हारे हुए पुरुष का हथियार है बलात्कार


उम्मीद है कि पल-पल बदलती गैगरेप की खबरों के शोर में आपको मुख्य आरोपी राम सिंह का बयान याद होगा. उसने बताया था कि अपंग होने के कारण वह इंफीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स का शिकार हो गया था. वह अपनी अपंगता का बदला हर किसी से लेना चाहता था. मैंने जीवन में कई रेप के मामले देखे हैं और उनमें से अधिकांश मामलों में इस घृणित कृत्य करने वाले को किसी न किसी रूप में कमजोर या इंफीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स का शिकार ही पाया है. अधिकांश रेप दमित इच्छाओं के कारण होते हैं. पुरुष खुद को प्रेम के काबिल नहीं पाता तो जबरदस्ती प्रेम और अंततः शरीर का सुख भोगना चाहता है. कई दफा वह अपने प्रिय पात्र को मिटा भी देना चाहता है, क्योंकि उससे लगता है कि वह कितनी भी कोशिश क्यों न कर ले, अपने प्रिय पात्र की आंखों में खुद के लिए वह आकांक्षा हासिल नहीं कर सकता. इसी संदर्भ में मुझे उपन्यास मैला आंचल का मशहूर किरदार बावन दास याद आता है. वह एक दफा एक कांग्रेस नेत्री के बदन के कपड़े को चिथड़ा-चिथडा कर देना चाहता था, जबकि वह उस स्त्री को माता के तौर पर देखा करता था. हालांकि तभी एक पल ऐसा गुजरा कि उसे अपनी सोच पर खुद ही घृणा का आभास हुआ, उसका इरादा बदल गया. मगर कितने लोग इरादे के इस चरम पर जाकर लौट पाते हैं, खास तौर पर जब सिर पर शराब सवार हो.
हालांकि हमेशा ऐसा ही नहीं होता है. रेप की घटनाएं दंगों में भी होती हैं, पुलिसिया या फौजी रेड के दौरान भी होती हैं. पुराने जमाने में फौजी आक्रमण के दौरान भी होती होंगी. मगर ऐसे मामलों में भी मुझे लगता है कि बलात्कार का अगुआ वही होता होगा जिसके जीवन में प्यार का अभाव होगा. जो खुद को कमजोर और हीन समझता होगा. ठेठ बोलचाल की भाषा में कहूं तो लड़कों की दो कैटोगरी होती है. अपनी जवानी के दिनों में हमने देखा था कि हम लोग उस कैटोगिरी में आते थे जिन्हें लगता था कि लड़कियों से दोस्ती हमारे किस्मत की बात नहीं है. कुछ लड़के ऐसे होते थे जो बहुत आसानी से लड़कियों से दोस्ती कर लेते थे. हम कभी सोचते और कभी उन्हें इग्नोर करने का नाटक करते. हमारे ही ग्रुप में ऐसे कई लोग थे, जिनमें लड़कियों से दोस्ती नहीं हो पाने की कुंठा गहराती चली जाती. उनकी कल्पनाएं अश्लील होने लगतीं. वे हर दोस्ती को प्रेम और हर प्रेम में सेक्स की संभावना तलाशते और गॉशिप करते. फिर धीरे-धीरे ब्लू फिल्मों की शरण में चले जाते. उनके लिए फिर दोस्ती और प्रेम का अस्तित्व मिट जाता. उनके मन में सिर्फ सेक्स बच जाता. इनमें से कुछ लोगों के साथ अगर कोई कुसंयोग बन जाता तो वे भी जबरन सेक्स कर सकते थे. हो सकता है कि जोर-जबरदस्ती नहीं कर पाते...
यह तो एक पहलू है. रेप का दूसरा सबसे बड़ा पहलू हाल के बरसों तक रहा है स्त्रियों के जरिये उनके पुरुषों को नीचा दिखाना. अपने देश के इतिहास में जौहर होता रहा है. युद्ध में पराजित पक्ष की औरतें खुदकुशी कर लेती थीं कि कहां विजेता पक्ष उन्हें दूषित न कर दे. विजेता पक्ष अपनी जीत की मुनादी के तौर पर सामूहिक बलात्कार का तांडव रचता. हमने हाल-हाल तक ऐसी घटनाएं देखी और सुनी है कि अगर किसी प्रेमी युगल ने भाग कर शादी कर ली तो प्रेमी की मां या बहन के साथ बलात्कार, उसे नंगा घुमाना आदि घटनाएं की जाती थीं. लड़की के बदले लड़की का कॉन्सेप्ट रहा है. जैसे स्त्री संपत्ति हो और उसके साथ संपर्क कर उसके स्वामी पुरुष से बदला लिया जा रहा हो. यह दौर तब चरम पर था जब स्त्रियों की अपनी कोई पहचान नहीं थी. मगर धीरे-धीरे जमाना बदला.
महिलाएं सामने आने लगीं. पुरुषों की जगह पर कब्जा करने लगीं. स्कूल, कॉलेज और दफ्तरों में न सिर्फ दिखने लगीं बल्कि पुरुषों को चुनौती देने लगीं. कक्षाओं में लड़कियां टॉप करतीं तो कहा जाता टीचर लड़कियों को अधिक नंबर दे देते हैं. दफ्तरों में भी लड़कियों के आगे बढ़ने को उसके रूप और बॉस के प्रति उसके झुकाव से देखा जाता. पराजित पुरुष अब उस स्त्री से बदला लेना चाह रहा है जिसने उसे उसकी महानता से च्युत कर दिया है. महज कुछ साल पहले तक स्त्रियां सिर्फ शहरों में मुकाबला कर रही थीं. अब गांवों में भी स्कूलों, अस्पतालों, आंगनबाड़ी केंद्रों और पंचायतों के संचालन में उनसे मौके छीन रही हैं. वह पति भी अपनी पत्नी को मिटा देना चाहता है जो बेरोजगार है और उसकी पत्नी स्कूलों में पढ़ा कर घर चलाने के लिए पैसे कमाती हैं. एक पत्रकार महिला का पति अपंग है और वह कोई कांम नहीं कर पाता. वह हर रोज अपनी पत्नी को शारिरिक तौर पर मिटाने की कोशिश करता है.
पुरुषों के लिए यह एक कठिन दौर है. उसे धीरे-धीरे अपनी सत्ता महिलाओं को सौंपनी है. सत्ता का हस्तांतरण इस तरह होना है कि प्रेम बरकरार रहे, परिवार जीवित रहे. बरसों से अदृश्य होकर दुनिया को संभाल रही औरतें अब अगुआ बनने जा रही हैं, हमें अब पार्श्व में जाना होगा. जैसे टीवी के एंकर और होते हैं और प्रोग्राम प्रोड्यूसर और. सामने दिखता एंकर ही है, प्रोड्यूसर गुमनाम रहकर सारा काम संभालता है. यह अवश्यंभावी है, बदलाव होकर रहेगा, औरतें आगे आकर सबकुछ संभालेंगी, पुरुषों को पार्श्व में रहकर उसकी मदद करनी होगी. मातृसत्तात्मक दौर भी आ सकता है. बदलाव के इस दौर में कई पुरुषों ने खुद को नयी भूमिका के लिए तैयार कर लिया है. वे अब स्त्रियों से तरीके से पेश आते हैं. उनकी बातों का सम्मान करते हैं, उनके गुस्से को जायज मानते हैं. खुद कई अधिकार उनके सामने पेश करते हैं और पार्श्व की भूमिकाएं संभालने के लिए तत्पर नजर आते हैं. चाहे वह किचेन की हो, बच्चे संभालने की हो या दफ्तर में महिला बॉस का कांम संभालने की. हमें बस में औऱतों के लिए सीट भी छोड़ना है और बस चलाने वाली औरतों को सैल्यूट भी करना है. अगर हम चूके तो मिट जायेंगे. हमसे गलतियां होंगी और हमें भरी अदालत में कहना पड़ेगा, हम कसूरवार हैं. हमें फांसी दे दो.

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tark-sangat monovyganik soch.....


pranam.