Friday, September 21, 2012

भूख से मौत की जिम्मेदारी किसकी


दो दिन पहले गया के एक गांव में भूख से हुई मौत के शिकार परिवार से मिलने का मौका मिला. परिवार और समाज के लोग तथा कई स्थानीय पत्रकार और बुद्धिजीवी मिलकर यह साबित नहीं कर पा रहे थे कि मौत भूख से हुई. पूरी सरकार इस सच को झूठ में बदलने के लिए जुटी थी. इससे पहले भी मुझे भूख से हुई मौत से जुड़े तीन-चार मामलों से सीधे जुड़ने का मौका मिला. हर बार यही हुआ. ऐसे में मेरी राय यही बनी है कि इस पूरे मामले में बेवजह मुख्य सचिव और दूसरे अधिकारियों को शामिल किया गया है. अगर सीधी जिम्मेदारी उन पर न हो जो उचित भी नहीं तो इसके समाधान की दिशा में कुछ सार्थक प्रयास हो सकते हैं.
राइट टू फूड अभियान के कारण देश में एक बड़ा फैसला हुआ था, जिसके तहत यह नियम बना था कि अगर देश में कहीं किसी की मौत भूख के कारण हुई तो इस घटना के लिए उक्त राज्य के मुख्य सचिव समेत सभी अधिकारियों को जिम्मेदार माना जायेगा. इसके बाद विभिन्न राज्य सरकारों ने अपने सूबे के गरीबों को सरकारी अनाज उपलब्ध कराने की कई योजनाओं का संचालन शुरू किया, हालांकि उन योजनाओं को लागू करने में कहीं न कहीं चूक रह ही जाती है और गरीब लोग भूख के कारण मारे जाते हैं.
मगर राइट टू फूड अभियान से जुड़े कार्यकर्ता हों, जमीनी पत्रकार हों या अन्य समाजसेवी. हम सभी अब जान चुके हैं कि मौजूदा हालात में भूख से हुई मौत के मामले को साबित कर पाना बहुत मुश्किल है. चुंकि इस मामले में मुख्य सचिव की गरदन फंसी होती है, वह हर तरह के हथकंडे अपनाता है जिससे साबित हो सके कि मौत का कारण भूूख नहीं था.
पहला सवाल तो पोस्टमार्टम का उठता है. आम तौर पर गांव के लोग किसी मौत के बाद पोस्ट मार्टम करवाने के बारे में नहीं सोचते. मरने वाला हिंदु हुआ तो आनन-फानन में फुंक जाता है, बांकी लोग दफना दिये जाते हैं. अगर कोई जानकार इनसान आसपास हो तभी वह मृतक के परिजनों को पोस्टमार्टम के लिए राजी कर पाता है.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी कई झोल होते हैं. अगर मृतक के पेट में अनाज का एक दाना भी पड़ा मिल गया तो उसे भूख से मौत नहीं माना जाता. सरकार ने अब तक इस बात को नहीं माना है कि अगर चार रोटी खाने वाले को आधी रोटी मिले तो उसे भूखा ही कहना चाहिये. कई भूखे लोग तो खाना खाने के कारण भी मर जाते हैं. चार दिन की भूख के बाद अगर कुछ दिख गया तो उसे ही भकोसने लगते हैं. कमजोर शरीर उस अन्न को पचा पाने में नाकामयाब रहता है और मौत हो जाती है. मगर सरकारी और कानूनी परिभाषा है कि अगर आमाशय में अनाज का एक दाना या घर में एक किलो अनाज भी पाया गया तो मृतक की मौत भूख से हुई नहीं मानी जायेगी.
जब कोई बड़ा अधिकारी खास तौर पर मुख्य सचिव स्तर का अधिकारी फंस रहा हो तो जाहिर है उसे बचाने के लिए कोई उसकी झोपड़ी में या उसके आमाशय में अनाज का दाना डाल सके. खैर..
यह सब कानूनी दांव-पेंच हैं. भूख से हुई मौत के साबित न हो पाने की एक बड़ी वजह यह है कि यह साबित होने पर मुख्य सचिव की गरदन फंसती है. अगर इस मसले पर थोड़ा समझदारी से विचार किया जाये तो क्या यह उचित है कि भूख से हुई हर मौत का जिम्मेदार मुख्य सचिव को माना जाये. पटना-रांची और भोपाल में बैठा अधिकारी सैकड़ों किमी दूर किसी गांव में रह रहे गरीब की मौत का जिम्मेदार तभी हो सकता है जब उसने किसी योजना के लिए फंड या अनाज जारी करने में कोई आनाकानी की हो. उसी तरह जिले का अधिकारी और प्रखंड का अधिकारी भी अपनी तरफ से तभी जिम्मेदार हो सकता है जब उसने गरीबों की मददगार योजनाओं के लागू होने में कोई बाधा खड़ी की हो. मगर उसके गांव का पंचायत सचिव, मुखिया, उसका वार्ड सदस्य, आंगनबाड़ी सेविका, आसा आदि लोग जो उस व्यक्ति को सीधे तौर पर जानते हैं, इस मौत के असली जिम्मेदार होने चाहिये. भूख से होने वाली मौतों को रोकने की जिम्मेदारी जब तक इन पर नहीं दी गयी तब तक मौते होती रहेंगी.
इन लोगों के जिम्मे कई सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन का अधिकार होता है. मुखिया के पास आपात स्थिति में बांटे जाने लायक अनाज भी होता है. उसे अपने वार्ड सदस्यों के माध्यम से यह पता लगाते रहना पड़ेगा कि क्या गांव में कोई ऐसा व्यक्ति है जो भूख से जूझ रहा है और उसे मदद करना उचित होगा. फिर उस वार्ड और आस-पास के लोगों की राय लेकर उसे मदद करना पड़ेगा.
वरना मुखियाजी तो यही सोचते हैं सचिव महोदय का मामला है, वे अपनी गरदन बचायेंगे तो हमारी गरदन भी बच जायेगी.

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