बगैर विस्थापन सिचित हो गयी 10 लाख हेक्टेयर जमीन


सरकार यह मान कर चल रही है कि बगैर विस्थापन के बड़ी परियोजनाओं को आकार नहीं दिया जा सकता। अब इस योजना के कमाल को क्या कहा जाये जिसके तहत बगैर विस्थापन 10 लाख हेक्टेयर जमीन सिंचित हो गयी। भोपाल में विस्थापन के मुद्दे पर एक सेमिनार में भागीदारी के दौरान अपनी एक पुरानी स्टोरी याद आ गयी जो पंचायतनामा के मई माह के अंक में प्रकाशित हुयी है।
पिछले खरीफ में झारखंड के किसानों ने धान की रिकार्ड पैदावार की. सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस बार लगभग 65 लाख टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ है, इससे पहले खाद्यान्न का अधिकतम उत्पादन 35 लाख टन ही था. अलग राज्य बनने के बाद पहली बार ऐसा हुआ, जब झारखंड ने खाद्यान्न के मामले में न सिर्फ आत्मनिर्भरता हासिल की बल्कि हमारे पास अपने खर्चे के बाद भी इतना अनाज बचा रहेगा कि अगर इस खरीफ में पैदावार कम भी हुई तो हमें बाहर से अनाज मंगाने की जरूरत नहीं रहेगी.
किसानों की इस सफलता के पीछे जहां अच्छी बारिश को क्रेडिट दिया गया, वहीं राज्य सरकार ने समय पर खाद-बीज उपलब्ध कराने की अपनी योजना का जिक्र कर अपनी ही पीठ थपथपा ली थी. किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया कि इस दौरान राज्य में मनरेगा के तहत एक लाख से अधिक कुएं और एक लाख दस हजार से अधिक तालाब खुद गये. इसके कारण राज्य की 10 लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन को महज दो साल में सिंचाई की सुविधा हासिल हो गयी.
एक ऐसे राज्य में जहां कुल कृषि योग्य भूमि 29.74 लाख हेक्टेयर है और जहां हाल तक सिर्फ 7.4 लाख हेक्टेयर जमीन ही सिंचित है वहां यह कोई साधारण सफलता नहीं. इन आंकड़ों को देखने के बाद यह कहना गलत नहीं होगा कि झारखंड की हालिया हरित क्रांति के पीछे मनरेगा के कारण बनकर तैयार एक लाख से अधिक कुएं और एक लाख दस हजार से अधिक तालाबों का बड़ा योगदान है.
इन तालाबों ने न सिर्फ खाद्यान्न उत्पादन में हमें आत्म निर्भर बनाया बल्कि पूरे राज्य में सब्जी उत्पादन के कई पॉकेट्स बन गये जो सब्जी उत्पादन के नये रिकार्ड कायम कर रहे हैं. अब राज्य सरकार पर दबाव है कि वे इन सब्जी उत्पादकों के लिए कोल्ड स्टोरेज की चेन बनाये और फूड प्रोसेसिंग यूनिटों की स्थापना करे ताकि इनका अतिरिक्त उत्पादन बरबाद न हो और इन्हें पसीने के एक-एक बूंद की कीमत मिले.
एक लाख से अधिक कुएं और एक लाख दस हजार से अधिक तालाबों से जुड़े सवा दो लाख से अधिक सफल किसान खनिज उत्पादन के लिए मशहूर इस राज्य को खेती के मानचित्र पर स्थापित करने में जुटे हैं. मनरेगा के सौ दिन के रोजगार की योजना आज इनके लिए ईश्वरीय वरदान साबित हो रही है. इस सफलता के पीछे 13 लाख मजदूरों के मेहनत का बड़ा योगदान है.
इस बदलाव को केवल किसानों को उपलब्ध होने वाली सुविधा के रूप में और मजदूरों को मिलने वाली मजदूरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. इसने विकास की बरसों पुरानी सोच को भी खारिज कर दिया है जिसके तहत माना जाता था कि बड़ी परियोजनाओं से ही बदलाव संभव है.
जैसे कि ऊपर बताया जा चुका है कि महज चार-पांच साल में पूरी होने वाली इस परियोजना से न एक घर उजड़ेगा और न ही कोई नदी असमय काल के गाल में समायेगी. पिछले चालीस साल से स्वर्णरेखा समेत कई बड़ी परियोजनाएं झारखंड में चल रही हैं. इसके कारण लाखों लोग विस्थापित होकर बदहाल हो गये हैं. मनरेगा के मसले में जितनी भ्रष्टाचार की चर्चा होती है उससे काफी अधिक भ्रष्टाचार इन परियोजनाओं के जरिये हुआ है. इसके बावजूद आज तक नहरों में पानी के दर्शन नहीं होते. जहां होते भी हैं वहां कुछ ही सालों में नहरें बेकार हो जाती हैं.
पिछले दशक से देश के पर्यावरणविदों ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि नहरों के बदले सिंचाई के परंपरागत साधन जैसे तालाब, आहर और कुएं ज्यादा बेहतर परिणाम दे सकते हैं. मगर इसे हमेशा पुरातनपंथी विचारधारा मान कर खारिज किया जाता रहा. इसके बदले नदी जोड़ो परियोजना जैसी अव्यवहारिक योजना को बढ़ावा दिया जाता रहा. मगर अब मनरेगा के बहाने इन परंपरागत उपायों की बहाली के सकारात्मक उपाय सामने आ रहे हैं.
देश के तमाम पर्यावरणविद अगर चाह भी लेते तो उनकी बातों का समर्थन करने वाले हजारों एनजीओ मिल कर यह काम एक पूरी सदी में नहीं कर पाते. मगर मनरेगा के कारण यह काम आज जमीन पर उतरा है. आज झारखंड ही नहीं पूरा भारत पर्यावरणविद अनुपम मिश्र की इस बात को समझ रहा है कि सचमुच आज भी खरे हैं तालाब. झारखंड के गांव-गांव में नये तालाब खुद रहे हैं और पुराने तालाबों में जान-फूंकने की कोशिश की जा रही है.
पेयजल एवं स्वच्छता विभाग तक पेयजल आपूर्ति के लिए अब पाइप आधारित परियोजना के साथ-साथ पुराने कुओं के जीणोंद्धार की योजना को मदद करने के लिए तैयार है. पंचायतनामा के साथ हुई बातचीत के दौरान विभाग के प्रधान सचिव सुधीर प्रसाद ने कहा कि ताजा जनगणना के आंकड़े बताते हैं, झारखंड के 36 फीसदी लोग आज भी कुएं का पानी पीना पसंद करते हैं. ऐसे में अगर कोई पंचायत अपने पुराने कुएं को पुनर्जीवित करना चाहती है तो योजना बनाकर हमारे पास भेजे. हम उन्हें इसके लिए आवश्यक धनराशि उपलब्ध करायेंगे. जब हर पंचायत में 50-50 कुएं खुद रहे हों तो भला पेयजल का संकट कैसे होगा. गांव की महिलाओं को दो-दो किलोमीटर दूर जाकर पानी लाने की परेशानी से भी मुक्ति मिलेगी.

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