो. तब जाकर कुल 13 दिनों का प्रोग्राम बना. 14 अलग-अलग ट्रनों के जरिये वे 12 हजार किमी की यात्र करेंगे. शिडय़ूल इतना टाइट है कि इस यात्र के दौरान वे किसी शहर में घूमने नहीं जा सकेंगे. इस बात का उन्हें अफसोस भी है. उनका सारा समय रेलगाड़ियों में यात्र करते हुए और प्लेटफार्म पर दूसरी ट्रेन का इंतजार करते हुए गुजरेगा. हालांकि रेलगाड़ियां और रेलवे स्टेशन से उन्हें इतना प्यार है कि यह समय वे बगैर बोर हुए गुजार लेंगे.
नीरज औसतन हर साल दस हजार किमी की यात्र करते हैं और इसमें उनके 35 हजार रुपये खर्च करते हैं. अब तक यह तमाम खर्च वे खुद वहन करते हैं, अपने वेतन से. अपनी जेब से खर्च कर और नौकरी से छुट्टी लेकर इस तरह यात्र करना हर किसी के लिए मुमकिन नहीं. कई लोग शौक रहने के बावजूद नहीं कर पाते. मगर नीरज ने रास्ते निकाल लिये हैं. वे कहते हैं कि वे घरेलू मसलों के लिए कम से कम छुट्टी लेते हैं, ऐसे में घुमक्कड़ी के लिए उन्हें आसानी से छुट्टी मिल जाती है. अविवाहित होने के कारण वेतन के पैसे से हर माह तीन हजार खर्चना आसानी से मुमकिन हो जाता है.
इस बार उनकी भारत परिक्रमा का बजट छह से सात हजार के बीच का है. जिसमें साढ़े तीन हजार रुपये टिकट में खर्च होने हैं और ढाई से तीन हजार खाने-पीने में. टिकट वे कटा चुके हैं और खाने-पीने का एक खर्च एक कनाडावासी मित्र सुरेंद्र शर्मा उठा रहे हैं.
(पंचायतनामा के अगस्त द्वितीय अंक में प्रकाशित)

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