Tuesday, October 16, 2012

प्रेम की आग और नाबालिग समाज


प्रेम की आग बड़ी भीषण होती है, इस पर जितना पानी डालो आग बुझती नहीं भड़कती ही है. मगर हमारा समाज जो खुद प्रेम के मामलों को हैंडिल करने में इतना नाबालिग है कि वह प्रेम की आग में पानी के बदले केरोसिन उढ़ेल देता है.
महज एक दशक पहले तक जब मैं युवा था, हमारे लिए प्रेम दूसरी दुनिया की चीज हुआ करती थी. हमारा समाज युवाओं के इस लहकते प्रेम से तकरीबन अनजान था. प्रेमी युगल फरार जैसी खबरें कोसी-मिथिला इलाकों में नहीं छपती थीं. यह रांची-पटना और टाटा जैसे शहरों की कहानी होती थी. मगर इक्कीसवीं सदी ने हमारे समाज को प्रेम की लपटों के करीब ला दिया है. समाज झुलसने लगा है.
जाहिर है संदर्भ मधुबनी की वह घटना है जिसमें एक किसान का बेटा एक अफसर की बेटी के साथ प्रेम कर बैठा और इसके बाद जो आग जली उसने न सिर्फ मधुबनी शहर बल्कि पूरे बिहार को झुलसा डाला. मुख्यमंत्री की सालों की मेहनत लगा एक पल में स्वाहा हो जायेगी. इससे पहले एक पत्रकार युवती की कहानी हम देख ही चुके हैं, जिसने खुदकुशी कर ली थी. कहने को ही वह कहानी महानगरीय थी, उसकी जड़ें कोसी और मिथिला के कछार में ही थी. पिता ज्योतिष की दुहाई दे रहे थे कि तुम्हारा राहु प्रबल है वह मस्तिष्क को स्थिर रहने नहीं दे रहा. ऐसे में कोई निर्णय नहीं लेना चाहिये. युवती राहू के क्षणिक आवेग से बचायी नहीं जा सकी.
भागलपुर के नाथनगर शहर की एक घटना भुलाये नहीं भूलती. एक युवती ने अपने मामा पर दुष्कर्म का आरोप लगाता हुआ एक पत्र अपने घर पर छोड़ दिया और लापता हो गयी. पत्र में उसने जान देने की सूचना छोड़ी थी. पूरा शहर इस चिट्ठी से उद्वेलित हो गया. रिश्तों के खत्म हो जाने की दुहाई दी गयी. मामा को तत्काल गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया. 15 दिनों बाद पता चला कि भांजी अपने प्रेमी के साथ दिल्ली में है. यह काम उसने लोगों का ध्यान भटकाने के लिए किया था. मधुबनी से गायब हुए किशोर ने भी कुछ ऐसी ही हरकत की. इन बच्चों का क्या किया जा सकता है?
किसको दोष दिया जाये? टीवी पर सपरिवार बिग बॉस देखने वाले हमारे समाज में आज भी शादी से पहले लड़की देखने का रिवाज नहीं है. जो देखते हैं उन पर नैतिक दबाव रहता है कि देख कर लड़की को न ठुकरायें वरना लड़की की शादी में परेशानी होगी. आप कहेंगे, दकियानूसी बातें कर रहा हूं. मगर कैसे प्रगतिशील हो जाऊं. पूरे समाज को हनुमान कूद लगाने कैसे कह दूं.
एक परिचित हैं, उनके बेटे ने जिद ठान ली कि शादी वह अपनी ममेरी बहन से ही करेगा. वरना जान दे देगा. बेबस होकर उनने बेटे की बात मान ली, अब एक तरह से पूरे समाज का अघोषित बहिष्कार ङोल रहे हैं. एक सज्जन ने बेटे के प्रेम विवाह को औपचारिक रूप दिया और कहा अंतजार्तीय विवाह समय की मांग है, वरना उनका समाज जेनेटिक बीमारियों से अकाल-कलवित हो जायेगा.
मगर इतनी समझ और हिम्मत किसमें है. जिस बेटी का बाप ए-ग्रेड का अधिकारी है, राजनेता है. वह तो पूरी ताकत झोंक देगा.
बच्चे डरते हैं अपने मां-बाप से प्रेम की बात करने में. इसलिए वे एक झटके में फैसला करते हैं. भाग चलें या जान दे दें. आप जब बिग बॉस देख रहे होते हैं तो उसकी घटनाओं पर चर्चा क्यों नहीं करते. बच्चों को समझाते क्यों नहीं, उनसे बातें क्यों नहीं करते, उनसे प्यार क्यों नहीं करते, उन्हें वक्त क्यों नहीं देते. बातें करेंग तब तो बतायेंगे कि पापा मुङो फलानां बाबू की बेटी अच्छी लगती है.
अच्छी लगने का मतलब हमेशा शादी कर लेना थोड़े ही होता है. अच्छी लगती है तो बातें करो, साथ खेलो, पढ़ो, घूमे, देखो-समझो.. फिर बताओ दोस्ती के लिए अच्छी लगती है या शादी के लिए. करीना और सैफ पांच साल साथ रहने के बाद शादी का फैसला करते हैं, मगर हमारे गांव के बच्चे दो बार नजर मिलते ही शादी का फैसला कर बैठते हैं. ये हालात कब बदलेंगे.

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