Monday, September 03, 2012

आज नहीं अज्जो बानों


‘‘साजन मेरा उस पार है मिलने को दिल बेकरार है़.... परदेशी परदेशी जाना नहीं.... मुझे छोड़ क़े़... ज़ैसे कर्णप्रिय गाने अक्सर भारतीय रेल से सफर के दौरान सुने होगे. गाना, गाने का अंदाज, गाने वाले, कभी कौतुहल का विषय हुआ करते थे, आज गाना गायब, अंदाज बदला, बकसीस के जगह जबरन वसूली करके हमें लूटते हिजरे... कुछ इस तरह से मेरी मुलाकात आज ठाकरे नाम के हिजरे से हुई, आइए सुने आज ने कैसे उठाए अपने राज के पर्दे
-मेरा नाम आज ठाकरे उर्फ अज्जो
-उम्र वसूली लायक है यानि जवानी जिन्दाबाद
-आपका घर मतलब की स्थायी ठिकाना तो होगा ?
-है न, अपुन मुम्बई की हूँ
-आप किस तरह से इस धंधे में आयी ?
- देखो साहब अपुन का धंधा ज्यादा इच पुराना नहीं.. वो क्या बोलो़, अभी हमारा चचाजान इस धंधे का शेर हुआ करता था.. आज अपुन लोग उसको आगे ले जाने का क्यो, बराबर बोला ना़...
-चचाजान से मतलब कुछ समझा नही ?
-अरे बाबा बोला ना़... चचाजान अभी बुढ़ा हो गया है उसको अपुन ने बोल दिया इधर इच कुर्सी पे बैठने का़... अपुन के जवानी के दिन है क्या़... दुसरे स्टाइल से धंधा करेग़े़...
-रज्जो तुम्हारी इनकम कितनी हो जाती है ?
-अभी क्या बोलूं पहले अपुन लोग केवल दुसरों की खुशियों में जाते थे, धीरे-धीरे महंगाई बढ़ती गई, आपको मालूम कि अपुन ने सरकारी, प्राइवेट नौकरी तो की नहीं की पगार मिले सो हमने अब पेट को भरने के लिए मौके अपने आप बना लेते है, बस रोटी चलनी चाहिए
-अभी हाल के मुम्बई चुनाव में आपने कैसे जीत हासिल किया ?
-अरे बाबा तुम खाली फोकट की बात करते हो़, हिजरो के आगे कोई चुनाव लड़ने आएगा क्या ? हमारा अपना पार्टी है, पार्टी के प्रति हमारा समाज वफादार है...
-बिहारीयों से मनमुटाव का कोई खास कारण है ?
-बिहारी सा.. होते काफी मेहनती. अपुन लोगों को हफ्ता देने में काफी चिकचिक किया करते हैं.. यही बिहारी अपने गांव जाकर सोहर गवाते है रूप्या पैसा खर्च करते है जब हम लोग मांगते है तो नाक भौ सिकोरते है, आखिर अपुन लोग कहां जायेंगे. आज बिहारी हफ्ता नहीं देगा कल यूपी वाला, परसो बंगाली, नरसो गुजराती फिर अपुन लोग का बंटाधार हो जाएगा. अपुन लोग क्या मांगते कुछ कमाई का हिस्सा हिजरों पर खर्च करो फिर मौज से रहो. -तो बिहारीयों से इतना डरना आखिर क्यों ?
- तुमने सुना नही क्या एक बिहारी सब पऱ.....
- अन्त मे आप कुछ कहना चाहेगे ?
-अन्त, शुरू, धर्म, कुछ भी मायने नही रखता बस हमें किसी हाल में रूप्या चाहिए. हमने स्ट्रगल किया है यानि काफी कठीनाई से इस मुकाम तक पहुंचे है, दरवाजे-दरवाजे नाचना अब अच्छा नहीं लगता, धंधा तो वही पर अंदाज राजनीति का. यही हमारी पावर है... बात अलग है कि दिल्ली अभी दूर है.
जयंत सिन्हा

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