हौसला बढ़ाता सुपर पॉजिटिव फौजी


आनंद (बदला हुआ नाम) से जब आप मिलेंगे तो लगेगा कि इससे अधिक सकारात्मक सोच का इंसान हो ही नहीं सकता. चेहरे पर मुस्कान, आंखों में उम्मीद और बातों में जोश, बहुत कुछ बदल देने की तमन्ना. क्यों न हो, आखिर वे झारखंड के पॉजिटिव लोगों के समूह के सचिव जो हैं. पॉजिटिव समूह के नेता को तो सुपर पॉजिटिव दिखना ही चाहिये. अपने दो अन्य सक्रिय साथियों के साथ आनंद इस नेटवर्क से जुड़े 3000 एचआइवी पीड़ितों के लिए उम्मीद और भरोसे का नाम बन गये हैं. एचआइवी की रिपोर्टिग के दौरान हमारी मुलाकात अनायास ही उनसे हो गयी. डेढ़ घंटे चली इस मुलाकात के बाद हमारा मानना था कि आनंद से अधिक सकारात्मक इंसान आम लोगों की दुनिया में भी गिने-चुने ही नजर आते हैं.
एचआइवी-एड्स रोगों के इतिहास में सबसे भीषण रोग माना जाता है. अगर किसी को पता चल जाये कि वह एचआइवी का शिकार हो चुका है तो वह एक झटके में घनघोर निराशा में डूब जाता है. उसे सामने मौत नजर आती है और अपने परिचितों की नजर में नफरत. किस्मत के मारे और समाज से ठुकराये ऐसे लोगों के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है सकारात्मक सोच के साथ जीवन जीना. मगर अधिकांश लोग इतने सौभाग्यशाली नहीं होते. ऐसे ही एक व्यक्ति हैं सतीश(बदला हुआ नाम). पिछले दिनों जब उन्हें पता चला कि वे एचआइवी से पीड़ित हैं तो सदमे में उन्हें पारालाइसिस का अटैक आ गया. पिछले कुछ दिनों से आनंद उन्हें अपने साथ ही लेकर घूम रहे हैं. आनंद की जिंदादिली और आसपास के लोगों के सकारात्मक बर्ताव को देखकर सतीश में काफी सुधार आया है. अब वे लोगों से बातचीत करते हैं. लकवे का शिकार उनका हाथ भी थोड़ा बहुत काम करने लगा है. आंनद के कारण सतीश जैसे सैकड़ों एचआइवी पीड़ितों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है. उन लोगों की कहानियां सुनाते-सुनाते आनंद की आंखें नम हो जाती हैं. कहते हैं, अधिकांश एचआइवी पीड़ितों से उनकी पहली मुलाकात किसी अंधेरे कोने में होती है. वह कंबल में या किसी ओढ़ने में अपना शरीर छुपाए बैठा रहता है. अब तो अस्पताल में इस तरह बैठे लोगों को पहली नजर में देख कर ही उन्हें समझ में आ जाता है कि वह व्यक्ति जरूर एचआइवी पॉजिटिव होगा.
एक एचआइवी पीड़ित से इतना कहना कि देखो, मैं भी एचआइवी पीड़ित हूं. एचआइवी पीड़ित होने से दुनिया खत्म नहीं हो जाती. उसका आत्म विश्वास लौटाने के लिए काफी होता है. और आनंद के इस पहले संबोधन और उसके संसर्ग के कारण उन तमाम लोगों के जीवन में फिर से सवेरा आ गया है. मगर जीवन की उम्मीद जगाना ही सब कुछ नहीं है. आनंद कहते हैं कि हमारा समाज आज भी एचआइवी पीड़ितों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता. अच्छे खासे हैसियत वाले एचआइवी पीड़ितों को भी घर के किसी कोने में, गुहाल में या गैराज में रहने की जगह दी जाती है. उनसे भेद-भाव किया जाता है. अगर एचआइवी पीड़ित विधवा हो तो उसे कई तरह की यंत्रणा भी दी जाती है. इसके अलावा रिश्तेदार उनकी सम्पत्ति हड़पने की भी कोशिश करते हैं. अनाथ बच्चों के मामले तो और भी दुखदायी है. स्कूलों में कोई उनसे बातें नहीं करता. घर में कोई उनकी देखभाल करने वाला नहीं होता. इसके अलावा इंश्योरेंश कंपनियों के एजेंट भी एचआइवी पीड़ितों का पैसा अटका लेते हैं. नेटवर्क की सबसे बड़ी जिम्मेदारी इन लोगों के लिए लड़ाई लड़ना है. एक फौजी होने के नाते आनंद इन लड़ाइयों में हमेशा आगे रहते हैं. वे बताते हैं कि पिछले दिनों गिरिडीह के राजधनवार में एक एचआइवी पीड़ित महिला को जिंदा जलाने की कोशिश की गयी, वहीं बोकारो के नवाडीह में पीड़ित महिला को निर्वस्त्र करने की कोशिश की गयी. इन मौकों पर वे झारखंड एड्स नियंत्रण सोसाइटी की टीम के साथ गये और इन महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की.
आनंद हमेशा से इतने ऊर्जावान और उत्साही नहीं थे. एचआइवी ग्रस्त होने के बाद 5-6 साल तक उनका जीवन भी निराशा में डूबा हुआ था. वे बताते हैं कि 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान रक्तदान करते वक्त उन्हें पता चला था कि वे पॉजिटिव हैं. फिर उन्हें जबरन वीआरएस देकर घर भेज दिया गया कि उनकी शारीरिक स्थिति फौज में काम करने लायक नहीं रही. घर लौटकर आये तो खुद से ही शर्म आती थी, परिवार का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे. इस बीच थोड़ा-बहुत इलाज भी चलता रहा. 2005 में उनकी मुलाकात हजारीबाग में एड्स पीड़ितों की सेवा करने वाली सिस्टर ब्रीटो से हुई. इस मुलाकात के बाद उनका जीवन बदल गया. आनंद बताते हैं कि सिस्टर ने उन्हें अपने साथ जोड़ लिया और वे उनके साथ गांव-गांव जाकर लोगों को एड्स के बारे में जागरूक करने और एड्स पीड़ितों को परामर्श देने लगे. उनके सात दो अन्य एचआइवी पॉजिटिव एक पुरुष और एक महिला ने काम करना शुरू किया था. दूसरे रोगियों की हालत देखकर वे अपना गम भूलने लगे. इसी बीच वे झारखंड एड्स नियंत्रण सोसाइटी के संपर्क में आये. सोसाइटी के ही सहयोग से 18 मई 2006 को रांची में पॉजिटिव लोगों के नेटवर्क की स्थापना की गयी. पहली बैठक में 110 एचआइवी पॉजिटिव जमा हुए थे. फिर सात अन्य जिलों में जिला स्तरीय नेटवर्क की स्थापना की गयी.
2008 में आनंद ने एक पॉजिटिव विधवा युवती से विवाह किया और अभी दोनों एक साथ रांची में रहते हैं और दूसरे पीड़ितों की मदद करते हैं. वे राज्य के पहले एचआइवी पीड़ित हैं जिन्होंने विवाह किया है. उनके बाद राज्य में 9 पॉजिटिव जोड़ियों का विवाह हुआ है. आनंद अपनी पत्नी से काफी प्यार करते हैं, इसलिए संतानोत्पत्ति के लिए प्रयास नहीं करते. उन्हें लगता है कि गर्भावस्था के दौरान कहीं उनकी पत्नी की रोग प्रतिरोधक क्षमता घट न जाये.
आज उनकी जिंदगी इतनी व्यस्त हो गयी है कि उन्हें अपने रोग के बारे में भी सोचने का वक्त नहीं मिलता. हमेशा साथियों के दुख, उनकी असुविधाओं, उनके साथ होने वाले अन्याय और उनके जीवन के बारे में सोचते-सोचते ही उनका वक्त गुजरता है. पिछले 13 सालों से एचआइवी के साथ जी रहे आनंद कोई दवा नहीं लेते. वे मानते हैं कि उनकी सक्रियता और सकारात्मकता का ही कमाल है कि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बिना किसी दवा के बढ़ रही है. वे कहते हैं कि इस रोग का कोई भरोसा नहीं, किसी भी दिन यह उन पर हावी हो सकता है. मगर आज तक वे पूरी तरह स्वस्थ हैं, लगातार सक्रिय हैं और दूसरों के लिए मददगार
(यह खबर पंचायतनामा के 3 दिसंबर के अंक में प्रकाशित हुयी है.)
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