Saturday, October 26, 2013

क्या अमर्त्य सेन के मॉडल पर काम कर रही है नीतीश सरकार ?


पिछले कुछ दिनों से देश में विकास के मॉडलों पर गंभीर चर्चाएं हो रही हैं. यह अच्छी बात है कि जो सवाल कल तक अतिबुद्धिजीवियों के बहस का मसला हते थे, उस पर चुनावी सभाओं में भी बातें होने लगी है. कहने को देश में विकास के दो मॉडल हैं एक भगवती मॉडल और दूसरा अमर्त्य सेन मॉडल. भगवती मॉडल जहां मानता है कि अगर व्यापार बढ़ा तो उसका लाभ निचले तबके तक पहुंच ही जायेगा, मगर अमर्त्य सेन मॉडल मानता है व्यापार बढ़ने से कई दफा पूंजी का ध्रुवीकरण होता है और गरीब और गरीब होते चले जाते हैं. इसलिए सरकार को चाहिये कि वंचित तबकों का विशेष ख्याल रखे.
हालांकि अगर इन दोनों मॉडल में से अगर एक मॉडल चुनने कहा जाये तो कोई भी समझदार व्यक्ति बिना सोचे अमर्त्य सेन के मॉडल को चुन सकता है. निश्चित तौर मेरी व्यक्तिगत पसंद भी वही है, इसके बावजूद इस बहस के कुछ मसले पर मेरी असहमतियां हैं.
1. बहस के दौरान माना गया है कि मोदी भगवती मॉडल के पैरोकार हैं और नीतीश अमर्त्य सेन मॉडल के. इस मान्यता का आधा हिस्सा तो सच है कि मोदी भगवती मॉडल के पैरोकार हैं, मगर दूसरा आधा हिस्सा पूरी तरह गलत हैं.
2. नीतीश ने अमर्त्य सेन को तो स्वीकार किया है, मगर उनके मॉडल को कतई स्वीकार नहीं किया है. इसे ऐसे समझ सकते हैं.
3. नीतीश जिसे सुशासन का नाम देते रहे हैं, उसकी तीन खूबियां. पहला- बेहतरीन सड़कें एवं अधोसंरचना का निर्माण, दूसरा- अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई, तीसरा सरकारी अस्पतालों में व्यवस्था का सुधार. इन तीन कामों के अलावा नीतीश के राज में कोई दूसरा बेहतर काम नजर नहीं आता.
4. पहला काम जो अधोसंरचना का निर्माण है वह विश्व बैंक की सहायता से हुआ है और अगर यह कोई मॉडल है तो मोदी-भगवती-चंद्रबाबू नायडू मॉडल ही है. इस काम ने अप्रत्यक्ष रूप से अपराध में कमी लाने में भी भूमिका निभायी है, क्योंकि सारे पूर्व अपराधी ठेकेदार बनकर सड़क-अस्पतालों के लिए भवन और पुल-पुलिये बनाने में व्यस्त हो गये हैं. उन्हें आपराधिक गतिविधियों के लिए फुरसत ही नहीं है.
5. दूसरा बड़े अपराधियों पर ठोस कार्रवाई का काम. यह काम नीतीश ने कल्याण सिंह मॉडल को अपनाते हुए सैप जवानों की मदद से किया है. मैं मानता हूं कि इस काम में कोई बुराई नहीं है. निगरानी और फास्ट ट्रैक अदालतों ने दिखावे के कुछ उदाहरण जरूर पेश किये हैं. मगर आम तौर पर इनकी कार्रवाइयां लोगों में भरोसा नहीं जगा पायी.
6. अस्पतालों की व्यवस्था में सुधार में एक पूर्व स्वास्थ्य मंत्री की बेहतरीन भूमिका रही है, मगर राजनीतिक कारणों से बाद में उन्हें हटा दिया गया.
अब यह जानना दिलचस्प होगा कि गरीबों के लिए नीतीश ने क्या किया.
1. विकास को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए सत्ता का विकेंद्रीकरण पहली शर्त है. मगर बिहार में पंचायतों की स्थिति बहुत बुरी है. मुखिया भ्रष्टाचार में डूबे हैं और पंचायती राज मुखिया से नीचे जा ही नहीं पाया है.
2. ग्रामसभाएं होती ही नहीं है, पंचायतों के जिम्मे कोई काम नहीं है. आज भी बीडीओ साहब ही गांव की व्यवस्था के लिए सर्वशक्तिमान हैं. उनकी इच्छा के बगैर गांव के एक व्यकित को सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल सकता.
3. इंदिरा आवास किसे मिले यह तय करने का अधिकार भी पंचायतों से छीन लिया गया है. सिर्फ इस बिना पर कि मुखिया रिश्वत लेते हैं. रिश्वत के नाम पर केंद्रीकृत व्यवस्थाएं थोपी जा रही हैं.
4. पंचायतों को अब तक पंचायत भवन भी नहीं मिले हैं. जबकि महज दो साल पहले पंचायती राज व्यवस्था को अपनाने वाले झारखंड के तीन चौथाई पंचायतों में पंचायत भवन काम करने लगे हैं.
5. बिहार के महज तीन जिलों में ई-गवर्नेंस योजना के तहत काम हो रहा है, जबकि पड़ोसी राज्य झारखंड में अब सारे जरूरी प्रमाणपत्र आवास, जन्म, मृत्यु आदि पंचायतों में ऑनलाइन बन रहे हैं.
6. मनरेगा को लागू करने का मसला इतना बुरा है कि मजदूर फिर से पंजाब-दिल्ली जाने लगे हैं. इसके बावजूद मनरेगा के तहत देश में सबसे कम मजदूरी बिहार में ही मिलती है.
7. आंगनबाड़ियों के पैसों से सीडीपीओ मोटी हो रही है और राज्य में आज भी हर पांच में से चार बच्चा कुपोषित है.
8. स्वास्थ्य बीमा के पैसों के लिए हजारों महिलाओं का यूटरस बेवजह निकाल लिया गया, मगर एक डॉक्टर को अब तक सजा नहीं हुई.
9. मुजफ्फरपुर में हर साल इन्सेफ्लाइटिंस से सैकड़ों बच्चे असमय काल कलवित हो जाते हैं.
10. कृषि कैबिनेट और कृषि का रोडमैप खूब बना, मगर किसानों को आजतक सिंचाई, खाद या बीज की सुविधा नहीं मिली. यह संभवतः अकेला ऐसा राज्य है जहां सिंचाई के लिए डीजल सब्सिडी दी जाती है. यानी खेती भी आबोहवा में जहर घोलने का अपराधी बनाया जा रहा है. वैसे, यह सब्सिडी राज्य के प्राइवेट बस चालकों के सिवा किसी को लाभ नहीं पहुंचाती.
11. ग्रीनपीस संस्था के साथ राज्य सरकार ने राज्य में एक हजार सोलर पंप बांटने की योजना बनायी थी, पता नहीं उसका क्या हुआ.
12. शिक्षा के मसले राज्य सरकार ने कुछ काम किये हैं, जैसे स्कूलों में साइकिल और ड्रेस बंटवाना. मगर किताबें समय पर मिल जाये इसकी कोई व्यवस्था नहीं हुई है.
13. सबसे रोचक तो यह है कि बिहार में अगर आपको पुलिस विभाग में भरती होना है तो आपको परीक्षा देनी होगी, मगर शिक्षक की नियुक्ति मार्कशीट देखकर ही हो जाती है.
14. संभवतः यही एक ऐसा राज्य होगा, जहां अपराधियों से ज्यादा लाठी शिक्षकों ने खायी है. अपने लिए सुविधाएं मांगते हुए. यह रोचक है कि जब रनबीर सेना का प्रमुख की मौत पर एक खास जाति के लोग पटना में हंगामा करते हैं तो पुलिस वीडियोग्राफी करती है, मगर जब शिक्षक प्रदर्शन करते हैं तो सीधी कार्रवाई का आदेश दे दिया जाता है.
15. यही एक ऐसा राज्य है जहां महादलित आयोग है मगर नरसंहार के एक भी मुकदमें में नीतीश राज्य में दलितों को न्याय नहीं मिला है.
16. सरकार भूमिसुधार के मसले पर मौन है.
17. कोसी महाप्रलय के नाम पर दुनिया भर से 9 हजार करोड़ की भीख बटोरने वाली इस सरकार ने अब तक सिर्फ दस हजार पीडित परिवारों का आधा-अधूरा पुनर्वास किया है. पता नहीं दो लाख पीड़ितों का पुनर्वास कब तक हो पायेगा.
18. कोसी के खेतों में आ भी बालू जमा है. आपदा के पांच साल बाद भी और सरकार के पास इसके लिए कोई योजना नहीं है.
19. जरूरतमंदों को अंत्योदय और अन्नपूर्णा योजना का अनाज छह-छह महीने नहीं मिलता है. इस बीच अगर किसी की मौत भूख से हो जाये तो सरकार तरह-तरह की बहानेबाजी करती है.
20. गरीबों का एक काम बगैर घूस दिये नहीं होता है. अगर बीपीएल कार्ड बनवाना हो तो भी पैसे मांगे जाते हैं. लिहाजा पैसे वाले ही मान्यता प्राप्त गरीब हो सकते हैं.
और, भी कई जानकारियां हैं, मगर मेरे हिसाब से इतनी जानकारियां तो यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि यह सरकार अमर्त्य सेन के मॉडल पर काम नहीं कर रही.

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