बाहर आयें और सड़कों पर अपना हक लें


पिछले दिनों सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट की महानिदेशक सुनीता नारायण उस वक्त दुर्घटनाग्रस्त हो गयी थीं, जब वे साइकिल से कहीं जा रही थीं. हादसा काफी गंभीर था मगर एम्स में चले लंबे इलाज के बाद वे फिर से स्वस्थ हो गयी हैं. पिछले दिनों अपने बिस्तर पर पड़े पड़े उन्होंने यह आलेख लिखा है. यह आलेख एक महत्वपूर्ण मसले को सामने ला रहा है. क्या सड़कें सिर्फ बसों, ट्रकों और कारों के लिए ही है. पदयात्रियों और साइकिल सवारों के लिए इसमें कोई जगह क्यों नहीं है. जबकि यही पदयात्री और साइकिल सवार हैं जो अपनी यात्राओं के कारण इस धरती के सेहत को सबसे कम नुकसान पहुंचाते हैं. उन्होंने पदयात्रियों और साइकिल सवारों के लिए सड़क पर अलग लेन की मांग की है और कारों की बढ़ती भीड़ पर लगाम लगाने का सुझाव दिया है. यह बहुत जरूरी कदम है, दिल्ली और मुम्बई ही नहीं बिहार और झारखंड के मझोले शहर भी इन दिनों चार पहिया गाड़ियों की भीड़ के कारण खस्ताहाल हैं. सड़कों पर ट्रैफिक रेंगता रहता है और प्रदूषण का स्तर इतना भीषण हो रहा है कि बाजार जाना यंत्रणा जैसा लगता है. इस महत्वपूर्ण आलेख का मैंने अनुवाद किया है ताकि हिंदी के पाठक भी इसे पढ़ सकें. यह आलेख डाउन टू अर्थ पत्रिका से साभार लिया जा रहा है.
सुनीता नारायण
इन दिनों जब मैं यह कॉलम लिख रही हूं, अपने बिस्तर पर पड़ी हूं और एक ऐसे एक्सीडेंट से उबरने की कोशिश कर रही हूं जिसने मेरी हड्डियां तोड़ दी हैं. मुझे एक कार ने तब टक्कर मार दी थी जब मैं साइकिल पर सवार होकर कहीं जा रही थी. टक्कर मार कर कार गायब हो गया और मैं सड़क पर लहूलुहान तड़पती रही. ऐसा देश के हर शहर की तकरीबन हर सड़क पर होता रहता है. क्योंकि हमारे यहां सड़कों पर पैदल यात्रियों और साइकिल सवारों की सुरक्षा की परवाह नहीं की जाती. ये लोग अदृश्य उपयोगकर्ता माने जाते हैं. ये लोग अक्सर बहुत मामूली सा काम करते हुए मर जाते हैं, जैसे सड़क पार करना. मैं खुशनसीब थी कि मेरे लिए दो कार रुके, अजनबियों ने मेरी मदद की और मुझे अस्पताल पहुंचाया. मेरा इलाज हुआ. अब मैं स्वस्थ होकर फिर से वापसी करूंगी.
और यह एक ऐसी जंग है जिस पर हम सभी को ध्यान देने की जरूरत है. हमें पैदल चलने और साइकिल चलाने के लिए जगह की जरूरत है और इस अधिकार को हम छोड़ नहीं सकते. जबसे मेरे साथ यह एक्सीडेंट हुआ मेरे रिश्तेदार और दोस्त मुझे लगातार इस बात के लिए फटकारते रहे हैं कि मैं दिल्ली की सड़कों पर इस तरह लापरवाह होकर साइकिल क्यों चला रही थी. वे लोग सही कह रहे हैं. यहां साइकिल सवारों और पदयात्रियों के लिए कोई अलग लेन नहीं है. सड़कों के बाद जो थोड़ी जगह बच जाती है उन पर या तो कूड़ों का कब्जा होता है या वहां भी कार ही पार्क कर दिये जाते हैं. सड़कें कार के लिए हैं. बांकी किसी का कोई महत्व नहीं है.
वैसे यहां साइकिल चलाना या पैदल चलना सिर्फ इसलिए कठिन नहीं है कि इसके लिए कोई योजना नहीं बनी है, बल्कि इसके पीछे हमारी उस मानसिकता का भी दोष है जो यह मानती है कि केवल कार पर चलने वालों का ही स्टेटस है और सड़कों पर उन्हीं का अधिकार है. जो साइकिल पर चलते हैं, गरीब हैं, दयनीय हैं और अगर मिट नहीं गये तो उन्हें अंततः हाशिये पर ही चले जाना है.
यही वह बात है जिसे बदलना होगा. हमारे पास कोई विकल्प नहीं है, सिवा इसके कि हम परिवहन के मसले को फिर से परिभाषित करें, जैसा मैं बार-बार कहती रहती हूं. इस हफ्ते दिल्ली की फिजा में जहरीले धुएं का साया और गहरा गया है. पिछले ही महीने विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वायु प्रदूषण को मानवीय कैंसर की संज्ञा दी थी. हमें हर हाल में समझना होगा कि प्रदूषण की किसी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. यह हमें मार रहा है, और यह प्रक्रिया अब धीमी नहीं रही है. अगर हम वायु प्रदूषण से मुकाबला करना चाहते हैं तो हमारे पास कार की बढ़ती संख्या पर लगाम लगाने के सिवा कोई दूसरा चारा नहीं है. हमें सीखना होगा कि कैसे लोग चलें कारें नहीं.
पिछली सदी के आखिरी दशक के मध्य में जब सेंटर फॉर साइन्स एंड ऐन्वायरमेंट ने वायु प्रदूषण के खिलाफ अपनी मुहिम की शुरुआत की थी, उसके प्रयास पूरी तरह पारंपरिक थे. उसने इंधन की गुणवत्ता बेहतर करने, वाहनों के प्रदूषण स्तर को बेहतर बनाने और जगह-जगह पर इसकी जांच करने जैसी प्रक्रियाओं पर जोर दिया. उसने कम्प्रेस्ड नेचुरल गैस(सीएनजी) का इस्तेमाल बसों और ऑटोरिक्शा के लिए किये जाने की पैरवी की. इसमें कोई शक नहीं है कि अगर ये कदम नहीं उठाये गये होते तो हालात और भी बदतर होते.
मगर ये उपाय पर्याप्त साबित नहीं हुए. बहुत जल्द हमने यह समझ लिया. प्रदूषण का स्तर फिर से बढ़ने लगा. सभी शोधों से एक ही कारण सामने आ रहा है और एक ही बड़ा समाधान दिख रहा है, वह है परिवहन तत्र को अलग तरीके से विकसित करना. हमारे पास ऐसा करने के विकल्प भी हैं. हमें और मोटराइज्ड होने, अधिक फ्लायओवर बनाने या फोर-लेन सड़क बनाने की कतई जरूरत नहीं है. भारत के कई शहरों में आज भी लोग बसों पर सफर करते हैं, पैदल और साइकिलों पर चलते हैं. ज्यादा से ज्यादा 20 फीसदी लोग ही बाइक पर चलते हैं. हम ऐसा करते हैं क्योंकि हम गरीब हैं. पर अब चुनौती यह है कि अमीर होने के बावजूद हम ऐसा करें और इसी तरह अपने शहरों की परिवहन व्यवस्था को लागू करें.
पिछले कुछ सालों से वस्तुतः हम यही करने की कोशिश कर रहे हैं- ताकि हमारे शहरों के लिए समेकित और सुरक्षित जन परिवहन विकल्प विकसित हो, इसलिए अगर हमारे पास कार हैं भी तो भी हमें इसे चलाने की जरूरत न पड़े. हम मेट्रो रेल विकसित कर सकते हैं या बसें खरीद सकते हैं, मगर जब तक इसकी कनेक्टिविटी अंतिम घर तक नहीं होगी यह कारगर नहीं होगा. इस व्यवस्था को सहज और सरल होना चाहिये. इसलिए मैं कहती हूं कि हमें अलग तरीके से सोचने की जरूरत है.
इस मसले पर हम विकल्पहीन साबित हो जाते हैं. आज परिवहन तंत्र की चर्चा हो रही है, जबकि हमें साइकिल सवारों और पदयात्रियों के लिए भी सोचने की जरूरत है. मगर यह खोखली बातें हैं. हर बार जब मौजूदा सड़क का एक हिस्सा लेकर उसे साइकिल ट्रैक में बदलने की कोशिश की जाती है, उसे भारी विरोध का सामना करना पड़ता है. तर्क दिये जाते हैं कि इससे कारों के लिए जगह की कमी हो जायेगी और जाम लगने लगेगा. मगर दरअसल हमें यही करने की जरूरत है, कारों के लेन की चौड़ाई घटायी जाये और बसों, साइकिलों और पदयात्रियों को अधिक जगह दी जाये. यह एकमात्र रास्ता है जिससे सड़कों से कारों की भीड़ को कम किया जा सकता है.
इसे लागू करने में हिम्मत की जरूरत है. हमारे भीड़ भरे और बेलगाम सड़कों पर साइकिल ट्रैक बनाने और फुटपाथ को साफ सुथरा रखने के लिए बड़ी मेहनत की जरूरत है. मुझे ऐसा भ्रम कतई नहीं है कि ऐसी योजना बनाना और उसे लागू करना आसान काम है. मगर हम क्यों इससे भयभीत होएं. बांकी दुनिया के मुल्कों ने इस बात को सफलतापूर्वक समझा है कि सड़कों पर साइकिलसवारों और पदयात्रियों के लिए अलग लेन देकर उन्हें सम्मानित करना अच्छी बात है. उन्होंने कारों को कम जगह देना स्वीकार किया है.
जरा उस डबल बोनस के बारे में भी सोचें. प्रदूषण का स्तर कम होने से शुद्ध हवा तो मिलेगी ही, साइकिल और पदयात्रा करने से व्यायाम भी होगा और हमारी सेहत भी सुधरेगी. यह वही लक्ष्य है हम जिसकी लड़ाई लड़ रहे हैं. और हम लड़ते रहेंगे. मुझे उम्मीद है कि इसमें आप सबों का साथ मिलेगा तो हम सुरक्षित साइकिल और पद यात्राओं का अधिकार हासिल कर सकेंगे.
पुनश्च- उन अजनबियों को बहुत-बहुत धन्यवाद जिन्होंने मुझे अस्पताल पहुंचाया और एम्स ट्रॉमा सेंटर के बेहतरीन डॉक्टरों का अपने जीवन के लिए मैं जिनकी अहसानमंद हूं.

Comments

Chitra Agrawal said…
मैंने भी कई बार नोटिस किया है कि कई सड़कों पर पैदलयात्रियों और साइकिल चालकों का जाना मना होता है। यह गलत है। सड़को पर साइकिल और पैदल यात्रियों के लिए एक लेन होनी ही चाहिए
पश्चिमी देशों खासकर जापान और फ़्रांस जैसे देशों में जब देखता हूं कि प्रधानंत्री और राष्ट्रपति तक सायकल के उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए उसका उपयोग करते हैं तो फ़िर भारत को इसमें झिझकने की जरूरत ही क्या है । आपसे शत प्रतिशत सहमत , कि अब ये हक लिया ही जाना चाहिए
सड़क पर जब भी सायकिल से चलता हूँ तो सतत डर लगा रहता है कि कोई भी परलोक वाहक मुझे परलोक यात्रा पर न भेज दे। सायकिल पर चलने वालों का कोई माई बाप नहीं है तथा वे कब चपेट में आ जाएं उसका भी पता नहीं।