Wednesday, August 14, 2013

9 हजार करोड़ का पैकेज फिर भी कोसी बदहाल


आपदा के 5 साल बाद भी बेघर हैं लाखों कोसीवासी, खेतों में अभी भी भरा है बालू, लोग पलायन को हैं मजबूर, पुनर्वास के नाम पर अभी भूमिका ही बांध रही है सरकार
18 अगस्त 2013 को कोसी में आयी भीषण बाढ़ के पांच साल पूरे हो रहे हैं. मगर कोसी आज भी उजड़ी की उजड़ी है. खेतों में बालू भरे हैं और लोग पलायन को मजबूर हैं. बाढ़ से सर्वाधिक प्रभावित जिले सुपौल के कई गांव में सिर्फ बुजुर्ग दंपति ही बचे हैं. जिन ढाई लाख लोगों के घर इस आपदा में क्षतिग्रस्त हो चुके हैं, उन्हें सरकारी मदद का इंतजार आज भी है. मगर राज्य सरकार की पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण सोसाइटी अब तक सिर्फ 12 हजार लोगों के लिए ही घर बनवा सकी है. सबसे महत्वपूर्ण बात इन सबकी वजह फंड की कमी नहीं है. राज्य सरकार को केंद्र और विश्व बैंक से कोसी की तसवीर बदलने के लिए 9 हजार करोड़ का बजट अलॉट किया गया है. मगर काम की रफ्तार जो है उससे लगता है कि सभी पीड़ितों को मकान मिलने में सौ साल का वक्त लग सकता है.
क्या हुआ था पांच साल पहले
18 अगस्त 2008 यानी आज से पांच साल पहले की इस तारीख को कोसी के इलाके के सहरसा, मधेपुरा और सुपौल जिलों के वासी शायद ही कभी भूल पायेंगे. यही वह दिन है जब अचानक कोसी नदी ने अपना रास्ता बदल लिया था और बस्तियों के बीच से अपनी पुरानी राह को तलाश कर बहने लगी थी. नेपाल के कुसहा से मधेपुरा के आलमनगर तक के सैकड़ों गांव महीनों जलप्लावित रहे. हजार के करीब लोगों की जान गयी. दसियों हजार जानवर मारे गये. लाखों छह महीने के लिए विस्थापित हो गये. लोगों के खेतों में बालू भर आया और उनकी आजीविका छिन गयी. लाखों लोग बेघर हो गये. आज की पीढ़ी में शायद ही कोई ऐसा हो जिसने कोसी के इलाके में इससे भीषण त्रासदी झेली हो. हालांकि त्रासदी का वह बुरा वक्त गुजर गया, मगर कई निशान आज भी मौजूद हैं.
खेतों में भरे हैं बालू
बिहार सरकार ने कोसी आपदा के वक्त आकलन किया था कि इस आपदा की वजह से 14,800 करोड़ के करीब नुकसान हुआ था. इससे उस भीषण आपदा का अनुमान लगाया जा सकता है. मगर पांच साल बाद भी तसवीर कुछ बदली नहीं है. कुशहा से सटे बिहार के सुपौल जिले के कई गांवों में खेतों में बालू भरे हैं. आरटीआई एक्टिविस्ट महेंद्र यादव की आरटीआई के जवाब में सरकार ने स्वीकार किया है कि आज भी 14,129.70 एकड़ जमीन पर बालू जमा है. कई खेतों में 2 से 4 फीट बालू है. सरकार ने किसानों को खेतों से बालू हटाने के लिए चार से पांच हजार रुपये प्रति एकड़ की राशि दी थी, मगर किसानों का कहना है कि एक एकड़ जमीन से बालू हटाने का खर्च 50 हजार रुपये प्रति एकड़ से कम नहीं है. और उनके सामने सबसे बड़ा सवाल था कि इस बालू को हटाकर रखें कहां. ऐसे में लोगों की खेती ठप पड़ गयी है और लोगों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.
नयी तरह का पलायन
इस इलाके में बुजुर्गों के लिए काम कर रही संस्था हेल्पेज इंडिया के राज्य प्रमुख गिरीश मिश्र कहते हैं कि पलायन तो यहां हमेशा से होता रहता था, मगर बाढ़ के बाद पलायन का नया ट्रेंड शुरू हुआ है. पहले लोग खुद मजदूरी करने जाते थे और परिवार यहां रहता था, मगर अब लोग सपरिवार बाहर जाने लगे हैं, केवल घर के बुजुर्गों को यहां छोड़ दिया जाता है. हेल्पेज इंडिया ने इस इलाके के 8 बाढ़ पीड़ित गांवों में सर्वे कराया. इस सर्वेक्षण से पता चला है कि गांवों में 66 फीसदी बुजुर्ग या बुजुर्ग दंपति अकेले रहते हैं. सहरसा से मजदूरों को दिल्ली और पंजाब ले जाने वाली गाड़िया हमेशा भरी होती हैं.
पैसों की कमी नहीं है पुनर्वास के लिए
कोसी के बाढ़ पीड़ितों के पुनर्वास और पुनर्निर्माण के लिए बिहार सरकार को विश्व बैंक से 1009 मिलियन डॉलर (6200 करोड़ रुपये) का फंड मिल रहा है, केंद्र सरकार ने भी कोसी के लिए लगभग 29 सौ करोड़ की राशि राहत और पुनर्वास के लिए दी है. मगर कोसी के पुनर्वास के लिए राज्य सरकार को कितनी राशि मिली है इसको लेकर सरकार कुछ भी साफ-साफ कहने को तैयार नहीं है. राज्य के आपदा प्रबंधन और योजना विभाग के सचिव इस सवाल पर कहते हैं कि केंद्र की ओर से उन्हें कोई सहायता नहीं मिली है, विश्व बैंक से 1194 करोड़ रुपये मिले हैं और उसी राशि से पुनर्वास का काम चल रहा है. मगर खुद राज्य का आपदा प्रबंधन विभाग हमारे आरटीआई के जवाब में कहता है कि केंद्र सरकार की ओर से उन्हें 1121.86 करोड़ रुपये की राशि राहत कार्य के संचालन के लिए दी गयी है. पुनर्वास का कार्य योजना विभाग देख रहा है, अतः उक्त प्रश्न उन्हें निर्देशित किया जा रहा है. यानी केंद्र सरकार ने कुछ राशि पुनर्वास के लिए भी दी होगी. मगर केंद्र सरकार के मंत्री ने राज्य सभा में सांसद उपेंद्र कुशवाहा के एक सवाल के जवाब में कहा है कि सरकार की ओर से 614.56 करोड़ राहत कार्यों के संचालन के लिए और 2273.15 करोड़ रुपये पुनर्वास के लिए राज्य सरकार की ओर से दिये गये. यानी कुल 29 सौ करोड़ की राशि केंद्र सरकार द्वारा कोसी की राहत और पुनर्वास के लिए केंद्र सरकार की ओर से जारी किये गये. विडंबना यह है कि राज्य सरकार का कोई विभाग यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि यह पैसा कहां है और किस रूप में व्यय हुआ, हो रहा है, लौट गया या क्या हुआ. वैसे इसी साल मार्च में कैग ने अपने रिपोर्ट में जिक्र किया है कि कोसी राहत का पैसा ठीक से खर्च नहीं होने के कारण लौट गया है.
विश्व बैंक की सहायता
कोसी पुनर्वास के लिए विश्व बैंक की ओर से 2010 में बिहार सरकार को बड़ी सहायता मिली और इन पैसों को व्यय करने के लिए सरकार ने बिहार आपदा पुनर्वास एवं पुनर्निमाण सोसाइटी का गठन किया. इस सोसाइटी के एक अधिकारी ने जानकारी दी है कि 1009 मिलियन डॉलर की राशि इस परियोजना के लिए विश्व बैंक की ओर से स्वीकृत है. इस राशि से 2021 तक कोसी का पुनर्वास करना है. मगर यह अपने-आप में शोचनीय प्रश्न है कि आखिर किसी आपदा के पीड़ितों के पुनर्वास लिए इतना लंबा वक्त क्यों लिया जा रहा है. इतने लंबे वक्त में तो पीढ़ियां गुजर जाती हैं. बहरहाल उन्होंने आगे यह भी जानकारी दी कि पूरी परियोजना तीन चरणों में पूरी होनी है. पहली परियोजना के तहत पीड़ितों के लिए एक लाख मकान बनाने का लक्ष्य रखा गया था. जिसे पूरा करने के लिए 2014 तक की समय सीमा रखी गयी थी. यह सोचे बगैर कि आपदा से प्रभावित लोग इस बीच छह साल का वक्त क्या सड़क पर गुजारेंगे. मगर हालत यह है कि फरवरी तक इस भारी भरकम समिति ने महज 10 हजार मकान बनाये थे, यह आधिकारिक सूचना थी. अधिकारी ने कहा कि आज की तारीख तक 12 हजार के करीब मकान पूरे हुए हैं. इस तरह से देखा जाये तो बिहार की सरकार ने कोसी आपदा के पांच साल में कुल 12 हजार लोगों को किसी तरह मकान दिया है, जबकि खुद सरकार का आंकड़ा कहता है इस आपदा के दौरान कुल 2,36,632 मकान क्षतिग्रस्त हुए हैं. इस रफ्तार से देखा जाये तो कोसी आपदा से प्रभावित सभी पीड़ितों को इतनी आर्थिक सहायता के बावजूद मकान पाने में सौ साल से अधिक समय लग जायेगा. इसका लाभ सिर्फ इतना होगा कि बिहार आपदा पुनर्वास एवं पुनर्वास सोसाइटी की मोटी तनख्वाह पर बहाल विशेषज्ञ और कर्मचारी आजीवन पैसे कमाते रह पायेंगे.
सोसाइटी का क्या काम है
हमारा एक आरटीआई आवेदन आज भी सोसाइटी के दफ्तर में पड़ा है और मेरे तमाम सवालों को इस आधार पर टाल दिया गया है कि जवाब आरटीआई के तहत ही दिया जायेगा. मगर इस बीच सोसाइटी के वेबसाइट पर जो महज कुछ दिन पहले तक मौजूद था, अब नहीं है पर कई सूचनाएं थी और कुछ सूचना सोसाइटी के एक अधिकारी ने हमारे आरटीआई पहुंचने से पहले दी. इस आधार पर कहा जा सकता है कि सोसाइटी ने अपना लक्ष्य सहरसा के 5, सुपौल के 5 और मधेपुरा जिले के 11 प्रखंडों में पुनर्वास करने का रखा है. इसके तहत
1. पहले चरण में एक लाख मकान बनने हैं
2. क्षतिग्रस्त सड़कों और पुल-पुलियों का निर्माण किया जाना है
3. बाढ़ प्रबंधन का काम किया जाना है
4. खेतों से बालू हटाया जाना है
5. आजीविका के साधनों का विकास किया जाना है
पहले चरण के तहत 259 मिलियन डॉलर खर्च किये जाने हैं. पहले इसकी समय सीमा सितंबर, 2014 रखी गयी थी, काम के मौजूदा रफ्तार को देखते हुए समय सीमा बढ़ाकर 2016 कर दी गयी है. दूसरे चरण में 2019 तक 375 मिलियन डॉलर और तीसरे चरण में 2021 तक 375 मिलियन डॉलर खर्च किये जाने हैं. काम का हाल यह है कि आज की तारीख तक 12 हजार मकान बने हैं. सड़क और पुल-पुलियों का काम चल रहा है मगर एक भी परियोजना पूरी नहीं हुई है. आरटीआई एक्टिविस्ट महेंद्र यादव बताते हैं कि मधेपुरा जिले के मुरलीगंज प्रखंड के रजनी पंचायत के प्रतापनगर गांव में जो बाढ़ के वक्त धारा के बीच में पड़ गया था और बुरी तरह प्रभावित हो गया था के लोगों के पुनर्वास के लिए उनके खाते खुलवाये गये थे मगर मार्च 2013 तक उनके खातों में एक पैसा भी नहीं डाला गया है.
सरकार की कोसी आपदा नीति
कोसी के पुनर्वास के लिए राज्य सरकार ने लंबी चौड़ी नीति तैयार की थी. इस नीति का नाम रखा गया था कोसी आपदाः पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण नीति. 22 दिसंबर 2008 को राज्य सरकार के योजना विभाग द्वारा तैयार इस नीति में बड़ी-बड़ी बातें की गयी हैं. इसके प्वाइंट 6 में उद्देश्यों का जिक्र करते हुए कहा गया है कि इसके तहत घरों का निर्माण, सामुदायिक सुविधाओं की उपलब्धता, इंफ्रास्ट्रक्चर की संपूर्ण स्थापना और आजीविका में मदद की जायेगी. आगे कहा गया कि
इस आपदा को हम एक मजबूत सामाजिक और आर्थिक वातावरण तैयार करने के मौके के रूप में देख रहे हैं.
प्रभावित क्षेत्र में निजी/सार्वजनिक संसाधनों का पुनर्वास और पुनर्निर्माण किया जायेगा
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क्षतिग्रस्त निजी/सार्वजनिक भवनों का समुचित तरीके से मरम्मत और पुनर्निर्माण किया जायेगा.
खेती, मत्स्य उद्योग, डेयरी उद्योग, लघु व्यवसाय और हस्तशिल्प के रूप में स्थानीय समुदाय को आजीविका उपलब्ध करायेंगे.
शिक्षा और स्वास्थ्य के तंत्रों का विकास और महिलाओं व कमजोर वर्गों के सशक्तीकरण पर विशेष ध्यान दिया जायेगा.
पंचायतों को क्रियान्वयन में भागीदारी दी जायेगी. प्वाइंट 8 के मुताबिक ये काम होने थे
गृह निर्माण
कचरे का निष्पादन
अस्थायी आश्रय का निर्माण
स्थायी घरों का निर्माण
सरकारी/निजी घरों की मरम्मत
आजीविका योजनाओं का चलाया जाना

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