जागो, बढ़ो, दे दो फासी-जयंत सिन्हा


रविवार की शाम दिल्ली पुलिस ने जिन षडयंत्रकारी तरीकों से इस आंदोलन को तात्कालिक तौर पर खत्म करने की कोशिश की उसके मुताबिक आंदोलनकारियों के हुजूम में असामाजिक तत्व घुस आये थे. (हालांकि मीडिया में आयी तसवीर कुछ और ही बयां कर रही है. अगर लाठी पुलिस चला रही है तो पिटने वाले असामाजिक कैसे हो सकते हैं.) खैर जिन्हें लगता है कि यह अस्वभाविक आंदोलन दम तोड़ चुका है, उनका भ्रम आने वाले दिनों में टूटने वाला है. देश भर में फैले ऐसे ही युवाओं के हुजूम बहुत जल्द इस दमन के खिलाफ सड़कों पर उतरने वाला है. इसी मसले पर पढ़ें मित्र जयंत सिन्हा का आलेख -
दिल्ली गरम है तो क्यों न पूरे देश में प्रदर्शन का दौर शुरू किया जाए, अगर आप सरकार के भरोसे है तो कोई जरूरी नहीं कि बलात्कार के केस में सजा के नये तरीको का ईजाद करेगे मंत्री. बात सत्ता पक्ष की हो या विपक्ष की। पिछले दिनों मैने गौर किया कि किसी दल ने खुलकर बलात्कारी को सजा दिलाने की पहल नही की. आखिर क्यों ? ज्यादातर केस में मंत्री के पुत्रों और उनके सरंक्षण प्राप्त लोगों का उजागर होना देखा गया है. मित्रों अगर सरकार पर भरोसा करेगे तो छले जाओगे। जयप्रकाश बाबू को याद करो और अनवरत आन्दोलन को जारी रखो जबतक कि इसमें कोई नया अध्याय नहीं जुड़े। मसलन बलात्कारी को फांसी दिया जाना चाहिए, या उम्र कैद लेकिन सबसे जरूरी है न्यायलय प्रकिया में लेट-लतीफी को दूर करना होगा. लेट-लतीफी कैसे, किन कारणों से होती है यह जग जाहिर है.
अमूमन विरोध की शुरूआत सदैव शांतिपूर्ण आन्दोलन के रूप में जन्म लेती है परन्तु अब बहुत हुआ, आज दोपहर टीवी के लाइव प्रसारण में देखा कि आन्दोलनकारी छात्रों पर पुलिस ने डंडा घुमाना शुरू कर दिया. कुछ मेरे भाईयों ने पलटवार किया और उसी डंडे से पुलिस वालों की पिटाई कर दी. यानि इस घटना से पुलिसिया बर्बता को सामने लाने का प्रयास किया है. एक तरफ शीला दीक्षित चैनल के माध्यम से रोती है और दूसरे तरफ बच्चों पर डंडा चलवाकर सोनिया, राहुल, मनमोहन को आराम देना चाहती है. कहां है कानूनविद सलमान खुर्शीद, दिग्विजय, पाल सहित तथाकथित सरकार के बाडीर्गाड. मेरा मकसद हंगामा खड़ा करना नहीं मगर कोई पूछे की मंत्रियों के घरों में, उनके नातेदारों में क्या लड़कियां नहीं है. अगर है तो सभी को जेड सुरक्षा प्राप्त है. शिंदे साहब तुम्हारे घर अगर ऐसी वारदात हुई होती तो क्या करते?
ठीक दूसरी तरफ सवाल यह उठता है कि क्या केवल सरकारी मशीनरी ऐसे कुकृत्य को रोक पाने में सक्षम है, शायद नहीं. यह कुछ मनचलो का दिमागी फितरत नहीं वरन समूचे पुरूष प्रधान समाज की मानसिकता पर उठ रहा सवाल है. सड़क पर हुई घटना को सबने जाना परन्तु घरों के अन्दर चुप-चाप से किये जा रहे रेप. घरेलु वारदात से लड़की के तन नही उसके मन:स्थिति का भी रेप किया जाता रहा है कारण हमारी सामाजिक मर्यादा. मेरी राय में सामाजिक दोष को खत्म करना होगा. सती प्रथा की तरह इसे भी लेना होगा. यानि जिसने भी यह जघन्य अपराध किया उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाए. उसके चेहरे को मीडिया के द्वारा प्रदर्शित किया जाए, ताकि कोई दूसरा ऐसे अपराध को अंजाम देने में संकोच करे.
अब रही बात आन्दोलन की तो भाईयों अपने खून को गरम होने दो, आन्दोलन को उग्र करो ताकि दमनकारी सरकार की नीद खुले, तुम्हारे आन्दोलन से कई बहनों-बेटियों की लाज बचेगी. मुझे पता है मेरी विवशता ही मुझे उग्रता के लिए उकसा रही है. निर्मल भारत के निर्माण के लिए बलात्कारी को फांसी दिया जाए. भारत के सभी राज्यों के स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय के छात्रों से अनुरोध है शैक्षणिक कार्य का बहिष्कार करो, बिना सरकारी सम्पत्ति को हानि पहुचाएं राज्य सरकार से केन्द्र सरकार को विवश कर दो की इस छुई-मुई जैसे कानून में बदलाव करके एक सख्त कानून बनाए.
मेरे आन्दोलन का उद्देश्य अस्मिता स्वाभिमान की लाज के लिए है. जिसमें एकतरफा न्याय किया जाना होगा. सावधान रहना होगा क्योकि बीच में कोई नेता, मंत्री भरोसा का पाठ जरूर पठाएगां जिससे की आन्दोलन को कमजोर किया जा सके या बन्द कर देना पड़े. बात महज एक बलात्कार की नहीं, इस तरह कि तमाम घटनाएं एक मिडिल मैन के घरवालों के साथ आए दिन होती है. किसी नेता, मंत्री के घरवालों के साथ नही. अफसोस होता है जब हर घटना के बाद मामूली-सी खानापूर्ति के बाद आजतक कुछ नहीं हुआ ( कुछ चर्चित घटनाओं को छोड़). जागो, और इस कदर जागो की जम्मू से कन्याकुमारी तक आन्दोलन का रंग दिखे. तुम्हारे अन्दर चली रहीं आत्ममंथन खत्म हो गयी, तो यह तेरा, यह मेरा का प्रश्न छोड़ो। तुम्हारी लड़ाई सरकार और समाज दोनों से है, एक तरफ कमजोर कानून तो दूसरी तरफ दोगला समाज. सोच लेना अगले निशाने पर तुम्हारे घर की बहने होगी़ और तुम़.

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