खैराती अम्मा का सामाजिक अर्थशास्त्र


चिदंबरम साहब ने यूपीए-2 का आखिरी बजट पेश कर दिया है. तमाम कयासों के बावजूद यह बजट भी खैराती अम्मा का पिटारा ही है. यूपीए-1 की एंट्री से यूपीए-2 की एक्जिट तक खैराती अम्मा का पिटारा ही कांग्रेस की यूएसपी रही है. आम आदमी का हाथ, कांग्रेस के साथ के नारे से एनडीए के फीलगुड फैक्टर को मात देने के बाद जैसे इस फार्मूले पर कांग्रेस अंधविश्वास करने लगी है. पार्टी की सरकार में दुबारा वापसी भी इसी फार्मूले के कारण हुई, मनरेगा ही सरकार के लिए ट्रंप कार्ड साबित हुआ, सो इस पार्टी के लिए ऐसा सोचना कोई गलत नहीं. यूपीए ने सीजन-3 में वापसी के लिए भी ऐसे ही दो ट्रंप कार्ड सोच रखे हैं, पहला कैश सब्सिडी यानी सब्सिडी का पैसा सीधे खाते में और दूसरा फूड सिक्योरिटी एक्ट यानी खाना मिलेगा, पीना मिलेगा... खैराती अम्मा के पिटारे में सब कुछ मिलेगा. खैर हर राजनीतिक दल को राजनीतिक फार्मूला अपनाने की पूरी छूट होती है और हर सरकार को जाते-जाते जनता के लिए चुग्गा फेकने की भी पूरी आजादी मिलती है... हालांकि हर फार्मूला दो बार इस्तेमाल होने के बाद आउटडेटेड हो जाता है, ठीक उसी तरह जैसे कोई आज के टाइम में मर्द और कुली जैसी फिल्में बनाये और उसके हिट हो जाने की उम्मीद पाल बैठे. वैसे मेरा इरादा यहां इस फार्मूले के हिट या फ्लाप होने पर अपनी राय व्यक्त करना नहीं था बल्कि इस खैराती अर्थशास्त्र पर चंद फिकरे कसना चाह रहा था जिस पर हमारे देश के छोटे-बड़े तमाम सामाजिक विचारक वारे-वारे जाते हैं. किसानों की कर्जमाफी, मनरेगा और दोपहर की खिचड़ी से लेकर चुनाव से ऐन पहले अवतरित होने वाले खाद्य सब्सिडी योजना तक के लिए....
यह हमारा सौभाग्य है कि हम महात्मा गांधी के देश में पैदा हुए हैं मगर हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि अक्सर हम इस सौभाग्य वाली बात को भूल जाते हैं. ऐसा अगर न होता तो हमने नरेगा के आगे महात्मा गांधी का नाम शायद ही जुड़ने दिया होता. हालांकि मनरेगा न तो रोजगार की गारंटी साबित हो पायी और न ही बिना रोजगार के सौ दिन का मेहनताना पाने की गारंटी. हर राज्य में मनरेगा की उपलब्धियों को सामने लाने के लिए एक पीआरओ की नियुक्ति की गयी है, मगर ये तमाम पीआरओ मिलकर आज तक एक भी ऐसा केस खोजकर सामने नहीं ला पाये, जिसे साल सौ दिनों का रोजगार मिला हो और उसे समय पर मेहनताना मिल गया हो, या फिर न भी मिला हो पर इस योजना के संचालकों ने उसे सौ दिन की मजदूरी समय पर दे दी हो. अगर एक भी ऐसा केस होता तो देश के सभी अखबारों में यह सक्सेस स्टोरी की तरह चमक न रहा होता. मगर मेरा ऐतराज इसकी सफलता-असफलता से नहीं है, बल्कि इसके सिद्धांत से है. यह कानून रोजगार की गारंटी नहीं देता है बल्कि रोजगार मिले न मिले मेहनताने की गारंटी जरूर देता है. यानी सरकारी खैरात की गारंटी... महात्मा गांधी ने कभी देश के गरीबों के लिए सरकारी खैरात का सपना नहीं देखा था. मगर इक्कीसवीं सदी में गांधी के ब्रांड नेम से राज करने वाले नासमझ लोगों की समाजसेवा का मंत्र खैरात से ही शुरू होता है.
इस खैराती अर्थशास्त्र की शुरुआत सरकार ने किसानों के कर्जमाफी से की थी और अंत खाद्य सुरक्षा कानून से करने जा रही है. ताज्जुब तो इस बात पर होती है कि इस खैराती अर्थशास्त्र का सिद्धांत पेश करने और इसके लिए नित नये कानून बनाने का जिम्मा जिस किचेन कैबिनेट के पास है उसमें ऐसे-ऐसे लोग हैं जो ऊंची-ऊंची नौकरियां छोड़ कर न्यूनतम मजदूरी पर जीवन जीते हुए लोगों की मदद करने के लिए गांवों की खाक छानते थे. मगर इन लोगों ने इस सरकार को गरीबी मिटाने के लिए जितने फार्मूले दिये सबके सब खैरात बांटने वाले ही थे. एक भी ऐसा नहीं था जिसमें गरीब आदमी के सामने मेहनत मजदूरी करके आगे बढ़ने का फार्मूला हो. महात्मा गांधी ने गांव के गरीबों के लिए यह सपना नहीं देखा था. अधिकांश योजनाकार यही सोचते हैं कि इस देश में गरीबी इसलिए है कि लोगों के पास पैसा नहीं है, उन्हें पैसे दे दो गरीबी दूर हो जायेगी. मगर हकीकत तो यह है कि गरीब आदमी खैरात बांटने वाले को हमेशा बेवकूफ समझता है और यही मानता है कि उसने सामने वाले के पैसे ठग लिये. खैरात को वह बिल्ली के भाग से फूटे छीके की तरह देखता है. उसे अपनी गरीबी मिटाने के लिए खैरात या पैसों की जरूरत नहीं है, उसे अगर कुछ चाहिये तो बस समानता और समान अवसर. वह अपनी गलीज जिंदगी में इसलिए फंसा है क्योंकि उसके आसपास के बड़े लोग उसे गलीज हालत से निकलने नहीं देते. वह मेहनत मजूरी करके पैसा कमाता है, मगर मेहनत के ये पैसे महाजन का सूद, डॉक्टर की फीस, मरनी-हरनी, शादी-ब्याह जैसे हजारों छेदों से रिस कर बह जाते हैं.
आजादी के पैंसठ-छियासठ सालों में हुए हजारों आंदोलनों के बावजूद गांवों से पुरानी महाजनी तो खत्म हुई नहीं, दसियों नये किस्म के लुटेरे जरूर पैदा हो गये. बदला अगर कुछ तो सिर्फ इतना ही कि कल तक गांव के जमींदारों के हुक्म पर वोट डालने वाले गरीब अब एक बोतल दारू और पांच सौ की हरी पत्ती पर वोट डालते हैं. चुनाव के एक रात पहले पैसा और शराब बांटने पर चुनाव आयोग की रोक रहती है, मगर चुनाव से आठ-दस महीने पहले मनरेगा का सपना दिखाने और कैश सब्सिडी का गेमचेंजर पेश करने पर कोई रोक नहीं होती. सबसे बड़ी बात तो यह है कि गरीबों के लिए गांवों की गलियां छानने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी यह सब रास आता है.
मनरेगा से पहले क्या नहीं था, और मनरेगा के बाद क्या बदल गया. सिर्फ एक चीज... मजदूरी की दर... इसके अलावा...? राजीव गांधी के समय में भी रुपये में पांच पैसे ही लोगों तक पहुंचते थे, आज भी मनरेगा का पांच पैसा ही मजदूरों तक पहुंच पाता है. किसानों के कर्ज माफी से क्या बदला, किसान कल भी आत्महत्या करते थे, आज भी करते हैं... हां बैंक मैनेजरों और उनके दलालों के दुतल्ले मकानों में मारबल जरूर लग गया. क्या मनरेगा से पहले प्रधानमंत्री रोजगार योजना नहीं थी. इंदिरा आवास योजना में अब 70-75 हजार रुपये मिलने लगे हैं, तो क्या छप्पर के लिए टीन बेचने वाले दुकान बंद हो गये... हां, मुखियाजी ने ईंट का भट्ठा जरूर लगवा लिया.
दरअसल इसी खैराती अर्थव्यवस्था ने देश में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया. पहले ड्राइविंग लाइसेंस, जाति प्रमाण पत्र, चीनी के परमिट और गैस के कनेक्शन के लिए सौ-दो सौ रिश्वत लिये जाते थे. अब करोड़ों-अरबों की परियोजनाएं हैं और 40 फीसदी का कमीशन मंत्री जी के खाते में ही चला जाता है.
संताल परगना के एक लाभुक ने मनरेगा का कुआं तैयार करवाया और उस पर लगने वाले बोर्ड पर हिसाब लिख दिया कि किसे कितना परसेंट पीसी देना पड़ा. अंत्योदय और अन्नपूर्णा जैसी खैराती योजनाएं भी हैं और इसे खैरात की तरह ही बांटा जाता है. इसका लाभ पाने वालों में इतनी हिम्मत नहीं कि देने वाले से कह सके कि भाई साहब वजन चेक कर लें... पेंशन योजनाएं हैं और इन्हें पाने के लिए गांवों और कस्बों के बैंक में महीने के पहले हफ्ते दिन-भर मेला लगा रहता है. विधवाएं और बुजुर्ग सुबह आते हैं और शाम तक पड़े रहते हैं. क्या यह खैरात नहीं...
खैर, इस बजट में चिदंबरम साहब ने न जाने क्या सोचकर मनरेगा का बजट घटा दिया है. देर सवेर इस बात का आकलन भी होगा कि इस मनरेगा से क्या फायदा हुआ. आकलन करने वाले यह भी साबित कर सकते हैं गरीबों का काफी भला हुआ. हालांकि कुछ लोग इस बात का आकलन भी करें कि जितना खर्च हुआ उसके मुकाबले कितना लाभ हुआ. मगर क्या इस बात का भी आकलन होगा कि कितने लोगों को आजन्म रोजगार की गारंटी मिली. कितने लोगों को सूद चुकाने से मुक्ति मिली. कितने भूमिहीनों को खेती के लिए जमीन मिल गयी. अगर आप गांवों में जाते होंगे और गरीबी रेखा से नीचे के लोगों से मिलने का मौका मिलता होगा तो आपने जरूर गौर किया होगा. अगर नहीं किया तो एक ही वर्ग के एक मनरेगा मजदूर और स्वयं सहायता समूह की एक महिला से मुलाकात करें. फिर तय करें कि किसकी जिंदगी बदली और इस बदलाव की खातिर सरकार का कितना पैसा किस योजना के लिए खर्च हुआ. एक-एक, दो-दो रुपये हर हफ्ते जमा करने वाली औरतें कैसे साल भर में महाजनों से मुक्ति पा लेती हैं. और दो-चार सालों में इंटरप्रेण्योर बन जाती हैं. ... और मनरेगा के मजदूर को तो हर साल मनरेगा ही चाहिये होगा.
... और यह फर्क कोई छोटा सा फर्क नहीं है. यही फर्क इस देश की तकदीर साबित होने वाला है. 2005 तक जब इस देश में यूपीए का शासन नहीं शुरू हुआ था इसी स्वयं सहायता समूह को देश की गरीबी मिटाने का सबसे बड़ा फार्मूला माना जाता था. मगर जैसे ही नरेगा कानून बना, इसे ही हर रोग की दवा मान लिया गया. मेहनत, बचत और व्यापार का फार्मूला खारिज होने लगा और नरेगा का खैराती फार्मूला हिट होने लगा. गरीब मेहनतकश से लाभार्थी में बदल गया. इस खैरात ने भ्रष्टाचार को जन्म दिया और भ्रष्टाचार ने हताशा को. आज उसी खैराती फार्मूला का नया दावं है कैश सब्सिडी और फूड सिक्योरिटी. मगर हताशा इतनी फैल गयी है कि हर खैरात गरीबों का मुंह चिढा रहा है...

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