कानून तो बना लोगे, दारोगा कहाँ से लाओगे


जिस दिन लोकसभा ने एंटी रेप बिल पर अपनी मुहर लगायी थी, उसके अगले दिन रांची के अखबारों में एक दहलाने वाली खबर चस्पा थी. रांची से सटे सोनाहातू में एक महिला और उसके नवजात शिशु का शव पांच दिन से पड़ा था और उसके पास उसकी पांच वर्षीय बेटी बैठी थी. तफ्तीश के बाद पता चला था कि उक्त महिला विधवा थी और अपनी बेटी के साथ अकेले रहती थी. किसी व्यक्ति ने उसका यौन शोषण किया, जिसकी शिकायत करने वह थाने में गयी. मगर पुलिस ने उसे भगा दिया. बाद में यौन शोषण के कारण ठहरे गर्भ की वजह से उसने बच्चे को जन्म दिया. जन्म के वक्त ही जच्चा और बच्चा दोनों ने प्राण त्याग दिये. ऐसा नहीं है कि उस दिन अखबार में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की यही एक खबर थी. एक और खबर कहीं की थी कि कचहरी परिसर में एक महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया. अगले दिन यानी आज के अखबार भी ऐसी ही खबरों से भरे हैं. एक महिला ने दुष्कर्मी को सजा नहीं दिला पाने के कारण खुद को आग लगाकर जान दे दी है. यह नये और तथाकथित मजबूत कानून का हमारे समाज द्वारा किया जाने वाला स्वागत है. समाज तो खैर खुद को सरकार का हिस्सा ही नहीं मानता मगर सरकार का अहम हिस्सा माना जाने वाला पुलिस प्रशासन इन कानूनों को लेकर कितना संवेदनशील है, यह उपर्युक्त घटनाओं से जाहिर है. वैसे मैं यहां इस कानून और उसको लागू कराने वाली एजेंसी के बारे में सवाल नहीं उठा रहा. मेरा सवाल अपने देश के सैकड़ों कानूनों और उसे लागू किये जाने के उपायों पर है और इस बात पर भी कि देश के कितने लोग इन कानूनों के बारे में जानते हैं.
परसों ही एक सेमीनार में एक सज्जन शिक्षा का अधिकार कानून की बारीकियों का जिक्र कर रहे थे कि इसके तहत सरकार ने समाज को कितने अधिकार दिये हैं, मगर लोग ही जागरूक नहीं हैं. वे अपना हक नहीं लेते... ऐसा ही सूचना का अधिकार, मनरेगा, राइट टू फूड और कई दूसरे कानूनों के बारे में कहा जा सकता है जो पिछले एक दशक में देश को मिले हैं.... संभवतः कुछ दिनों बाद ऐसा ही खाद्य सुरक्षा कानून के बारे में भी सेमीनारों में यही कहा जायेगा. कहने वाले विशेषज्ञ जब इन बारीकियों को बता रहे होंगे तो हॉल में मौजूद अन्य विशेषज्ञ जिनकी अलग-अलग चीजों के बारे में विशेषज्ञता होगी उन्हें तमाम जानकारियां बिल्कुल नयी प्रतीत होगी. और आम जनता जिन्हें इन तमाम कानूनों के जरिये सहूलियतें देने की कोशिश की गयी है अपनी पूरी जिंदगी में इन कानूनों का दस फीसदी हिस्सा भी नहीं जान पायेंगी. विशेषज्ञ जागरुकता की कमी का रोना रोते रहेंगे और बिचौलिये जागरूक होकर मोटे होते रहेंगे.
मैंने सोचा था कि उस समारोह में उन विशेषज्ञ महोदय से पूछूं कि ये कानून इतने जटिल क्यों हैं कि इन्हें समझने के लिए लोगों को जागरूक होना पड़े. और अगर लोग जागरूक नहीं हो पा रहे तो ऐसा क्यों माना जाये कि कानून लागू हो गया है. दरअसल पिछले कुछ सालों में खास तौर पर जबसे कांग्रेस ने नेशनल एडवाइजरी कमेटी में स्वयंसेवी संस्था के नामी-गिरामी लोगों को जगह दी है. आम आदमी के हित से जुड़े कई कानून लागू हुए हैं. मनरेगा, वनाधिकार कानून, सूचना का अधिकार कानून, महिला सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा कानून तो टटका-टटका लागू हुए हैं. पिछले कुछ साल से सिविल सोसाइटी के दूसरे नुमाइंदे जो एनएसी में शामिल होने से चूक गये वे जनलोकपाल विधेयक के लिए दबाब बना रहे हैं. अगर इन तमाम कानून की मोटी-मोटी बातें लोगों से पूछी जाये तो जाहिर हो जायेगा कि लोगों को इनके बारे में कितनी कम जानकारी है. लोग तो लोग सरकारी अमलों के अफसर भी ठीक से नहीं जानते कि मनरेगा के तहत बच्चों वाली महिलाओं को क्या-क्या सुविधाएं देनी है या सूचना का अधिकार कानून के तहत प्रथम अपील का निबटारा कैसे करना है.
वनाधिकार कानून का मामला तो कमाल है. बहुत संभव है कि कुछ साल बाद इस कानून को इस बिना पर निरस्त कर दिया जाये कि बनने के इतने साल बाद भी लागू नहीं हो पाना यह दर्शाता है कि लोगों की रुचि वनाधिकार पाने में है ही नहीं. इस कानून के तहत स्पष्ट प्रावधान है कि वन विभाग वनों की सुरक्षा कर पाने में विफल रहा लिहाजा वनों के प्रबंधन का अधिकार उनके इर्द-गिर्द रहने वाले लोगों के हाथों में स्थांतरित कर दिया जाये. ऐसे में इन कानून के लागू होते ही देश के वनों में वन विभाग के अधिकारियों की मौजूदगी अवैध हो जाती है. मगर आम लोग अब तक यही समझते हैं कि यह कानून सिर्फ जमीन का पट्टा लिखवाने का कानून है. कई जगह स्वयंसेवी संस्थाओं ने पंचायतों के नाम वन के प्रबंधन का काम स्थानांतरित करवाने की कोशिश की, मगर पूरे देश में सिर्फ एक जगह महाराष्ट्र के मेंढ़ालेखा में यह मुमकिन हो पाया और वह भी तत्कालीन वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के सक्रिय हस्तक्षेप के कारण. आज भी पूरे देश में वन विभाग के अधिकारी पूरे ठाठ से राज कर रहे हैं और ग्रामीणों को लकड़ी काटने के जुर्म में जेल की हवा खिला रहे हैं. यह हमारे देश में बने महत्वपूर्ण कानूनों के लागू करने की प्रक्रिया और सरकारी सदिच्छा का नमूना है. दिन रात जागरूकता की दुहाई देने वाले सरकारी अधिकारी और एनजीओ वाले भी इस मसले पर जागरूकता का मंत्र भूल जाते हैं.
मैं कहता हूं कि अगर लोग मनरेगा और मिड-डे मील या शिक्षा का अधिकार को लेकर ही जागरूक हो जायें तो क्या होगा. कितने प्राइवेट स्कूलों में 25 फीसदी गरीब बच्चों का नामांकन होता है? मनरेगा में कितनी मेठ महिलाएं हैं और कितने जगह कार्य स्थल पर पालनाघर की व्यवस्था है? क्या जागरूक लोगों के शोर मचाने से यह सुनिश्चित हो जायेगा... अगर किसी को भ्रम है तो वे अपने शहर के सबसे मशहूर प्राइवेट स्कूल में एक बीपीएल बच्चे का एडमिशन करा कर देख ले.
फेसबुक पर कई पुरुष साथी नये कानून से डरने का अभिनय कर रहे हैं कि अब बुरका पहन कर गलियों में घूमना पड़ेगा. अरे भाई जब रेप का शिकायत दर्ज कराने में नाकाम होकर महिलाएं खुदकुशी करने को मजबूर हो जाती है, तो भला घूरने की शिकायत कौन दरोगा दर्ज करेगा. दरोगा भी तो आखिर पुरुष ही है, उससे अधिक पुरुषों का दर्द कौन समझेगा. उसके रोबीले अंदाज को देख कर महिलाएं यही समझेंगी कि इससे बेहतर तो छेड़खानी करने वाले से मुकाबला करना है.. हो सकता है वह घुरकी दिखाने से भाग ही जाये...
आखिर ऐसा क्यों है, गड़बड़ी कहां है...
बड़ी-बड़ी कमेटियां मिलकर कानून तैयार करती हैं. संसद में उस तैयार कानून के हर छेद में उंगली डाल कर हंगामा किया जाता है, फिर सरकार लाचार होकर उन छेदों को भी बंद करती हैं. फिर कानून बनता है. मगर जब उसे लागू करने का बारी आती है तो न उसकी जानकारी लागू करने वालों को होती है और न ही उनको जिसके लिए यह कानून बना है. क्या यह सवाल सिर्फ जागरूकता और प्रचार-प्रसार में कमी का है या हमारे कानून निर्माण प्रक्रिया में... अब तक तो संविधान के मूल प्रावधानों के बारे में ही लोगों को ठीक से जानकारी नहीं है तो फिर वे सौ की संख्या में पहुंचे संशोधनों को कैसे समझेंगे. अगर आप इसकी असली वजह जानना चाहते हैं कि कृपया किसी भी एक कानून के दस्तावेज का पीडीएफ डाउनलोड करके उसे समझने की कोशिश करें. पहले पांच पन्नों में तो सिर्फ परिभाषाएं होती हैं कि इस कानून में वर्णित फलां शब्द का अर्थ फलां है, उसके बाद कही प्रावधानों को शुरू होने का मौका मिलता है.
मुझे हैरत होती है कि अगर अपना संविधान लिखित के बदले मौखिक होता तो क्या होता. लोग कैसे इस इनसाइक्लोपीडिया को याद रखते. क्यों हम ऐसे नियम-कानून नहीं बनाते जिसमें पेंच कम हो और समझदारी ज्यादा. जो फिल्मी गानों की तरह लोगों को याद हो जाये और जिसमें नियम के लिए कम और संवेदनशीलता के लिए अधिक गुंजाइश हो. अगर कोई किसी को थप्पर मारता है तो उसे सजा देने के लिए कानून की धारा याद रखने की जरूरत क्यों पड़े... घर में दो बच्चे जब झगड़ते हैं तो कौन आइपीसी के रेफरेंस याद करता है. मगर जब यही लड़ाई घर से बाहर होती है तो वकील हमें बताता है कि गाली के साथ-साथ जातिसूचक गाली का भी आरोप लगाओ इसमें अधिक सजा मिलेगी. पति-पत्नी के झगड़े में वकील पत्नी को दहेज प्रताड़ना का आरोप लगाने की सलाह देता है और पति को कहता है कि वह तभी बच सकता है जब वह पत्नी को बदचलन साबित कर दे.
अब आने वाले दिनों में क्या लड़कियों का पीछा करना और उसके साथ बसों और सार्वजनिक स्थलों पर छेड़खानी बंद हो जायेगी...? मगर कुछ ऐसे मामले जरूर होंगे जिसमें वकील अपने मुवक्किल को इन आरोपों का लाभ लेने का हुनर सिखायेगा...
इसके बदले देश में जो कानून और जितनी योजनाएं बीस साल पहले थीं उसका इस्तेमाल ठीक से होता तो इतने नये कानून बनाने की जरूरत नहीं होती. मगर दुर्भाग्यवश हमारे हुक्मराने ने जितनी मेहनत कानून बनाने में की उसका एक चौथाई काम इन्हें ठीक से लागू कराने पर नहीं हुआ. सरल कानून बने और सही तरीके से लागू हो जाये तो देश और उसकी संसद को, अदालतों को संविधान और उसके सौ के करीब संशोधनों के प्रावधानों और उनकी नियमावली को याद करने की जरूरत नहीं पड़े.

Comments

आज ही दैनिक-भास्कर में देवरिया(उ.प्र.)का ऐसा ही बेहद शर्मनाक और बेशर्मीभरा समाचार पढा जिसमें एक महिला (उसके पति ने भी)अपने साथ हुए दुराचार की शिकायत की तो एस. पी. ने धृष्टता से कहा कि इतनी पुरानी महिला से कौन दुष्कर्म करेगा ।
इसे क्या कहा जाए । सच है केवल कानून बनाने से कुछ नही होगा जबकि ऐसे गैर जिम्मेदार और असंवेदनशील अपसरों व कर्मचारियों को सही रास्ता नही दिखाया जाएगा । इस ब्लाग का पता भी इसी पत्र से मिला । शुक्रिया ।