बंदरों के झुण्ड में फंसा झारखण्ड


झारखंड एक बार फिर से राष्ट्रपति शासन के मुहाने पर है. 12 साल के दौरान यह तीसरा मौका होगा, जब राज्य पर गैर निर्वाचित सरकार का शासन होगा. राजनीतिक अस्थितरता का आलम यह है कि 12 साल में 8 सरकारों का पतन हो चुका है. झारखंड के इन्ही हालात पर 6 जून 2010 को मैंने एक आलेख लिखा था, जो विस्फोट.कॉम पर प्रकाशित हुआ था. वह आलेख मुझे आज भी मौजू लगता है. एक बार फिर से आपके सामने पेश कर रहा हूं...
कुछ साल पहले एक जोरदार पत्रिका शुरू हुई थी, उसमें एक लेख छपा था बंदर के हाथ में बिहार. बिहार की स्थितियों को लेकर इससे बेहतर आलेख आज तक नहीं लिखा गया. आज जब झारखंड की हालत पर नजर डालते हैं तो लगता है कि आज झारखण्ड के बारे में अगर लिखा जाए तो इससे बेहतर कोई दूसरा शीर्षक नहीं हो सकता. बिहार एक बंदर के हाथ में फंसा था तो झारखण्ड कई सारे बंदरों के हाथ में फंस गया है.
दिल्ली में रहनेवाले मेरे डाक्टर भाई पूछ रहे हैं कि भाई झारखंड में इतनी अनस्टेबिलिटी क्यों है! आखिर कभी वहां स्थायी सरकार बनेगी भी या नहीं! यह सवाल सिर्फ दिल्ली में रहने वाले मेरे भाई मुझसे नहीं पूछ रहे, बल्कि झारखंड में रहने वाला या झारखंड की स्थितियों से सहानुभूति रखने वाला हर शख्स एक दूसरे से पूछ रहा है. सरकारें छह माह पूरा नहीं करती हैं कि गिर जाती हैं. चुनी हुई सरकार की विफलता से हताश होकर राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाता है और जब राष्ट्रपति शासन के दौर में भ्रष्टाचार और अराजकता सभी सीमाएं तोडने लगती हैं तो हारकर चुनाव करवा लिए जाते हैं. मगर हर चुनाव का नतीजा वही ढाक के तीन पात खंडित राजनेता, खंडित मुद्दे लिहाजा जनादेश भी खंडित ही नसीब होता है.
आखिर इतनी बदनसीबियों की वजह क्या है! भैया ने जब मुझसे पूछा कि आखिर एक ऐसा राज्य जो संसाधनों से इतना भरा-पूरा है, बिहार से अलग होने पर हर कोई यही सोचता था कि यह राज्य विकास की मंजिलें इतनी तेजी से तय करेगा कि पूरा देश देखता रह जाएगा. मगर ऐसा क्यों हुआ कि यह विकास की रफ्तार में बिहार से भी पिछड गया जिसके पास संसाधन के नाम पर बाढ, सस्ते मजदूर और मेधावी बेरोजगार युवकों के अलावा कुछ नहीं है! हर कोई जानता है कि वजह सिर्फ अस्थिरता है, मगर इस अस्थिरता की वजह क्या है!
इस सवाल के जवाब में अनायास मेरे मुंह से निकल गया कि भैया आपने कभी फल से लदे किसी अमरुद के पेड को स्थिर देखा है! वह स्थिर हो ही नहीं सकता. हमेशा आस-पास के शरारती बच्चे पेड पर लुधके रहते हैं. कुछ लोग पत्थरों से चांदमारी करते हैं तो कुछ लग्गी बनाकर आइजमाइश करते हैं और जो बच्चा सबसे जबरदस्त होता है वह मालिकों की परवाह किए बगैर सीधे पेड पर ही चढ जाता है. ऐसे में वह पेड सुबह से शाम तक हिलता-डोलता, हिंचकोले खाता रहता है. उस पेड को स्थिर रख पाना तब तक मुमकिन नहीं जब तक उसपर फलों की बहुतायत है या उसे कोई दबंग रखवाला नहीं मिल जाता है.
बाद में जब मैंने अपने इस जवाब पर गौर किया तो लगा कि सचमुच मेरे मुंह से अनायास निकला यह जवाब झारखंड के मसले में काफी हद तक सही साबित होता है. दरअसल झारखंड की अस्थिरता और बदहाली के लिए नेताओं की जिम्मेदारी सिर्फ इतनी है कि वे इतने मजबूत और दबंग नहीं हैं कि इस राज्य के अकूत खनिज संसाधनों पर नजर गडाए लालची नजरों और उनकी मदद को तैयार राजनीतिक आकाओं से मुकाबला कर सकें. बाकी तमाम जिम्मेदारी उन कारपोरेटों और माफियाओं की है जो इस राज्य के संसाधन की लूट के लिए घुस आए हैं. उनमें से कइयों के सिर पर केंद्र सरकार के अधिपतियों का हाथ है तो कई माओवादियों की सरपरस्ती में लूट का मजा ले रहे हैं.
यह अब कोई छुपी हुई बात नहीं रही कि हमारे माननीय गृह मंत्री चिदंबरम साहब द्वारा चलाए जा रहे आपरेशन ग्रीन हंट का मुख्य उद्देश्य बड़े उद्योगपतियों को देश के खनिज संपन्न क्षेत्रों में बेधड़क और शांतिपूर्ण खनन की सुविधा उपलब्ध कराना ही है. इसलिए कई बार व्यंग्य स्वरुप आपरेशन ग्रीन हंट को ऑपरेशन मिनरल हंट कह कर भी पुकारा जाता है. मगर जो बाद अब तक सर्वविदित नहीं है वह यह है कि माओवादियों के प्रभुत्व वाले खनिज संपन्न इलाकों में भी जमकर अवैध उत्खनन हो रहा है. इस अवैध उत्खनन की पूरी प्रक्रिया खनन माफियाओं द्वारा संचालित की जा रही है. इस खनन प्रक्रिया को माओवादियों की ओर से पूरा संरक्षण मिला हुआ है. अगर इस तथ्य में सच्चाई नहीं है तो आखिर माओवादियों के निशाने पर कोई खनन माफिया क्यों नहीं होता. वे हमेशा बेगुनाह पुलिस वालों पर ही जोर आजमाइश क्यों करते हैं. क्योंकि ये खनन माफिया माओवादियों को नियमित तौर पर लेवी की मोटी रकम अदा करते हैं. लेवी के पैसों का माओवादी क्या करते हैं यह वे जाने मगर अवैध रुप से उत्खनित खनिज पदार्थो का खनन माफिया क्या करते हैं, यह अब तक सवालों के घेरे में है.
कोयला तो कई बार घरेलू बाजारों में खप जाता है, मगर लौह अयस्क! जानकारों का मानना है कि यह लौह अयस्क बडे पैमान पर तस्करी होता है और चीन तस्करी द्वारा भेजे गए इस लौह अयस्क का बडा बाजार है. बीजिंग ओलंपिक से पहले चीन में लौह अयस्क की बडे पैमाने पर मांग बनी थी, जानकार बताते हैं कि उस दौरान बडे पैमाने पर भारत से लौह अयस्क तस्करी के जरिये नेपाल के रास्ते चीन भेजा गया था. आप गौर करेंगे कि उन दिनों बार-बार रेड कारिडोर का जिक्र होता था. जो नेपाल से बिहार, बंगाल, झारखंड, उडीसा, छत्तीसगढ होते हुए आंध्रप्रदेश तक जाकर खत्म होता था. यह रेड कारिडोर आज भी बना है और इस पूरे कारिडोर पर माओवादियों का एकछत्र राज है.
माननीया अरुंधति राय तवज्ज्जो देंगी, माओवादियों के खिलाफ सरकार की जंग न तो गरीबों के खिलाफ जंग है और न ही सरकार की देश में अमन चैन बहाल करने की सदाशयता. यह तो खनिज पट्टी से माओवादियों को बेदखल कर टाटा, मित्तल और जिंदल जैसे कारोबारियों को स्थापित करने की मुहिम है. चिदंबरम आखिरकार मूलत वित्त मंत्री ही हैं और वे कारोबार की भाषा और कारोबारियों का संकट बेहतर समझते हैं. मंत्री की कुर्सी पांच दस या पंद्रह साल तक ही नसीब होती है और इंतजाम आने वाली दस पीढियों, रिश्तेदारों, चमचों, पार्टी कार्यकर्ताओं और पार्टी के फंड तक के लिए करना पडता है. झारखंड में अब राष्ट्रपति के नाम पर चिदंबरम का राज कायम हो चुका है, मगर इसके रेड कारिडोर पर आज भी माओवादी काबिज हैं. झारखंड में स्थायित्व और विकास का सपना देखने वाले दोस्तों अभी तो लडाई शुरू होने वाली है. अभी तो अमरुद के पेड पर बंदरों का कब्जा है और पेड ताजे पके अमरूदों से लदा है.

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