Sunday, December 29, 2013

रांची में शेर गरजा, किसने देखा


हमारा शहर रांची महीने भर से शेर की दहाड़ सुनने का इंतजार कर रहा था. हर चौक-चौराहे पर मोदी होर्डिंगों में टंगे थे और गाड़ियों में पोस्टर फड़फड़ा रहे थे. हर तरफ शोर बरपा था कि मोदी आने वाला है और शेर गरजने वाला है. तकरीबन दो-तीन हफ्ते पहले जब सोनू निगम हमारे शहर आया था तो मुझे याद आ रहा है कुछ इसी तरह की मारा-मारी पास के लिए मची थी और उस कार्यक्रम में मैं जिस आटो पर सवार होकर गया था वह कह रहा था कि आज से ज्यादा मजा 29 को आयेगा, जब मोदीजी आयेंगे. रांची छोटा सा शहर है, अभी ठीक से महानगर भी नहीं हो पाया है. यह ठीक है कि धौनी जैसा सुपरस्टार रांची का ही रहने वाला है, मगर क्रिकेट मैच, फिल्म स्टार और बड़े नेताओं का क्रेज अभी भी इस शहर में बरकरार है. लालू जी ने चारा घोटाला में दोषी करार होने के बाद यहीं जेल में वक्त गुजारा और जब तक रहे जेल वालों के लिए परेशानी का सबब बनकर ही रहे. रोज होटवार जेल के आगे उन्हें देखने वालों की भीड़ उमड़ती थी. यहां तो मीका और राखी सावंत भी आ जायें तो दंगा होने की संभावना रहती है.
इस लिहाज से मन डरा-डरा रहता था कि मोदी के आने से कुछ घटना-वटना न हो जाये, पटना में जो कुछ हुआ उसकी छाप मन से उतरती नहीं थी. यह ठीक है कि भाजपा वालों ने सीठियो गांव के लोगों को ठीक से मैनेज कर लिया और उन्हें उर्दू में बुलावा भेजकर यह साबित करने की कोशिश की कि भाजपा मोदी के नेतृत्व में और खास तौर पर मोदी को क्लीन चिट मिलने के बाद किस तरह धर्म निरपेक्ष होती जा रही है. सीठियो वाले बेचारे अपने गांव पर से आतंक का दाग मिटाने के लिए रैली में पानी पिलाने के लिए भी तैयार हो गये.
हफ्ते भर से अखबारों में छप रहा था कि मंच ऐसा बनेगा, हैलीकॉप्टर ऐसे उतरेगा, मोदी इतनी देर रांची में ठहरेंगे और मंच पर फलां-फलां नेता बैठेंगे. कुल मिलाकर हवा ऐसी बंध गयी थी कि भाजपा के नेता ने आव न देखा ताव और घोषणा कर दी कि रैली में चार लाख लोग पहुंचेंगे. सवेरे-सवेरे मेरे कुछ रिश्तेदार रांची आने वाले थे, उन्हें मैंने यही सोचकर मना कर दिया कि 4 नहीं 3 लाख लोग भी आये तो गाड़ियों में इतनी भीड़ होगी कि उन्हें लटकने की जगह भी नहीं मिलेगी. मगर हाय रे इंतजाम, झारखंड के भाजपाइ बमुश्किल 60-70 हजार लोगों को ही जुटा पाये. हो सकता है बम-वम के डर से लोग अब मोदी की रैली में जाने से डरने लगे हों. हो सकता है झारखंडियों पर भी अरविंद केजरीवाल का नशा छाने लगा हो. मगर जो भी हो, रैली सामान्य ही थी. 5 रुपैया का टिकस लगाते तो तीन लाख टका ऊपर होता. स्टेज का खर्चा भी उपर नहीं हो पाता. वैसे झारखंड भले गरीब हो यहां की नेता-नगरी गरीब नहीं है, रैली का खर्चा तो अकेले झारखंड क्रिकेट एसोशियेसन के अध्यक्ष अमिताभ चौधरी ही उठा सकते थे, जो लंबे समय से भाजपा ज्वाइन करने के लिए प्रयासरत हैं और शहर के हर ऑटो पर नया चेहरा-नया विकल्प टाइप पोस्टर लगाकर अपनी ब्रांडिंग कर रहे हैं. नहीं तो अपने निशिकांत दुबे हैं ही. पैसे-वैसे का कोई मसला नहीं है झारखंड बीजेपी के पास. आठ-दस करोड़ तो छोटा-मोटा एमएले भी खर्च सकता है. मगर राजनाथजी और मोदीजी ने जो बड़ा टास्क इनके सिर पर डाल दिया है वह बहुत कठिन काम है. कहके गये हैं कि इस बार 14 की 14 सीट चाहिये. जबकि हकीकत यह है कि यहां जो सीट है वही बचा पाना मुश्किल है. खैर..
मोदी की रांची रैली को लेकर कई तरह की उत्सुकताएं मन में थीं, उम्मीद थी कि क्लीन चिट मिलने की खुशी जाहिर करेंगे और अरविंद केजरीवाल की निर्थकता का बखान करेंगे. मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. लगता है मोदी का स्क्रिप्ट राइटर एक साथ सारे लोकेशन के लिए स्क्रिप्ट लिखकर चला गया है और मोदीजी को वही पढ़ना पर रहा है. किसी भाषण में न आम आदमी पार्टी है और न ही नयी राजनीति का फलसफा. वही सोनिया, वही राहुल नये में सिर्फ राज्य की समस्या. अगर उस राज्य में अपनी सरकार है तो तारीफ करो और अपनी सरकार नहीं है तो कमियां गिनाओ.
13 साल का छत्तीसगढ़ भी था और किशोर होने पर अच्छे परवरिश के लिए रमन सिंह को जिताने की अपील की गयी थी. 13 साल का झारखंड भी है और बुरी परवरिश के लिए कांग्रेस को गलियाया गया. मोदी भूल गये कि यहां उनके ही अर्जुन मुंडा तीन बार यहां सीएम बन चुके हैं और एक बार बाबूलाल मरांडी ने उनकी पार्टी में रहते हुए सीएम का पद संभाला है, यहां आठ साल तक भाजपा ने ही शासन किया है. खैर, भाषण एक ऐसी कला है जिसमें लोग आपकी बात सुनने के लिए तैयार हैं तो तथ्यों की गलतियों का रिस्क लिया ही जा सकता है.
अमीर झारखंड के गरीब लोग और अधिक बारिश वाले झारखंड में जलसंकट जैसे झारखंड के सदाबहार मुद्दों पर उन्होंने खुल कर बोला और राहुल की आकाशवाणी का भी मजाक उड़ाया. बहरहाल पत्रकार साथियों ने कहा इस बार मोदी फीके-फीके नजर आ रहे थे. जवाब मे मैंने कहा कि हो सकता है कि क्लीन चिट मिलने के बाद उनकी हालत वैसी ही हो गयी हो, जैसे शेर की दांत तोड़ देने के बाद उसकी गुर्राहट का बुरा हाल हो जाता है. मोदी की दबंगई ही उनका यूएसपी है, क्लीन चिट मिलने के बाद वे जरूर राहत महसूस कर रहे होंगे मगर लोगों की नजर में उनका असर कम ही हुआ नजर आ रहा है.
परेश रावल वाली अंदाज में उसी आरोह-अवरोह में मोदी जी शहजादे की जगह आकाशवाणी और छत्तीसगढ़ के बदले झारखंड बोलते रहते. मगर बार-बार लग रहा था कि यह रिकार्ड घिसने लगा है. ठीक उसी तरह जैसे बचपन में मेरे एक भैया सुबह से शाम तक सलमान खान की फिल्म कुरबान का गाना तू जब-जब मुझको पुकारे सुनाते थे. पहले तो गांव के लोगों को वह गाना काफी पसंद आया मगर एक हफ्ते में ही लोगों ने कहा, बंद करो, एकै गाना कितना सुनाओगे.
ऐसे में यही कहूंगा कि मोदीजी कम गाइये, गाना बदल-बदलकर गाइये. बढिया रहेगा. वैसे तहलका वाले निरालाजी ने सुझाव दिया है कि जो संसद, लाल किला और पीएमओ बनवाना है अहमदाबाद में ही बनवा लीजिये. वहीं बदल-बदल कर भाषण दीजिये. अलग-अलग स्टेट के नेताओं को वहीं बुला लीजिये. काहे ऐतना परेशान होते हैं....

1 comment:

स्वप्न मञ्जूषा said...

ये एक ही सुर गा रहे हैं
और लोग उकता रहे हैं
लगे रहे 'तुम' 'हम ' की धुन में
'आप' अब आ रहे हैं