दरभा, राजनीति, लोकतंत्र और माओवाद


पिछले दिनों दरभा में हुई माओवादी वारदात के बाद सोशल मीडिया पर जमकर बहस हुई. मगर यह बहस कुछ ऐसी हुई कि हमारी समझ साफ होने के बजाय और धुंधली ही होती चली गयी. पता नहीं यह ठीक है या गलत मगर सोशल मीडिया के प्रभावी होने के बाद अक्सर ऐसा ही होता है. एक मुद्दा उठता है, कई तरह के नजरियों के साथ उस पर हम खुले हृदय से अपनी राय रखते हैं. एक जैसा नजरिया पीछे छूटता चला जाता है और जो रुख थोड़ा अलग होता है बहस उसके सहारे आगे बढ़ती चली जाती है. मेरे हिसाब से यह ठीक भी है और थोड़ा गलत भी. ठीक इस लिहाज से कि चीजों को नयी नजर से देखना कभी इतना सहज नहीं हुआ करता था और गलत इस वजह से कि हमलोग उन मसलों को भूल जाते हैं कि कम से कम कुछ बातें तो ऐसी जरूर हैं जिस पर तमाम लोग एक साथ बिना किसी प्रतिरोध के सहमत हैं. जैसे सच, इमानदारी, साहस और बदलाव. इन शब्दों का कोई विकल्प नहीं है और इन शब्दों के साथ जीने के बाद किसी वाद की जरूरत नहीं है. चाहे वह मानवतावाद ही क्यों न हो जिसका जिक्र आजकल खूब होने लगा है.
बहरहाल यहां मैं दरभा, राजनीति, लोकतंत्र और माओवाद के बारे में बात करना चाह रहा हूं. दरभा के बारे में जो सबसे पहली प्रतिक्रिया सामने आयी वह यह थी कि .. यह लोकतंत्र पर हमला है.. देखते ही देखते यह प्रतिक्रिया नारे में बदल गयी और तमाम ऐसे लोग जो भारत के निर्माण में अपने हक का दावा करते रहे हैं ने इसे हाथोंहाथ ले लिया. इसमें सिर्फ कांग्रेस के लोग नहीं थे, भाजपा समर्थकों का वह वर्ग जो मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए पिछले छह महीने से सोशल मीडिया पर अतार्किक किस्म की लॉबिग करता रहा है और हर नयी खबर के साथ केंद्र की कांग्रेस सरकार की खिंचाई करता रहा है वह भी इसे लोकतंत्र की हत्या मानने के लिए सहज तैयार हो गया. बड़ी आसानी से माओवाद और आंतकवाद को एक जैसा बताया गया, सलवां जुड़ूम के नेता महेंद्र कर्मा को शहीद और बस्तर का शेर पुकारा गया और सरकार से अपील की गयी कि जितना जल्द हो सके सारे टैंक सीमाओं से मंगवा लें और दंडकारण्य को कुचल डालें. तभी इस समस्या का समाधान हो सकेगा. ठोस कार्रवाई का समय आ चुका है और चुप-चाप बैठने से काम नहीं चलेगा.
ये प्रतिक्रियाएं सचमुच हैरत-अंगेज थीं. कांग्रेसियों की भी और भाजपाइयों की भी. क्योंकि कांग्रेसी आम तौर पर विचारधारा के नाम पर वाम की ही शरण लेते हैं और राहुल-सोनिया के नाम का जो सत्ता का केंद्र है वह 99 फीसदी वामपंथी है. कॉरपोरेट पूंजीवाद को पटाये-सटाये रखने का जिम्मा मनमोहन-चिदंबरम एंड को. के पास है. सोनिया ने एनएसी का गठन ही इस नजरिये से किया कि पार्टी के परंपरागत वोट बैंक यानी अल्पसंख्यक, आदिवासी, दलित और दूसरे सीमांत समुदायों के पक्ष में योजनाएं बनायी जा सके और इंडिया शाइनिंग के नेटवर्क एरिया से बाहर जो भारत बसता है उसे फुसलाकर रखा जा सके. वे समझ चुकी हैं कि उनकी मरहूम सास इंदिरा गांधी ने जो गरीबी हटाओ का नारा पेश किया था वह शोले फिल्म की तरह ऑल टाइम ब्लॉक बस्टर है. एनएसी की ओर से पिछले कुछ सालों में ऐसे कई कानून बनाये भी गये जो गरीबों को भिखारियों की कौम में बदल दे और भीख के बदले वोट का खेल किया जा सके. तभी हाल ही में केंद्र के कई नेताओं ने कैश(भीख) ट्रांसफर को गेम चेंजर कहते हुए पेश किया था. अब खाद्य(एक दूसरे तरह की भीख) सुरक्षा कानून पेश हो रहा है. हालांकि दानवीरों की इस सरकार में संसाधनों की लूट की कहानी भी साथ-साथ चलती रही. वनाधिकार कानून के जरिये आदिवासियों को वनों के प्रबंधन का जो अधिकार देने की बात कही गयी वो तो सात साल बाद भी कागजों पर ही रही मगर इन सात सालों में कम से कम सात लाख आदिवासियों को जंगलों से खदेड़ दिया गया ताकि मित्तलों, जिंदलों, टाटा और वेदांता के खदान धरती के गर्भ से कोयला, लोहा, बाक्साइट और दूसरे खनिज पदार्थ शांतिपूर्वक निकाल सकें. उनका परिशोधन कर उन्हें दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचा सकें. उद्योगपतियों को यह काम निर्बाध रूप से चलाने के लिए किसी कानून के सहारे की जरूरत नहीं पड़ी. सब कुछ आसानी से होता रहा. परेशानी वहां हुई, जहां माओ के पुजारी बंदूक थामे फैले हुए थे.
रेड कॉरिडोर नामक शब्द शायद पिछली सदी के आखिरी दशक में प्रचलन में आया. पता नहीं यह किसका शोध था, मगर था बहुत ही महत्वपूर्ण, कि बारस्ते नेपाल उत्तर-पूर्व, बिहार-बंगाल, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ हिस्से में घने जंगलों के नीचे माओवाद के सिपाहियों ने एक सुरक्षित गलियारा तैयार कर लिया है. इस गलियारे में सरकार की मौजूदगी न के बराबर है और पूरे इलाके में माओवादी ही सरकार हैं. इस थ्योरी से यह भी लिंक्ड था कि इस कारिडोर को तैयार करने के पीछे चीन का बड़ा हाथ है. हमारा यह दुष्ट पड़ोसी भारत में अंसतोष का माहौल बनाये रखना चाहता है और इसी वजह से समानता के नाम पर चल रही पूरी लड़ाई को फंड उपलब्ध करा रहा है. मगर बहुत जल्द हमें यह समझ में आ गया कि लाल गलियारे की सरकार को किसी चीनी फंड की दरकार नहीं. वह लेवी के तौर पर ठेकेदारों, सरकारी कर्मचारियों, नेताओं और व्यवसाइयों से इतनी वसूली कर लेता है कि उसकी आमदनी किसी राज्य सरकार के सालाना बजट जितनी हो ही जाती है. इन पैसों से वह भारत की सरकार के खिलाफ युद्ध लड़ता है.
हालांकि यह अजीब किस्म का युद्ध है. इस युद्ध में न कोई हारता है और न ही कोई जीतता है. लाल गलियारा न बढ़ता है और न ही घटता है. और सरकार कभी आपरेशन ग्रीन हंट चलाती है तो कभी सारंडा एक्शन प्लान लागू करती है मगर उन इलाकों में वह एक कदम भी घुस नहीं पाती हैं. अपने देश के भीतर यह एक और देश है, जिस देश में आदिवासी हैं, जंगल है और पग-पग पर बंदूक का खतरा है. वहां लोकतंत्र तो कतई नहीं है. हां कुछ उद्योग जरूर हैं, जिसे हम अवैध खनन कह सकते हैं. कई खनन माफिया उन इलाकों में सक्रिय हैं और उस इलाके की सरकार को टैक्स चुका कर खनन जारी रखे हुए हैं. रिपोर्ट है कि इन इलाकों से निकला खनिज चोरी-छिपे चीन भेजा जाता है और माओवाद इस व्यापार को भी सुरक्षा प्रदान करता है. वैसे माओवादी उन नेताओं को भी सशुल्क सुरक्षा और चुनाव जीतने लायक मत उपलब्ध करवाते हैं जो उन इलाकों से हमारी लोकसभा, विधानसभा और पंचायतों के लिए चुने जाते हैं.
कई दफा इन इलाकों में चहलकदमी करने वाले भारतीय सेना के सिपाहियों पर हमला हो जाता है और बड़ी संख्या में उनकी जान चली जाती है और कई दफा ये सिपाही माओवादियों को मार डालते हैं और कई बार ऐसा भी होता है कि इन इलाकों में रहने वाला आम आदिवासी कभी फौज के हाथों मारा जाता है तो कभी माओवादियों के हाथों. फौजियों को लगता है कि आदिवासी नक्सल समर्थक है और माओवादियों को लगता है वे पुलिस के मुखबिर हैं. शक और संदेह की बुनियाद पर उन इलाकों में रहने वाले हर आदिवासी की जान खतरे में है. कुछ ऐसा ही कश्मीर में भी है और उग्रवाद प्रभावित उत्तर पूर्वी राज्यों में भी. जहां-जहां चरमपंथ है, वहां के लोग शक के दायरे में और तलवार की धार पर खड़े जीवन जी रहे हैं. वहां लोकतंत्र नहीं है, आजादी नहीं और विवादास्पद हो चुका शब्द मानवाधिकार भी नहीं है. मगर जहां लोकतंत्र, आजादी और मानवाधिकार है. जहां नौकरियां और बाजार हैं. जहां हम टीवी पर बैठ कर आइपीएल और बिग बॉस का मजा ले सकते हैं, बेखौफ होकर. जहां खून-खराबे को फिल्मों तक से खदेड़ देने की मुहिम है और अखबार के पन्नों पर लाश की तसवीर छापना नैतिक अपराध माना जाने लगा है. वहां जाहिर तौर पर आंतकवाद, नक्सलवाद और चंबल के डकैत एक जैसे ही हैं और जब खून के छींटे जंगल से उड़कर शहर की मकानों को बदरंग करने लगते हैं तो हमें लगता है कि यह लोकतंत्र की हत्या है.
दरअसल लोकतंत्र की हत्या का जुमला उछालते वक्त हम भूल जाते हैं कि रेड कॉरिडोर में लोकतंत्र की हत्या अक्सर हो जाती है. दरभा नरसंहार से कुछ ही दिनों पहले, हफ्ता भी शायद ही बीता होगा. 22 आदिवासियों की हत्या बीजापुर के इलाके में हो गयी. इस हत्या का इल्जाम उन बंदूकधारियों पर नहीं था जो लोकतंत्र को ढेला भर भी नहीं मानते, बल्कि उन सिपाहियों के सर था जिसे भारतीय लोकतंत्र ने लोकतांत्रिक मूल्यों की बहाली का भी जिम्मा दे रखा है. मगर वे मानते हैं कि कई दफा लोकतंत्र की बहाली के लिए लोकतंत्र के शरीर से खून निकालना पड़ता है. इससे पहले लोकतंत्र के भक्षकों ने इसी इलाके में समानता की स्थापना करने के पावन उद्देश्य से 75 फौजियों की हत्या कर दी थी. और उस वक्त हममें से कई फेसबुकिया विचारकों ने आपत्ति की थी कि निरीह सिपाहियों की बलि लेने से क्या फायदा.. उनका क्या दोष और इस बार उन लोगों ने ऐसी कौम पर हमला किया जो देश के लिए नीतियां तैयार करते हैं और उसे पूरे देश में लागू करवाते हैं. इस पर हमने कहा कि भाई, तुमने तो लोकतंत्र की हत्या कर दी..
शुक्र है, हमसे कोई नहीं पूछता कि भाई, लोकतंत्र जिंदा कब था जो उसकी हत्या हो गयी. लोकतंत्र तो उसी वक्त मर गया था जब आजादी वाले साल ही झारखंड के सरायकेला जिले में हक के लिए संघर्ष करने वाली भीड़ पर हमारे ही सिपाहियों ने गोली चलवा दी थी. उसे आजादी का पहला गोलीकांड माना जाता है. लोगों ने छह माह के अंदर समझ लिया था कि अपनी सरकार होने का मतलब यह नहीं कि वे हम पर गोली न चलवा दें.
जब बंगाल के नक्सलवाड़ी में पहली दफा आवाम ने बंदूक उठायी तो वह बंदूक सरकारी बंदूक की प्रतिक्रिया में ही उठी होगी. उससे पहले देश के तकरीबन हर कोने में सरकारी बंदूक गरज चुकी होगी और लोगों को लगने लगा होगा कि हमारी अपनी सरकार बहरी हो चुकी है. हालांकि देश का आवाम और उसके लिए आंदोलन कर रहे अधिकांश संगठन साठ-सत्तर साल बाद भी यही मानते हैं कि भले ही सरकार गोलियां चलाती रहें, हमें गोली-बारूद का सहारा नहीं लेना चाहिये. हमारी सरकार आवाम को अपना भले नहीं मानती हो, मगर आवाम आज भी पूरी सहृदयता से सरकार को अपनी सरकार ही मानती है और उसे आज भी अंग्रेजी सरकार से बेहतर ही कहती है. हालांकि आज तक केंद्र से लेकर राज्य तक शायद ही कोई ऐसी सरकार बनी हो जिसने अपनी ही जनता को संगीनों के सामने खड़ा न कर दिया हो. महात्मा गांधी के नाम पर देश की बड़ी आबादी आज भी खामोश है. वह रामलीला मैदान में जाती है, जंतर मंतर में जाती है और ज्यादा नाराजगी हुई तो इंडिया गेट पर उतर जाती है. वह खिड़कियों के शीशे तोड़ती है और वाहनों को उलट कर आग लगा देती है. बस.. क्योंकि इससे ज्यादा गुस्सा बर्दास्त करना किसी सरकार के बस में नहीं. इसके बाद बंदूकें बाहर आ जाती हैं. अगर यही लोकतंत्र है तो सचमुच लोकतंत्र जिंदा है और अगर जनता की ओर से हुक्मरानों पर गोली चलाना ही लोकतंत्र की हत्या है तो सचमुच उस दिन लोकतंत्र की हत्या हो गयी.
कई कहानियां हैं, कई संदर्भ हैं. एक संदर्भ महेंद्र कर्मा का भी है और उस संदर्भ में हमें न जाने क्यों बार-बार अपने राज्य के ब्रह्मेश्वर मुखिया की याद आती है. ब्रह्मेश्वर मुखिया रनबीर सेना के प्रमुख थे. रनबीर सेना की स्थापना भी नक्सलियों से लोहा लेने के लिए ही की गयी थी. बिहार के भोजपुर इलाके में जब वर्ग संघर्ष भीषण हो उठा और दलितों के पक्ष से नक्सलियों ने खूनी संघर्ष का मोरचा उठा लिया तो उच्च वर्ग के किसानों ने सामूहिक तौर पर इसका सशस्त्र विरोध करने के लिए रनबीर सेना का गठन किया. इस सेना ने जगह-जगह पर नक्सलियों का सामना किया और नरसंहार के बदले नरसंहार होने लगे. मगर वह अलग दौर था. बिहार समेत देश के तमाम बुद्धिजीवियों ने एक सुर में रनबीर सेना को गलत ठहराया और कहा कि दलित वर्ग के लोग सदियों से सताये गये हैं, इसलिए उनके विरोध का हिंसक प्रतिरोध किसी सूरत में जायज नहीं है. हिंसक गतिविधियों के बावजूद लोगों की सहानुभूति दलितों के पक्ष में ही रही. रनबीर सेना की आम छवि नकारात्मक ही रही.
मगर दो दशक बीतते-बीतते नजारा बदल गया. माओवादियों की गोली का जवाब गोली से देने के लिए खुद आदिवासियों के हाथों में बंदूक थमा दिये गये और आदिवासियों को दो धड़ों में बांटकर कत्ले आम का सरकारी सिलसिला शुरू कर दिया गया. मीडिया में खबरें प्लांट कर यह साबित करने की कोशिश की गयी कि सलवां जुड़ूम के जरिये आदिवासी समाज ही माओवादियों को उखाड़ फेंकने के लिए आतुर है. मगर आने वाले वक्त में यह छलावा साफ होने लगा. हमने देखा कि सलवां जुड़ूम आदिवासी समाज में सरकारी गुंडों की फौज का रूप ले रहा है. वह सरकारी बंदूक से अपहरण, रेप और लूटपाट का व्यवसाय चलाने लगा है. आदिवासी समुदाय जो पहले से ही सुरक्षा बल और माओवादियों की दो धारी तलवार पर चल रहा था वह अब सलवां जुड़ूम के भालों पर भी टंग गया है. मगर माओवाद का यह विरोध सरकारी समर्थन प्राप्त था. यह जायज है या नाजायज इस पर बुद्धिजीवियों का धड़ा बंट चुका था. क्योंकि माओवाद खुद नैतिक रूप से कई सीढियां नीचे फिसल चुका था. उसकी खुद की छवि आज माफिया सरगनाओं जैसी हो गयी थी. मगर पतन की इन कहानियों के बीच ब्रह्मेश्वर मुखिया का नया अवतार महेंद्र कर्मा बस्तर का शेर कहा जाने लगा और नायक की छवि को प्राप्त हो गया. कहते हैं इस महेंद्र कर्मा ने कभी छत्तीसगढ़ में पेशा कानून लगाये जाने का भी विरोध किया था और आदिवासियों के बीच उसके खानदान की छवि शोषकों वाली रही है. यह सब तो कही सुनायी बाते हैं, मगर अगर ब्रह्मदेव मुखिया गलत थे और महेंद्र कर्मा सही हैं तो यह सिर्फ वक्त का फेर है.
भाजपा इस कहानी में एक और अजीब चरित्र है. देश की राजनीति में गैर कांग्रेसवाद का सबसे मजबूत विकल्प अगर आज आगे नहीं बढ़ पा रहा है तो इसकी वजह इसका सामंतवादी चरित्र ही है. इसके लिए अल्पसंख्यकों ही नहीं आदिवासियों, दलितों और तो और द्रविड़ों के लिए भी कोई नीति, योजना या विचार नहीं. संभवत: यह देश में हाल के बरसों में फैली समानता की लड़ाई की प्रतिक्रिया भर है. पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों के उभार के खिलाफ उच्चवर्गीय हिंदू समाज में जो गुप्त किस्म की नाराजगी है भाजपा उसकी तुष्टिकरण करके वोट बटोरने को ही अपना अंतिम ध्येज मान बैठी है. देश को कांग्रेस का विकल्प चाहिये, मगर इस पार्टी के नेताओं को विकल्प बनने की फुरसत ही नहीं है. इसके समर्थकों को कारगिल युद्ध और दरभा के नरसंहार में कोई फर्क नजर नहीं आता. हालांकि बस्तर के इलाकों में विधानसभा की अधिकांश सीटों पर इसके ही नेता जीतते रहे हैं, वो भी माओवादियों को पैसा भरके.. मगर आदिवासियों के मसले क्या हैं इसका रत्ती भर भान इस पार्टी को नहीं है. इनके हिसाब से देश को सवर्ण हिंदुओं के लिए खाली कर दिया जाना चाहिये. यह देश उन्हीं का है.
राजनीतिक वामपंथ भी माओवादियों को भटका हुआ मानता है. यह प्रतिक्रिया किसी जवान लड़की के बाप जैसी है, जो बेटी के हर दोस्त को आवारा समझता है. भइये, आप के पास लड़ने की फुरसत नहीं है, जनता कब तक आपके कथित कयामत के दिन का इंतजार करे. इस देश में लड़ने वाला हर आदमी भटका हुआ है और जो शराफत भरे लिबास में टीवी चैनलों पर वर्ग संघर्ष की थियोरी के गर्दोगुबार साफ कर रहा है वही केवल सही रास्ते पर है. बस्तर का इलाका जहां कभी लोग पलायन नहीं करते थे आज वहां के घर-घर से लोग जबलपुर और रायपुर-बिलासपुर जा रहे हैं तो इसका कसूरवार कौन है. और आपकी अदालत का फैसला होने तक लोग कैसे भिखमंगों का जीवन जीते रहें.
दंडाकरण्य को खाली करवा लो. यह आज का सबसे पापुलर नारा है. मगर विज्ञान कहता है कि इस दुनिया में कोई चीज खाली नहीं रह सकती. तो खाली दंडकारण्य में कौन रहेगा. जिंदल-वेदांता और टाटा. किसके लिए खाली होगा दंडकारण्य. हिंसा खत्म होनी चाहिये और ठीक है इसके लिए हिंसा का सहारा भी लिया जाना चाहिये. मगर हिंसकों के खिलाफ. टैंक चलें मगर खेत न उजड़े. माओवादी जो बंदूक में आस्था रखते हैं उन्हें गोली लग भी जाये तो कोई गम नहीं क्योंकि बंदूक और गोली का रास्ता उन्होंने अपनी मरजी से चुना है. मगर उन तमाम लोगों को गोलियों से बचाने की गारंटी कौन लेगा जो शांति से रहना चाहते हैं. जिनकी एक ही मांग है, उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाये. क्या लोकतंत्र के पहरेदार इस बात की गारंटी लेंगे?
अब इस बात पर मेरा भरोसा पुख्ता हो गया है कि इस कंफ्यूजन भरे दौर में सच्ची बात सिर्फ सरकारी मशीनरी के बीच बैठा संवेदनशील आदमी ही कर सकता है. श्रीलाल शुक्ल की राग दरबारी और श्रीकांत वर्मा का कविता संग्रह मगध इसके उदाहरण हैं. इस पूरी बहस में मुङो सबसे पसंद केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश की बात लगती है, कि दस सालों के लिए देश के सभी आदिवासी इलाकों में खनन पर रोक लगा दी जानी चाहिये. पता नहीं किस मनोदशा में उन्होंने यह बात कही और हमारी सरकार अपने इस मंत्री की बातों को कितनी गंभीरता से लेती है, मगर इस पूरी समस्या का सबसे बेहतर समाधान यही है. हालांकि आज की तारीख में इसे यूटोपिया ही कहा जा सकता है.. मगर कई लोग यूटोपिया के पीछे ही दीवाने होते हैं.
और अंत में एक जमाने के विद्रोही कवि राजकमल चौधरी की एक कविता का अंश
आदमी को तोड़ती नहीं हैं लोकतांत्रिक पद्धतियां केवल पेट के बल
उसे झुका देती हैं धीरे-धीरे अपाहिज
धीरे-धीरे नपुसंक बना लेने के लिए उसे शिष्‍ट राजभक्‍त देशप्रेमी नागरिक बना लेती हैं
आदमी को इस लोकतंत्री सरकार से अलग हो जाना चाहिये

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