Sunday, January 13, 2013

झारखण्ड में एक लेडिज ओनली मेला


कभी ऐसा सुना है कि कोई मेला सिर्फ औरतों का होता है. मेले में मरद लोग नहीं घुस सकते. यहां तक कि दुकान भी औरतें ही लगाती हैं. सरायकेला जिले के मिरगी गांव में लगने वाले मिरगी-चिंगड़ा मेले का स्वरूप महज कुछ साल पहले तक ऐसा ही था. मिरगी गांव झारखंड-ओड़िशा की सीमा पर बसा है. इस गांव में हर साल मकर संक्रांति के बाद पड़ने वाले शुक्रवार और शनिवार को मिरगी चिंगड़ा मेला लगता है. शुक्रवार के दिन लगने वाला मेला तो आम मेले होता है, मगर इसके अगले दिन शनिवार को महिलाओं का मेला लगता है. हाल के कुछ सालों में हालात बदले हैं, अब कई पुरुष भी मेले में आने लगे हैं. इसके बावजूद इसकी पहचान महिलाओं के मेले के तौर पर ही है और इस मेले का इंतजार महिलाएं पूरे साल करती हैं.
अपने समाज का कायदा कानून ऐसा है कि औरतें अक्सर एक-दूसरे से नहीं मिल पातीं. ऐसे में पूरे कस्बे की औरतों के लिए यह एक बेहतरीन सोशल गेदरिंग साबित होता है. यहां उन्हें दूसरे परिवारों और समाजों की औरतों के बारे में एक से एक सूचनाएं मिलती हैं. उन्हंे यह भी पता चलता है कि किसकी बेटी का ब्याह किस गांव में हुआ और किसके घर किस गांव की बहू आई. और यह भी कि बहू अच्छी है या नहीं. ऐसी छोटी-मोटी बातें तो वहां होना लाजिमी है मगर कई बार औरतें इस मेले से अपने लिये बहू तक ढूंढ लाती हैं.
इस मेले के बारे में कई पौराणिक मान्यताएं प्रचलित हैं. अधिवक्ता और स्थानीय इतिहास में रुचि रखने वाले विश्वनाथ रथ बताते हैं कि खरकई नदी के तट पर बसे मिरगी गांव की भौगोलिक स्थिति बड़ी रोचक है. दक्षिण से उत्तर की ओर बहने वाली यह नदी इस जगह पश्चिम से पूरब की ओर घूम जाती है. ऐसी जनश्रुति है कि पहले भगवान जगन्नाथ का मंदिर यहीं बनने वाला था. इसके लिए देवताओं ने एक बार रात के वक्त इसी जगह पर बैठक की. मगर यहां मंदिर बनाया जाय या नहीं इस मुद्दे पर देवताओं के बीच अलग-अलग राय थीं. ऐसे में पूरी रात चर्चा चलने के बावजूद कोई फैसला नहीं हो पाया और सुबह हो गयी. सवेरा होते ही बैठक में भगदड़ मच गई, दरअसल देवताओं को सुबह होने से पहले ही मृत्युलोक छोड़ देना था ताकि इनसान उन्हें देख न पाएं. ऐसे में हड़बड़ी में देवताओं के कई चित्र वहीं छूट गए. आज भी वहां नदी के तट पर पत्थरों पर कई चित्र ऐसे बने हैं जैसे देवताओं के शस्त्र या अन्य चीजें हों. वैसे भूवैज्ञानिकों का कहना है कि ये नदी की धारा के कारण बने निशान हैं. बहरहाल असलियत जो भी हो, इन्हीं चित्रों के कारण यह स्थल लंबे समय से लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है और हर साल यहां मेला लगता है.
एक अन्य जानकार अवकाश प्राप्त शिक्षक नलिन कांत सत्पथी दूसरी ही कहानी बताते हैं. उनकी कहानी के पात्र पांडव और कुंती हैं. वनवास के दौरान विराट नगर जाते वक्त कुंती और पांडव तीन-चार दिनों के लिए मिरगी गांव में खरकई नदी के तट पर ठहरे थे और वहां मौजूद चित्र उन्हीं पांडवों और कुंती के बताए जाते हैं. दरअसल वहां पहले दिन लगने वाला मेला पांडवों के स्वागत में आयोजित होता है जबकि दूसरे दिन जब पांडव दिन के वक्त अपनी मां को अकेला छोड़ कर कहीं चले गए थे, बहुत संभव है भिक्षाटन के लिए. उस इलाके की औरतें माता कुंती का साथ देने और उनसे मुलाकात करने वहां गई थीं जिस कारण मेले के दूसरे दिन महिलाओं का मेला लगने लगा.
वैसे मेले के इतिहास के बारे में सबसे प्रमाणिक जानकारी सरायकेला रियासत के एक ¨प्रस ब्रजभानु सिंहदेव की लगती है. वे बताते हैं, यह मिरगी चिंगड़ा मेला किसी जाति या समुदाय विशेष का मेला नहीं है और न ही इसका कोई धार्मिक आधार. सही अर्थों में फसलों की कटाई के बाद मौज-मस्ती और सामाजिक जुड़ाव को केंद्र में रखते हुए इस मेले की शुरुआत हुई होगी. करीब साढ़े-तीन सौ साल पहले इस मेले की शुरुआत सरायकेला इस्टेट की रानियों और कस्बे की अन्य औरतों ने की है. कला और संस्कृति से जुड़ाव रखने वाला उनका खानदान हमेशा से स्त्रियों के प्रति संवेदनशील नजरिया अपनाता रहा है और हमेशा उनकी भावनाओं को तरजीह देने की कोशिश की जाती रही है. चूंकि खरकई नदी के तट पर बसा मिरगी गांव इस इलाके का सबसे रमणीय स्थल है, इसलिए फसलों की कटाई के बाद लगने वाले मेले के लिए उसी जगह को चुना गया. पहले तो वहां सामान्य मेले लगते रहे होंगे, मगर आने वाले दिनों में स्त्रियों ने अपने लिए एक स्वतंत्र मेले की जरूरत महसूस की जहां वे पुरुषों के प्रभाव से मुक्त होकर पूरा दिन हंसते-खेलते गुजार सके. संभवत: इसी तरह इस अनोखे मेले की शुरुआत हुई. सिंहदेव बताते हैं कि पहले मेला स्थल को हमारे सिपाही चारो ओर से घेरे रहते थे ताकि कोई अवांछित तत्व वहां प्रवेश न कर पाएं. मेले के अंदर सातवीं कक्षा तक के बच्चे वालेंटीयर के रूप में मौजूद रहते थे जो मेले में महिलाओं को विभिन्न कार्यों में सहयोग किया करते थे. सिंहदेव ने बताया कि दस साल की उम्र तक वे भी इस मेले में शामिल होते रहे हैं, बाद में उनके पिता ने उन्हें मना कर दिया. (पंचायतनामा में प्रकाशित)

1 comment:

Soumitra Roy said...

रोचक, सूचनाप्रद आलेख है। अच्‍छा लिखा है।