कौन सिखायेगा हमें गुस्से को वोट में बदलना?


संचार क्रांति के इस दौर में भी सरकार को दिल्ली की गूंज ही सुनायी पड़ती है, यह निश्चित तौर पर गंभीर सवाल है. मगर सिर्फ इस बिना पर हम किसी आंदोलन को खारिज नहीं कर सकते. अगर सरकार को दिल्ली का उबाल ही समझ में आता है तो हमें दिल्ली जाकर ही उबलना पड़ेगा. अगर सरकार को यही दवा सूट कर रही है तो उसी दवा का डोज देना पड़ेगा. लोग इसे वीकेंड की भीड़ कह सकते हैं. यह है भी. हो सकता है सोमवार से भीड़ छटने लगे और उबाल घट जाये. मगर अगर सरकार ने कुछ सकारात्मक नहीं किया तो यही भीड़ दुबारा शनिवार को ज्यादा जोर-शोर से उमड़ेगी. अगर इतवारी क्रांति से व्यवस्था बदलेगी तो हमें इतवारी क्रांति का ही सहारा लेना पड़ेगा.
ठीक है यह मिडिल क्लास की भीड़ है और इसके पीछे मीडिया का हाइप है. गांव के लोग गांव में लड़ते-लड़ते मर जाते हैं और उनकी आवाज कोई सुनता तक नहीं. पर क्या इस वजह से इस आंदोलन को समर्थन नहीं दिया जाये? लोग यह भी कहेंगे कि यह इंडिया का आंदोलन है भारत का नहीं. सही है. आंदोलन के पीछे जो ताकत काम कर रही है, वह मल्टीनेशनल में काम करने वालों और मल्टीनेशनल के लिए मजदूर पैदा करने वाले संस्थानों से जुड़ी है. मगर यह भी तो सोचिये कि यह सवाल उस व्यवस्था और उस विकल्प पर भी है जो हमारे हुक्मरानों ने देश की परंपरा और गांवों की सोच को खारिज करके चुना है. अगर सरकार का खुद का बनाया हिंदुस्तान, मनमोहन सिंह द्वारा रचा गया इंडिया ही उससे परेशान है तो यह सुखद अहसास है. हर हालत में व्यवस्था ही खारिज हो रही है, लोग नहीं.
यह आंदोलन क्या चाहता है? शायद इसका सही जवाब किसी के पास नहीं. उनके पास भी नहीं जो दो दिनों से इंडिया गेट के पास डटे हैं. क्या वे बलात्कारियों के लिए फांसी की सजा मुकर्रर होने पर संतुष्ट हो जायेंगे? यह सवाल ठीक वैसा ही है जैसा अन्ना और अरविंद के पीछे जुटी भीड़ का सवाल था कि वे क्या जन लोकपाल लेकर संतुष्ट हो जाने वाले थे? नहीं, यह इतनी छोटी बात नहीं है. लोग नाराज हैं, नाखुश हैं और बदलाव चाहते हैं. लोग पूरी शासन प्रक्रिया में बदलाव चाहते हैं, प्रक्रिया से अधिक सोच में बदलाव चाहते हैं. निरंकुशता को खत्म करना चाहते हैं. लूटतंत्र से मुक्ति चाहते हैं. लोग एक साथ सबकुछ चाहते हैं.
लोगों को लग सकता है कि यह नारीवादी आंदोलन का स्वरूप है. कई महिला मित्र इसे इस रूप में देख रही हैं, मगर वे यह भूल जा रही हैं कि इस आंदोलन में निशाना पुरुषवादी सोच और पुरुष नहीं हैं. पुरुष तो इस आंदोलन में नारियों के साथ खड़े हैं और कंधे से कंधा मिलाकर नारे लगा रहे हैं. नुक्कड़ कर रहे हैं और पिट रहे हैं. यह आंदोलन सत्ता के खिलाफ है और सत्ता के खिलाफ चल रहे आंदोलनों की कड़ी है. लोगों में नाराजगी है क्योंकि इस मसले पर भी सरकार अपेक्षित संवेदना का प्रदर्शन नहीं कर पा रही है. क्यों नहीं कर रही यह अपने आप में सौ टके का सवाल है. सरकार ने शुरू से ही संवेदनहीनता का प्रदर्शन किया जिससे आंदोलन को आग मिली. अब कोई फैसला करने के बदले पुलिस को वाटर कैनन और टियर गैस के साथ भेज दिया ताकि आंदोलन और भड़के. कोई ऐसा है जो चाह रहा है कि आंदोलन और भड़के. खैर, यह तो अंदर की बात है.
मगर सरकार ऐसे आंदोलनों को कितना नोटिस करती है? बहुत पहले बिहार में लालू कहते थे कि कौन मीडिया. अखबार में जो छापना है छापो, मेरा भोटर अखबार नहीं पढ़ता. यह सरकार भी वही सोचती है कि उनका वोटर आजतक और जीटीवी नहीं देखता है. अगर देखता होता तो गुजरात में उसका सूपड़ा साफ हो गया होता और हिमाचल में सरकार बनाना नामुमकिन है. यह भी सच है. सड़क पर उतरे ये आंदोलनकारी क्या वोट डालेंगे,यह लाख टके का सवाल है. यह हुजूम जब नाराज होता है तो फेसबुक में स्टेटस बदल देता है. कुछ अधिक नाराज होता है तो इंडिया गेट पर पहुंच जाता है. मगर वोट डालते वक्त सोचता है कि यार एक दिन की तो छुट्टी है. दो घंटा वोट डालने में क्यों बरबाद किया जाये. किसी पुराने दोस्त से मुलाकात कर लिया जाये. कहीं घूम आयें. और नहीं तो थोड़ा सो ही लिया जाये. महानगरों के जीवन में आज कल अच्छी नींद भी तो विलासिता ही हो गयी है.
तो फिर कौन सिखायेगा कि गुस्से को वोट में बदलना चाहिये. क्या अन्ना, अरविंद या रामदेव सिखायेंगे. या कोई और. या फिर यह गुस्सा भी फेसबुकिया उबाल बनकर रह जायेगा?

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