Sunday, November 25, 2012

मुस्कान बिखेरता बुजुर्गो का वालमार्ट


पिछले दिनों टीवी पर एक चाकलेट कंपनी का विज्ञापन काफी लोकप्रिय हुआ था. उस विज्ञापन की टैग लाइन थी, इस दीवाली आप किसे खुश करेंगे? भीषण महंगाई के इस जमाने में कितने लोगों ने इस दीवाली में दूसरों को खुश किया यह तो पता नहीं, मगर कोसी और मिथिला के बुजुर्गो ने 55 असहाय बुजुर्गो और महिलाओं के चेहरे पर मुस्कुराहट बिखेर दी. उन्होंने इन लोगों के बीच साड़ी और कंबंल का वितरण किया है. सबसे रोचक बात तो यह है कि ऐसा अनूठा काम करने वाले ये बुजुर्ग पैसे वाले लोग नहीं हैं. ये लोग सामान्यत: गरीब और निम्न मध्यवर्ग से आते हैं. इन्होंने इस कार्य के लिए अपने बजट में कटौती भी नहीं की है. बस त्योहार के मौके पर मिठाई की थोक खरीदारी की और इस वजह से जो पैसे बच गये उससे उन्होंने इस अनूठे काम को अंजाम दिया.
दीवाली के मौके पर इन बुजुर्गो ने जो मिसाल पेश की है यह उनके लिए कोई अनोखी बात नहीं. पिछले कुछ महीनों से इस इलाके के बुजुर्ग सामूहिक खरीदारी के फामरूलों से अपने लिए पैसे बचा रहे हैं और जब भी जरूरत महसूस हुई लोगों की मदद कर रहे हैं. उम्र के इस दौर में जब लोगों को युवा कंधों के सहारे की जरूरत होती है, ये बुजुर्ग पैसे बचाकर अपने परिवार के युवाओं के लिए ही मददगार साबित हो रहे हैं.
कोसी और मिथिला के तकरीबन 300 बुजुर्ग स्वयं सहायता समूह के चार हजार बुजुर्ग हर माह अपने-अपने गांव में बैठक कर घर में इस्तेमाल होने वाले सामान की सामूहिक सूची तैयार करते हैं. इस सूची में आम तौर पर सरसों तेल, आलू, प्याज, चीनी, चाय की पत्ती, साबुन आदि होते हैं. चूंकि हर परिवार इन सामग्रियों पर आम तौर पर दो सौ से एक हजार रुपये हर माह खर्च करता ही है, सो उन्होंने तय किया है कि हर गांव के बुजुर्ग ऐसी खरीदारी सामूहिक तौर पर करेंगे. इससे पैसे भी बचेंगे और वे कोई अच्छा काम भी कर पायेंगे. दरभंगा जिले के तारडीह प्रखंड के राजा खरवार गांव का शिव वृद्ध सहायता समूह भी पिछले महीने से इसी तरह घरेलू सामान की खरीदारी कर रहा है. समूह के अध्यक्ष राधा वल्लभ सिंह(76) बताते हैं कि आमतौर पर सरसों तेल गांव की दुकान में एक सौ दस रुपये किलो बिकता है, मगर जब इसे थोक में खरीदते हैं तो यह सौ रुपये से भी कम पड़ता है. गांव में 44 रुपये किलो बिकने वाली चीनी उनके समूह के लोगों को 38.50 रुपये पड़ती है. इसी तरह प्याज, आलू, साबुन और नमक में भी हम लोगों को अच्छी खासी बचत हो जाती है. समूह के सचिव राजेंद्र यादव(67) बताते हैं कि समूह के सदस्य बचत की पूरी राशि खुद नहीं रखते. बचत की आधी राशि समूह में ही छोड़ देते हैं ताकि जरूरत पड़ने पर समूह के किसी सदस्य की सहायता की जा सके या इच्छानुसार किसी असहाय की मदद की जाये. मधुबनी जिले के झंझारपुर प्रखंड के मदनपुर गांव के 9 बुजुर्ग स्वयं सहायता समूह दो-तीन महीने से इस तरह की खरीदारी कर रहे हैं. इन समूहों से जुड़े 116 बुजुर्गो ने इस तरीके से अब तक 10 हजार रुपयों की बचत कर डाली है. ये लोग हर पंद्रह दिन पर खरीदारी करते हैं और हर खरीदारी में हजार-डेढ़ हजार रुपयों की बचत कर लेते हैं. इस अभियान के पीछे देश भर में बुजुर्गो के लिए काम करने वाली संस्था हेल्प-एज इंडिया के कार्यकर्ताओं की बड़ी भूमिका है.
यह संस्था मधुबनी के झंझारपुर और सुपौल के करजाइन बाजार में पिछले तीन सालों से बुजुर्गो की बेहतरी के लिए काम कर रही है. इसके लिए उन्होंने इस इलाके में बुजुर्गो के स्वयं सहायता समूह बनाये हैं. संस्था के बिहार प्रमुख गिरीश चंद्र मिश्र बताते हैं कि उनकी संस्था ने बुजुर्गो की समस्या के समाधान के लिए स्वयं सहायता समूह की पद्धति को अपनाया है, क्योंकि उनका मानना है कि जब तक बुजुर्ग आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होंगे उनकी समस्याओं का समाधान नहीं होगा. वे कहते हैं कि 2008 में महज चार साल पहले कोसी का इलाका भीषण बाढ़ की तबाही ङोल रहा था. इस तबाही से उबरना आसान नहीं था. पहले से ही काफी गरीब इस इलाके के लोग बाढ़ के बाद सपरिवार पलायन करने लगे. उनके जाने के बाद यहां बच गये उनके बूढ़े मां-बाप. किस्मत के हाथों मजबूर उनके बच्चों ने उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया था. मगर अब इस इलाके के चार हजार बुजुर्ग सामूहिकता की भावना को अपनाकर एकमुश्त घर की जरूरत का सामान खरीदते हैं और इस तरह उनके काफी पैसे बच जाते हैं. इस पूरी प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए हेल्प-एज इंडिया के झंझारपुर कार्यालय के प्रभारी बताते हैं कि बुजुर्ग स्वयं सहायता समूहों ने इस अनूठे उपाय की शुरुआत खुद की. यह योजना उनके द्वारा खुद बनायी गयी थी. शुरुआत चांद बिहार वृद्ध स्वयं सहायता समूह ने रमजान के महीने में की थी. समूह की 11 बुजुर्ग महिलाओं ने झंझारपुर बाजार से महीने के सामान की खरीदारी की और इससे उन्हें 12 फीसदी का मुनाफा हुआ. इसके बाद तो सिलसिला ही निकल पड़ा. अब आसपास के गांव के बुजुर्ग सहायता समूहों ने भी इस पद्धति को अपना लिया है.
यह खबर पंचायतनामा के 26 नवम्बर के अंक में प्रकाशित हुयी है.

1 comment:

Anonymous said...

Yahi tumhai khoobi hai, jo tumane dekha use utar diya hoo ba hoo. Bahut kam hi shabdon mein, tumhri ye pahal mujhe, mere sathiyon aur bujurgon ko prerit karegi