अपने ही कानून का सम्मान नहीं करती सरकार : दयामनी बारला


सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला लंबे समय तक जेल में रहने के बाद अब बाहर आ चुकी हैं. नगड़ी के मसले पर उनका संघर्ष और विस्थापन के मुद्दे पर उनके बेबाक ख्याल झारखंड के लोगों के लिए हमेशा से प्रेरणा के स्रोत रहे हैं. होटल में काम करते हुए जीवन की शुरुआत करने वाली दयामनी बारला ने पहले पत्रकारिता फिर पूरे आदिवासी समुदाय के लिए संघर्ष को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया. उन्होंने हमेशा सच की लड़ाई लड़ी, जो देखा उसे लिखा, और जो लिखा उसके लिए संघर्ष किया. आरटीआई को हथियार बनाकर उन्होंने कई मौकों पर गांव के लोगों को उनका हक दिलाया. सरकार उन्हें विद्रोहिनी मानती है, मगर दयामनी कहती हैं कि वे कतई सरकार, सत्ता या व्यवस्था के खिलाफ नहीं हैं. वे तो बस उनसे उनके ही बनाये नियमों का इमानदारी से पालन करने की अपेक्षा रखती हैं. आज जब झारखंड के किसानों की जमीन पर औद्योगिक घरानों की काली नजर है, ऐसे में दयामनी बारला गरीब और मासूम किसानों का सबसे बड़ा सहारा हैं. नगड़ी आंदोलन ने उनके संघर्ष को नयी धार दी है. आज जब साल 2013 हमारे दरवाजे पर दस्तक दे चुका है तो झारखंड के किसानों के मन में अपनी जमीन को लेकर कई तरह की आशंकाएं हैं. उन्हीं आशंकाओं और उससे निबटने के उपायों पर पंचायतनामा के लिए मैंने उनसे लंबी बातचीत की. पेश है इस बातचीत के प्रमुख अंश:
नगड़ी के आंदोलन को आप किस रूप में देखती हैं?
नगड़ी का आंदोलन दूसरे आंदोलनों से बिल्कुल अलहदा है. इसी आंदोलन में मैंने पहली बार देखा कि फौज जमीन एक्वायर करने आयी है. इससे पहले नेतरहाट के पायलट प्रोजेक्ट वाले आंदोलन में भी मैंने ऐसा नजारा नहीं देखा था. यही वह आंदोलन है जिसमें पीड़ित किसानों ने सरकार के सामने विकल्प पेश किया. 15 सौ एकड़ जमीन का टुकड़ा दिखाया जहां सरकार चाहे तो शैक्षणिक संस्थान बनवा सकती है. यही वह आंदोलन है जिसमें सरकार खुद अपने स्टैंड को ही बार-बार खारिज कर रही है. सरकार कहती है कि 1957-58 में ही उसने इस जमीन को बीएयू के विस्तार के लिये एक्वायर कर लिया है. इसके बावजूद उसी जमीन के लिएवह गांव वालों से 2012 तक रेवेन्यू वसूल कर रही है. यह कैसे हो सकता है. खुद बीएयू कह रहा है कि उसने जमीन का पैसा नहीं चुकाया है. अगर पैसा नहीं चुकाया है तो वे जमीन कैसे एक्वायर कर सकते हैं. खैर, यह सब तो विसंगतियां हैं. सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि सरकार खेती की जमीन के पीछे क्यों पड़ी है जबकि राज्य की आधी से अधिक जमीन बंजर है. कई खदान भी खुदाई हो जाने के बाद बेकार प.डे हैं. ऐसी जमीनों को विकसित कर उसका अधिग्रहण करने के बजाय सरकार किसानों की उपजाऊ जमीन पर नजर गड़ाये बैठी है. मैं पूछती हूं अगर खेती की जमीन बांट दोगे तो खाओगे क्या? अत्र का सम्मान करना सीखो, कंकड़ के लिएमत जान दो. हाल ही में पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट पढ.कर बड़ी खुशी हुई कि उसका भी मानना है कि शैक्षणिक संस्थान बंजर और जंगली इलाकों में खुलना चाहिये, न कि खेतिहर जमीन पर. मैं आइआइएम के निदेशक की भी शुक्रगुजार हूं, जिन्होंने कहा कि नगड़ी की जमीन कृषि भूमि है. हम वहां अपना संस्थान नहीं खोलना चाहते.
विस्थापन के खिलाफ संघर्ष को ही आपने अपने जीवन का लक्ष्य क्यों बनाया?
मैं विस्थापन विरोधी आंदोलनों से किसी भावनात्मक कारणों से नहीं जुड़ी. मैंने हमेशा तथ्यों और आंकड़ों को अधिक महत्व दिया. जब तथ्य और आंक.डे इस बात की गवाही देने लगे कि लोगों के साथ बड़ा अन्याय हो रहा है, तभी मैंने यह राह चुनी. कोयलकारो से लेकर नगड़ी तक के सभी आंदोलनों में मैंने यही तरीका अपनाया. हर बार मैंने सरकारी दस्तावेजों को पढ.ा, नक्शे का अध्ययन किया. जैसे कोयलकारो परियोजना में मैंने इसके डीपीआर का अध्ययन करने पर पाया कि इस परियोजना से 2.5 लाख लोग बेघर होंगे, 55 हजार एकड़ जमीन डूबेगी और इसमें 27 हजार एकड़ धान की एक नंबर जमीन होगी. नेतरहाट आंदोलन में भी इसी तरह मैंने डीपीआर देखा तो पाया कि साथियों की बात सही है, लोगों की लड़ाई जायज है. उन दिनों मैं प्रप्रभात खबर में खबरें लिख रही थीं. मैंने 1999 में एनएचपीसी के एक अवकाश प्राप्त इंजीनियर के हवाले से एक खबर लिखी, तो उसके जवाब में एनएचपीसी के डायरेक्टर ने बयान दिया कि दयामनी लोगों को बरगला रही है. इसी बात ने मेरा जीवन बदल दिया. मुझे लगा कि अगर मैं सच कह रही हूं तो इस सच के सर्मथन में कुछ आंक.डे, कुछ तथ्य भी होने चाहिये. फिर मैंने राज्य की तमाम बड़ी परियोजनाओं से विस्थापित लोगों के जीवन की पड़ताल शुरू कर दी.
इस दौरान आपने कहां-कहां के विस्थापितों से संपर्क किया?
शुरुआत मैंने एचइसी के विस्थापितों से की फिर चांडिल डैम के विस्थापितों की खोज-खबर ली. दोनों जगह मैंने देखा कि लोग बहुत बुरी हालत में जीवन जी रहे हैं. मैंने इन पर खबरें भी लिखीं जो प्रप्रभात खबर में प्रमुखता से प्रकाशित हुईं. फिर मेरी रुचि बढ.ती गयी, यूसिल, बोकारो स्टील प्लांट, तेनुघाट के विस्थापितों की खोजबीन की. सरकार ने इन लोगों को विकास के नाम पर विस्थापित किया था और इनके सर्मथन में लड़ने वालों को वह विकास विरोधी कहती है. मगर इन संस्थानों से किसका विकास हुआ यह सोचने के लिए कोई तैयार नहीं है. फिर मेरी समझ साफ हो गयी कि विस्थापन से उनका विकास कतई नहीं होना है जिनकी जमीन जा रही है. फिर मित्तल आ रहे थे तो मैं इस जंग में कूद पड़ी. आरटीआई का सहारा लिया, एमओयू की कॉपी निकाली और गांव वालों के पास पहुंच गयी. उन्हें बताया कि सरकार आपकी जमीन, आपके जंगल और आपकी नदियां कंपनी को बेच रही है. लोगों ने कहा, हम ऐसा होने नहीं देंगे. फिर मैंने दर्जनों आरटीआई डाली और तथ्यों के सहारे मुकाबला किया. फिर लोगों की जीत हुई. मैंने पूरी लड़ाई भारत सरकार के कानून के सहारे ही लड़ी, फिर भी सरकार मुझे व्यवस्था विरोधी कहती है. एक वाकया बताती हूं. कर्रा में एक डैम बन रहा था. वह बड़ा अजीब डैम था. खुद सरकार को भी नहीं पता था कि वहां डैम बन रहा है. इंजीनियर और ठेकेदार ने मिलकर डैम बनाना शुरू कर दिया. मैंने सरकार के पास आरटीआई डाला तो पता चला कि अभी डीपीआर भी नहीं बना है. डीसी ने मुझे बुलवा कर पूछा कि कहां डैम बन रहा है? कौन बनवा रहा है? किसकी योजना है? मैंने अधिकारियों के बयान को कोट करते हुए पंफ्लेट छपवाया और गांव में बांटा.
आप कहती हैं कि खदानों में इस्तेमाल की गयी भूमि बेकार पड़ी है, इसका क्या किया जा सकता है?
सबसे पहले तो इन बेकार खदानों को फिर से उपयोगी बनाना खनन कंपनियों का काम है. उनका दायित्व है कि वे जमीन समतल करके लोगों को लौटाएं. मगर ऐसा वे करते नहीं और माफियाओं का उस जमीन पर कब्जा हो जाता है. अगर सरकार चाहे तो इस जमीन को उपयोगी बनाकर विकास कार्य के लिए इसका आराम से इस्तेमाल कर सकती है.
इस साल आप आजाद है. अब आपको कैसा लग रहा है कि नया साल क्या राज्य के किसानों के लिए नयी उम्मीद लेकर आयेगा या फिर 2013 भी 2012 की तरह ही किसानों के लिए दुखदायी साबित होगा?
यह बात तो इस आंदोलन से साबित हो गयी है कि सरकार ने किसानों के खिलाफ मामले दर्ज किये हैं और मानवाधिकार की बात करने वालों को जेल में डाल रही है. अब यह साफ है कि वह कारपोरेट घरानों के लिए काम कर रही है. ऐसे में किसानों को सरकार से कोई उम्मीद रखनी ही नहीं चाहिये.
पंचायतों से कोई उम्मीद?
मेरे हिसाब से पंचायतें तो दमन का विकेंद्रीकरण हैं. पहले सरकारी भ्रष्टाचार और दमन की पहुंच बीडीओ तक ही थी, अब यह फैलते-फैलते वार्ड सदस्यों तक पहुंच गयीं. वार्ड सदस्य खुद को लोगों का हिस्सा कम सरकार का हिस्सा अधिक समझते हैं. चुने जानेके छह माह के भीतर कई मुखियो ने बोलेरो खरीद लिया. बताइये कहां से बरसा यह पैसा.
और ग्राम सभा से..
ग्राम सभा होती कहां है? होती भी है तो जनता के हितों की सुरक्षा या उसके उत्थान के लिए नहीं होती है.
तो फिर उपाय क्या है?
उपाय आम जनता है. निम्न और मध्यम वर्गीय जनता. मैंने अपने जेल प्रवास के दौरान महसूस किया कि यही वह जनता है जो न्याय के पक्ष में है. लोग न्याय के लिए छटपटा रहे हैं. यह लोग मिलकर झारखंड को बचायेंगे. वे झारखंड को बचायेंगे ताकि उन्हें शुद्ध हवा, शुद्ध पानी, शुद्ध भोजन और बेहतर स्वास्थ्य हासिल हो सके. जेल प्रवास के दौरान मैंने महसूस किया कि यह वर्ग सही मायने में भ्रष्टाचार और अन्याय से मुक्ति चाहता है. खुद पुलिस और अदालत में बैठे निचले दज्रे के कर्मचारियों ने मेरी मदद की और मुझे वह सम्मान दिया जिसके बारे में मैं सोच भी नहीं सकती थी. ब.डे अधिकारी मेरे काम को अटकाते थे, किसी न किसी बहाने से विलंब करते कि मेरी रिहाई न हो सके. मगर छोटे कर्मचारी हर कदम पर मेरी मदद करते कि दयामनी दीदी की रिहाई जल्द हो जाये. वे कहते कि दीदी आप जल्दी रिहा हो जाइये, यह जगह आपके लिए नहीं है. इसी वजह से मुझे इन लोगों से काफी उम्मीदें हैं.
दयामनी बारला की प्रकाशित पुस्तकें
१. विस्थापन का दर्द- झारखंड राज्य में विकास के नाम पर विस्थापित लोगों के कष्टों का वर्णन.
२. एक इंच जमीन नहीं देंगे-मित्तल के खिलाफ आंदोलन के अनुभव.
३. दो दुनिया- अमेरिकी यात्रा के दौरान वहां के अनुभवों पर आधारित.
४. स्वीट प्वाइजन- कंपनियों द्वारा कराये जा रहे समाज सेवा अभियानों की हकीकत.

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