Monday, February 04, 2013

नये हिंदुस्तान में आपकी तसवीर कहां है?


मौका महात्मा गांधी की पुण्यतिथि का था और पंचायतनामा के दफ्तर में प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक एवं प्रतिष्ठित पत्रिका गांधी मार्ग के संपादक राजीव वोरा संयोगवश उपस्थित थे. वोराजी इन दिनों बिहार में माओवाद प्रभवित इलाकों में अहिंसा के सहारे शांति स्थापित करने के अभियान में जुटे हैं. उन्होंने पंचायतनामा की पूरी टीम और प्रभात खबर के वरिष्ठ संपादकीय सहयोगियों के साथ देश में इन दिनों फैली हिंसा, उसके निवारण के उपाय, देश के मौजूदा हालत के मूल कारण और पंचायती राज व्यवस्था को जनोपयोगी बनाने के मसले पर लंबी बातचीत की.
हिंसा की महिमा बढ़ना है खतरनाक
सबसे पहले उन्होंने अपने मौजूदा अभियान के बारे में बताते हुए कहा कि देश में हिंसक घटनाओं का बढ़ना उतना खतरनाक नहीं है, जितना हिंसा की महिमा का बढ़ना है. हालांकि इस माहौल में लोग त्रस्त भी नजर आ रहे हैं. दरअसल जो हिंसा अन्याय के खिलाफ, अपना गौरव और स्वाभिमान बचाने के लिए गांव में रहने वाले भोले-भाले समुदायों द्वारा की जा रही है उसके बारे में पूरे देश को सोचने की जरूरत है. क्योंकि अगर शरीर का कोई एक हिस्सा कष्ट में है तो दूसरे हिस्से का मौन रह जाना भी एक तरह का अपराध ही है.
लोगों से जुड़ने की है जरूरत
हिंसा की निंदा और अहिंसा का गुणगान करना बड़ा आसान है, मगर आज जरूरत कहीं इससे बड़ी है. हमें यह देखने की जरूरत है कि लोग क्यों परेशान होकर हथियार उठा ले रहे हैं. उनसे बातें करने और उनसे व्यक्तिगत रिश्ता बनाने की जरूरत है. हमने वही काम बिहार के माओवाद प्रभावित इलाकों में करने की कोशिश की है. हम मुजफ्फरपुर, जमुई और बांका के सुदूरवर्ती गांवों में जाकर लोगों से मिल रहे हैं. उनसे बातें कर रहे हैं. उनकी परेशानी समझने और उन्हें यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि वे खुद को अकेला समझने की कोशिश न करें. हम लोग उनके साथ हैं. उन्होंने कहा कि मैं अक्सर लोगों से यह सवाल करता हूं कि इस नये हिंदुस्तान में आपको अपनी तसवीर कहीं नजर आती है क्या? आज तक मुङो कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो यह बताये कि मुङो इस नये हिंदुस्तान में अपनी तसवीर नजर आती है.
ऐसा क्यों?
इस सवाल के जवाब में राजीव वोरा ने कहा कि हिंदुस्तान का आम व्यक्ति आज भी आत्मा केंद्रित है. मुक्ति और मोक्ष आज भी अधिकांश लोगों के मन की मूल भावना है. मगर आज जो कुछ घट रहा है उसने एक आम इंसान के मन में संघर्ष पैदा कर दिया है. वह भौतिक जगत और आत्मिक भाव के संघर्ष में पिस रहा है. मगर जिस इंसान के मन का यह संघर्ष समाप्त हो गया है, या जिसने इसे नोटिस करना बंद कर दिया है, वह शोषक में तब्दील हो गया है. लोग इसलिए भी परेशान हैं कि उनके लिए यह माहौल बड़ा अपरिचित सा है.
आजादी के बाद आये इस बदलाव के कारण क्या हैं?
उन्होंने कहा कि गांधी के समय देश स्व से उपर उठ चुका था. गांधी ने आजादी के बदले देश को स्वराज शब्द दिया. स्वराज का अर्थ सिर्फ आजादी नहीं पूरे सोच में बदलाव से था. उसका अर्थ सत्ता में अंग्रेजों के बदले भारतीयों के आ जाने से नहीं था. इस शब्द से देश को नया उद्देश्य मिला. यह शब्द राष्ट्रीय अस्मिता का रूप ले चुका था. मगर ठीक उसी वक्त जब देश आजाद होने वाला था, उसी वक्त हमारे नये हुक्मरानों ने यह धारा ही मोड़ दी. उन्होंने आजादी के दौरान हुई घटनाओं का जिक्र करते हुए बताया कि किस तरह देश के भविष्य की रूपरेख को लेकर महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू में लगातार मतभेद गहरे होते चले गये थे. कैसे नेहरू ने हिंद स्वराज की अवधारणाओं को खारिज कर दिया था.
गांधी को समझ नहीं पाये हुक्मरान
वोराजी ने बताया कि गांधी जी ने दुनिया के सामने पहली दफा ऐसा राजनीतिक विकल्प पेश किया था, जिसमें आजादी और न्याय एक दूसरे के लिए पूरक साबित हो रहे थे. इससे पहले की व्यवस्थाएं जैसे पूंजीवाद जहां व्यक्तिगत आजादी की तो बात करते हैं मगर न्याय के मसले पर उनका दावा फेल हो जाता है. वहीं साम्यवादी व्यवस्था न्याय की लड़ाई लड़ते हैं मगर व्यक्तिगत आजादी को लेकर उनकी व्यवस्था असफल साबित हो जाती है. दुनिया में साम्यवाद के पतन के पीछे भी यही वजह रही है और आज पूंजीवाद का पतन होगा तो इन्हीं कारणों से. मगर अपने ही देश में लोग गांधी को समझ नहीं पाये.
लोगों में सिर्फ युद्ध के वक्त राष्ट्रभक्ति क्यों जागती है?
हमें समझना पड़ेगा कि राष्ट्रवाद और राष्ट्रभक्ति अलग-अलग चीज है. सेवा की भावना ही असली राष्ट्रभक्ति है. जबकि सैनिक के सिर काटने की घटना पर हमारी उग्र प्रतिक्रिया कतई राष्ट्रभक्ति नहीं है. चैनलों ने इस घटना पर तो एक तरह से स्टूडियो में युद्ध का माहौल पैदा कर दिया था. दरअसल हमारा जीवन इतना अस्थिर हो गया है कि हमें किसी बात के बारे में गंभीरता से सोचने की फुरसत नहीं है. हम हमेशा इस सदमे में रहते हैं कि कब तेल की कीमतें बढ़ जायेंगी और हमारी परिस्थितियां बेकाबू हो जायेंगी.
पंचायती राज बनाम ग्राम स्वराज
पंचायती राज एक व्यवस्था है, एक उपकरण है जो गांव को मिला है. अब इस उपकरण के सहारे हमें गांव को बदलना है. अधिकार संपन्न बनाना है. लोगों में इस भावना को आकार देना है कि यह आपका गांव है और इसे आप ही बेहतर बना सकते हैं. जब यह भावना विकसित होगी तभी ग्राम स्वराज को हासिल किया जा सकेगा. इसके लिए हमें लोगों में सकारात्मक सोच विकसित करने की जरूरत है. और मुङो लगता है कि आप लोग, पंचायतनामा के जरिये यह काम कर रहे हैं.
गांधीवादियों और समाजवादियों के पतन और परिवर्तन
साम्यवाद की समाप्ति के बाद शायद हम सबने वैश्वीकरण के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. हमें लगने लगा कि अब कोई रास्ता ही नहीं है. जिस दिन महात्मा गांधी की हत्या हुई, उसके ठीक छह हफ्ते बाद सेवाग्राम में एक बैठक होने वाली थी जिसमें सरकार और स्वतंत्रता सेनानी मिलकर देश की दिशा तय करने से संबंधित नीति तय करने को लेकर बैठक होने वाली थी. गांधी जी तो उस बैठक में नहीं शामिल हो पाये. मगर बैठक हुई. उस बैठक की रिपोर्ट को पढ़कर बड़ी निराशा होती है. (पंचायतनामा में प्रकाशित)

1 comment:

Ankur Jain said...

वोराजी के साक्षात्कार को पढ़वाने के लिए शुक्रिया।