हीरो न बनायें..असीम ने सीमा तोड़ी है..


कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की बात करते वक्त चाहे-अनचाहे ओम्कारेश्वर के वे सत्याग्रही याद आ जाते हैं जो पिछले एक पखवाड़े से अधिक वक्त से पानी में बैठे अपनी जमीन के लिए संघर्ष कर रहे हैं. बांध की ऊंचाई बढ़ा दिये जाने के कारण इनके गांव के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो गया था. राज्य सरकार ने बांध की ऊंचाई कम करने का आश्वासन दिया है, इसके बावजूद लोगों को भरोसा नहीं है कि सरकार इतनी जल्दी उनके पक्ष में हो जायेगी और बिजली उत्पादन कंपनी के खिलाफ फैसले दे देगी. मगर इसके बावजूद वे चुपचाप रोज पानी में बैठ जाते हैं. उनके पांवों में पाको(पानी में ज्यादा देर तक बैठने के कारण होने वाला रोग) लग चुका है. मगर उनके नारों में क्रूर सरकारों के खिलाफ बददुआ तक नहीं निकलती. यह ठेठ गांव वालों का विरोध है, यह गांधीवाद नहीं है. गांधी जी ने जरूर इनसे अहिंसक विद्रोह के ये नायाब तरीके सीखे होंगे.
असीम के पक्ष में दर्जनों पोस्ट लिखे गये होंगे. क्योंकि सरकार अगर एक कार्टूनिस्ट को देशद्रोही करार देती है तो स्वभाविक तौर पर लोगों का गुस्सा भड़केगा. पता नहीं सरकार ने ऐसी बेवकूफी क्यों की, लगता है सरकार के भीतर एक धड़ा काम कर रहा है जो गाहे-बगाहे सरकार को इस तरह की परेशानियों में डालकर चुपचाप मजे लेता है. निश्चित तौर असीम देशद्रोही नहीं हैं, मगर उन्होंने सीमा जरूर पार की है. असीम ने यह सब या तो मानसिक दीवालियापन के तहत किया है या अतिरेक में आकर.
इंडिया अगेंस्ट करप्शन का आंदोलन भी इन्हीं सस्तेपनों के कारण असफल हुआ. आंदोलनकारी मुद्दे पर चोट नहीं कर पाये. खुद गांधीवादी अन्ना हजारे आंदोलन के रचनात्मक और अहिंसात्मक तरीकों की तलाश नहीं कर पाये. आशा है उन्होंने ओंकारेश्वर वाला आंदोलन देखा होगा और उस मौन विरोध की ताकत तो महसूस किया होगा.
असीम की भावनाएं गलत नहीं है, मगर अगर आप आंदोलन का नेतृत्व करना चाहते हैं तो छिछोरापन आपके लिए जहर है.असीम ने अपनी सीमा का अतिक्रमण किस तरह किया है उसके उदाहरण स्वरूप मैं कार्टून अगेंस्ट करप्शन की साइट से उनके बनाये कुछ कार्टून यहां लगा रहा हूं. ये कार्टून सिर्फ इस बात का इशारा करते हैं कि एक योद्धा किस तरह आपा खो बैठता है और ऊल-जुलूल हरकतें करने लगता है.
कई साथियों ने पाश और दूसरे कवियों की कविताओं के उदाहरण पेश करते हुए यह समझाने की कोशिश की है कि जब हालात हद से बाहर हो जाते हैं तो विरोध भी उसी स्तर का हो जाता है. एक तो व्यक्तिगत तौर पर मैं इस बात से सहमत नहीं कि शोषक के विरोध के लिए शोषक की भाषा अपना ली जाये. अगर ऐसा है भी तो धूमिल और राजकमल चौधरी जैसे कवियों ने भी अपनी विरोध की भाषा को इस कदर स्खलित नहीं होने दिया कि उनकी कविता और शराबी के आत्मालाप में फर्क न रहे. ऐसे में एक ही अनुरोध है असीम को हीरो न बनायें..

Comments

arun prakash said…
aseem it is not right to express ur frustation in this way of caroons
shame on you and ur parents who did not teach u to become a sensible person
arun prakash said…
जिन राष्ट्र प्रतीकों के प्रयोग खास तौर से निजी प्रयोग पर भी कुछ पाबंदिया लगी है उसका इतना भोंडा व भद्दा प्रदर्शन तथा उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम देना कहा की आजादी है आपको नेताओं से चिढ हो सकती है आप उसकी आलोचना में व्यक्तिगत रूप से कुछ भी कह सकते है लेकिन कार्टूनों में संविधान के प्रतीकों का इस प्रकार तिरस्कार व उपहास मुझे तो आक्रोशित करता है एक तरफ आप संसद को टायलट व अशोक चिन्ह को भेड़िये के रूप में दिखाते है दूसरी ओर विरोध के लिए राष्ट्रीय झन्डे व वन्दे मातरम का नारा लगते है कुछ दिन बाद ऐसे ही कार्टूनिस्ट झंडे को किसी नेता के घर डायपर के रूप में सूखता हुआ दिखा सकते है यह कौन सी देशभक्ति है याद करे की जिस संवैधानिक आजादी की दुहाई दे कर आप आजादी की मांग कर रहे है उसी के प्रतीकों का आप इतना असम्मान कर रहे है तथा सरकार से सहनशीलता का रूख की अपेक्षा करते है
यदि यही कार्टून पाकिस्तानी बनाते या मकबूल फ़िदा हुसैन बनाते तो क्या हम ऐसे ही छोड़ देते आखिर कौन सी भारत माता का जीवित पात्र हमारे मन में है जिसे अपमानित करने की इतनी आलोचना हुई थी
असीम व ऐसे सिरफिरे कुंठित मानसिकता वाले लोगो को इलाज कराना चाहिए आपको नेताओं से निराशा हो सकती है लेकिन ये प्रतीक नेताओं के नही है इतनी मर्यादा तो होनी चाहिए