Sunday, December 16, 2012

कैश सब्सिडी - बड़े धोखे हैं इस राह में

दिल्ली सरकार ने अन्न श्री योजना लागू कर कैश सब्सिडी पर छाये धुंध को साफ़ कर दिया है। अब तक लोग यही कह रहे थे कि सरकार राशन के बदले कैश नहीं देगी। मगर सरकार कैश सब्सिडी के नाम पर क्या और कैसे करेगी यह इस ताजा तरीन उदाहरण से जाहिर है। वह इसी तरह पूरे देश के गरीबों के खाते में 600 रुपये दाल देगी और कहेगी इससे सपरिवार पूरे महीने खा लो। पंचायतनामा का हमारा नया अंक संयोगवश इसी मुद्दे की पड़ताल कर रहा है। इसमें मेरा एक आलेख प्रकाशित हुआ है कि कैसे गरीब कैश सब्सिडी के बदले राशन प्रणाली में सुधार चाहते है। पूरा आलेख पढ़ें -
छोटी-छोटी चोरियों के कारण गांवों में बरसों से गरीबों को राशन और केरोसिन उपलब्ध करा रही जन वितरण प्रणाली की छवि नकारात्मक हो गयी है और इस प्रणाली की ऐसी छवि के कारण सरकार ने इन्हें बंद करवा कर लोगों के खाते में उनकी सब्सिडी एकमुश्त डलवा देने का फैसला कर लिया है. पहली नजर में तो इस भारी भरकम रकम के बारे में जान कर लोगों को लगता है कि इससे बेहतर कोई बात नहीं हो सकती, मगर जब वही लोग इस मसले पर गंभीरता से विचार करते हैं तो उन्हें लगता है कि लाख बुरा सही अपनी राशन दुकान ही बेहतर है, इसी व्यवस्था में सुधार लाया जाये तो उनके लिए बेहतर होगा. खाते में आने वाली रकम को लेकर उनके मन में कई आशंकाएं हैं. इन आशंकाओं ने मनरेगा के लिए काम करते हुए उनके मन में जगह बनायी है. यह सर्वविदित तथ्य है कि मनरेगा का पैसा कभी समय पर नहीं मिलता, राशन तो महीने के महीने मिल ही जाता है. अगर सब्सिडी का पैसा समय पर नहीं मिला तो भूखों मरने की नौबत आ जायेगी. इसके अलावा लोगों को यह भी लगता है कि सब्सिडी के पैसों का दुरुपयोग हो सकता है. लोग इस पैसे का इस्तेमाल उस काम में नहीं करेंगे जिसके लिए यह दिया जा रहा है. विशेष तौर पर महिलाएं मानती हैं कि पैसा मर्दो के नाम पर आयेगा और वे इसे दारू में या जुएं में फूंक डालेंगे. वहीं, बाजार की कीमतों ने हाल के वर्षो में इस कदर बेवफाई की है कि गरीब लोगों का खास तौर पर इस बात से भरोसा उठ गया है कि पैसों से जरूरत का हर सामान समय पर खरीदा जा सकता है. उन्हें लगता है कि जिस केरोसिन पर सब्सिडी उन्हें 30 रुपये की दर पर मिल रही है, वह किसी भी रोज 50 से 60 रुपये की दर पर उपलब्ध हो सकता है. ऐसे में उनका कैश बेकार साबित हो जायेगा. राशन दुकान की कीमतों का भरोसा है, मगर बाजार की कीमतों का कोई भरोसा नहीं है. इन्हीं वजहों से अधिकतर गरीब लोग चाहते हैं कि जन वितरण प्रणाली में ही अपेक्षित सुधार लाया जाये बनिस्पत कि सरकार सब्सिडी का पैसा उनके खाते में डाल दे. लोगों की राय जानने के लिए हाल ही में इससे संबंधित दो अध्ययन सामने आये, पहला जानेमाने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज और रीतिका खेड़ा द्वारा किया गया अध्ययन है और दूसरा दिल्ली की संस्था रोजी रोजी अभियान का. इन सव्रेक्षणों से उपर बतायी गयी बातें पुख्ता तरीके से प्रमाणित होती हैं. इन दोनों अध्ययनों के मुताबिक गरीब लोग उनके अकाउंट में नकदी के हस्तांतरण के बदले अनाज पाना अधिक पसंद करते हैं. जबकि मुक्त बाजार के कई पैरोकार अर्थशास्त्री मानते हैं कि सरकार को भ्रष्ट जनवितरण प्रणाली से निजात पा लेना जरूरी है और इसका सबसे बेहतर उपाय नकदी हस्तांतरण की पद्धति को लागू करना है. हालांकि उनका यह नजरिया दूसरे मुल्कों के अनुभवों पर आधारित है, जबकि ये दोनों अध्ययन अपने देश के सबसे गरीब लोगों के बीच कराये गये हैं. देश के कई सामाजिक संगठनों और ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत संगठनों का मानना है कि छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश की तर्ज पर अगर जनवितरण प्रणाली को विकसित किया जाये तो यह ज्यादा बेहतर साबित हो सकता है.
द्रेज और खेड़ा का अध्ययन- द्रेज और खेड़ा ने आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, ओड़िशा, राजस्थान, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश राज्य के दो जिलों के दो-दो प्रखंडों के बीच यह सव्रेक्षण कराया. यह सव्रेक्षण में हर चयनित प्रखंड के छह गांवों के 12 परिवारों के बीच कराया गया, इस तरह इस अध्ययन में कुल 1227 गरीब और अंत्योदय योजना का लाभ ले रहे परिवार शामिल हुए. इन 106 गांवों में फैले परिवारों में से महज 18 फीसदी परिवार ने ही नकदी हस्तांतरण की योजना को पसंद किया, जबकि 67 फीसदी लोगों ने अपने राशन की दुकान से अनाज हासिल करने के विकल्प को पसंद किया. नकदी हस्तांतरण के विकल्प को पसंद करने वाले लोग ज्यादातर उन इलाकों के थे जहां जनवितरण प्रणाली ठीक से काम नहीं करती है. ये राज्य हैं बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश. जबकि जिन इलाकों में हाल के वर्षों में जनवितरण प्रणाली की प्रक्रिया में सकारात्मक बदलाव आया है वहां के लोग अपनी राशन दुकानों से ही राशन लेना चाहते हैं. आंध्र प्रदेश में ऐसा चाहने वालों की संख्या 91 फीसदी है, छत्तीसगढ़ में 90 फीसदी और ओड़िशा में 88 फीसदी है.द्रेज और खेड़ा के अध्ययन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जनवितरण प्रणाली उन राज्यों में काफी बेहतर काम कर रही है जहां बाजार में अनाज की कीमत अधिक है और राशन दुकानों में कीमतें कम और राशन दुकानदार के साथ-साथ सरकार की राजनीतिक इच्छा ऐसी है कि अधिक से अधिक लोग राशन दुकान से लाभान्वित हो सकें. कई राज्यों में राशन की गड़बड़ियों को रोकने के लिए जीपीआरएस, जीपीएस, एसएमएस और बायोमीट्रिक प्रणाली का इस्तेमाल किया जा रहा है.
रोजी-रोटी अधिकार अभियान का अध्ययन- रोजी-रोटी अधिकार अभियान, दिल्ली जो 30 के करीब संस्थाओं का संगठन है ने दिल्ली सरकार द्वारा स्मार्ट कार्ड को लागू करते हुए पीडीएस प्रणाली को खत्म करने के सुझाव पर दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ियों के 4005 घरों में सव्रेक्षण कराया. अध्ययन से नतीजे निकल कर आये कि कैश ट्रांसफर योजना को लागू करने से बेहतर जन वितरण प्रणाली में सुधार लाना होगा. 90 फीसदी उत्तरदाताओं ने जनवितरण प्रणाली में सुधार के विकल्प को पसंद किया, महज 5 फीसदी वोटरों ने कैश सब्सिडी के विकल्प को बेहतर बताया जबकि 3.6 फीसदी लोगों ने इस पर कोई राय जाहिर नहीं की. अंत्योदय पाने में यह संख्या कहीं और अधिक थी (91.7 फीसदी), बीपीएल परिवार (94.5 फीसदी) और एपीएल परिवार (90.1 फीसदी) ने जन वितरण प्रणाली की बेहतरी की वकालत की. सिर्फ 3.6 फीसदी बीपीएल परिवार, 7 फीसदी एपीएल परिवार और 5.8 फीसदी अंत्योदय का लाभ ले रहे परिवार ने कैश सब्सिडी के विकल्प को पसंद किया.
लाभार्थियों की होगी जेब ढीली!-झारखंड में राशन दुकानों पर मुख्यत: खाद्यान्न(चावल और गेहूं), केरोसिन और आयोडाइज्ड नमक मिलता है. जहां बीपीएल योजना और अंत्योदय अन्न योजना के तहत एक रुपये प्रति किलो की दर से 35 किलो चावल दिया जाता है, वहीं अतिरिक्त बीपीएल योजना के तहत इसी दर से 20 किलो अनाज दिया जाता है. अन्नपूर्णा योजना के तहत 10 किलो चावल मुफ्त वितरित किया जाता है. एपीएल परिवारों को 7.5 किलो चावल और 7.5 किलो गेहूं वितरित किया जाता है, जिसकी कीमत क्रमश: 9.21 रुपये और 6.88 रुपये प्रति किलो होती है. सभी बीपीएल परिवारों को एक किलो रिफाइंड आयोडाइज्ड नमक बांटा जाता है और उसकी कीमत 50 पैसे प्रति किलो की दर से ली जाती है. शहरी क्षेत्रों में 3 लीटर और ग्रामीण क्षेत्रों में 4 लीटर केरोसिन वितरित की जाती है. नयी योजना के तहत इनके बदले नकद राशि सीधे लाभार्थियों के खाते में जायेगी. इसके लिए यह तय किया जाना है या तय होगा कि इन खाद्यान्नों, नमक या केरोसिन को सरकार कितने पैसे में खरीदती है. सरकारी खरीद मूल्य में से लाभार्थियों द्वारा चुकायी गयी कीमत को घटाने के बाद जो कीमत बचती है वही सब्सिडी है, जिसे सरकार सीधे आपके खाते में डालने जा रही है. सरकार आपसे चाह रही है कि इन पैसों से आप अपनी जरूरत की इन तमाम सामग्रियों को खुद खरीद लें. मगर इस व्यवस्था में कुछ ऐसे सवाल हैं जो लाभार्थियों को परेशानी में डाल सकते हैं. पहला सवाल यह है कि सरकार चावल, गेहूं या नमक, केरोसिन का खरीद मूल्य जिसे मानती है वह बाजार मूल्य से काफी कम है. वह केरोसिन, नमक, चावल और गेहूं थोक कीमत पर खरीदती है. मगर उपभोक्ताओं को उसकी खुदरा कीमत चुकानी होगी. हम यह भली भांति जानते हैं कि महानगरों के थोक मूल्य और गांवों की दुकानों में खुदरा मूल्य में कितना अंतर हो सकता है. नमक का कोई पैकेट आज शायद ही दस रुपये प्रति किलो से कम बिकता हो. गांव के बाजार में शायद ही कहीं केरोसिन 30 रुपये प्रति लीटर से कम बिकता हो. इस तरह जितना पैसा आपको मिलेगा उसमें उतना सामान आप शायद ही खरीद पायें जितना आपको राशन की दुकानों में मिल जाता है. दूसरा सवाल यह है कि बाजार की कीमतों पर किसी सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. बंपर पैदावार के बावजूद चावल और गेहूं की अनियंत्रित कीमतें किसी से छुपी नहीं हैं. केरोसिन किसी पंप पर बिकेगा नहीं जहां उसकी कीमत तय हो. खुले बाजार में यह 50 रुपये लीटर भी बिक सकता है. सरकार को तो केरोसिन थोक में 15 रुपये लीटर ही पड़ता हो सो सरकार आपको सब्सिडी के तौर पर इसके लिए शायद ही कोई पैसा दे. तीसरा सवाल यह है कि सब्सिडी कैश में आने से बाजार में मांग बढ़ेगी और उपलब्धता में कमी आयेगी. ऐसे में कीमतों में उछाल स्वभाविक है. इन तीनों वजहों से यह लगभग तय है कि लोगों को हर हाल में अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी.

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