यूपीए 2004-2014 (चार स्टार-दो स्टार= दो स्टार)


अब जबकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तथाकथित तौर पर अपना अंतिम प्रेस वक्तव्य दे चुके हैं और अपने दो टर्म के शासनकाल का आकलन करने का जिम्मा उन्होंने इतिहासकारों के सिर पर डाल दिया है. अब जब यह लगभग तय है कि 2014 का चुनाव कांग्रेस के लिए जीत की सुबह लेकर आने वाला नहीं है और यह कि जैसी भूमिका उसे दिल्ली की सरकार में मिली है वह तकरीबन वैसी ही भूमिका केंद्र की सरकार में पाने के लिए मानसिक रूप से तैयार है. इस दौरान एक घोर कांग्रेस विरोधी पत्रकार के मन में यूपीए के इन दो सत्रों के शासन की समीक्षा लिखने का ख्याल जोर मारने लगा है.
इस कहानी को ठीक से समझने के लिए 2004 के उस चुनावी नतीजे को याद करना जरूरी है. कारगिल की तथाकथित जीत के बाद जब दिल्ली की सत्ता इंडिया शाइनिंग के जश्न में डूबी थी. आत्मविश्वास से लबालब एनडीए सरकार ने वक्त से काफी पहले चुनाव की घोषणा कर दी थी. समाचार माध्यमों ने मान लिया था कि यह सरकार दुबारा सत्ता में आ रही है. मगर उस दौर में कांग्रेस नीत गठबंधन ने एनडीए को कांटे की टक्कर दी और थोड़ी सी बढ़त हासिल कर वाम दलों के सहयोग से वह सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गयी. आज अगर उस जीत को हम परिभाषित करना चाहें तो उसे एक ही नाम दे सकते हैं. और वह है इंडिया के खिलाफ भारत की जीत. कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ का नारा देश को छू गया था. 1991 से 2004 तक चले बाजारवाद के दौर में एक बड़ी आबादी जो हाशिये पर चली गयी थी, उसने महसूस किया कि हमारी भागीदारी एक बार फिर सत्ता में हो गयी. उस जीत में आंध्र और विदर्भ के उन किसानों की व्यथा शामिल थी जो बाजारवादी दुष्चक्र में फंस कर खुदकुशी को मजबूर हो गये थे और सरकार और उन किसानों के बीच ऐसी खाई खुद गयी थी कि उसे पार करना लगभग नामुमकिन था. उस दौर में मुंबई की वह तसवीर देश का आइना बन गयी थी, जब ऊपर की होर्डिंग में बाथटब में गुलाब की पंखुरियों के बीच एक हीरोइन स्नान कर रही नजर आ रही थी और नीचे कचरे के ढेर से एक बच्चा अपने लिखा कोई चीज तलाश रहा था. उस असंभव, अकल्पित और हैरत में डाल देने वाली जीत का सेहरा निस्संदेह एक ही व्यक्ति के सिर पर बंधना था और बंधा भी. वे सोनिया गांधी थीं.
मगर 13 मई, 2004 की उस जीत के बाद के दिनों में जो कुछ घटा वह उससे कहीं अधिक अकल्पनीय था. 16 मई को सोनिया गांधी का यूपीए चेयरपरसन चुने जाने के बाद उनका खुद को पद से अलग रखने का फैसला किन दबाबों में हुआ इसका अंदाजा हम आज भी नहीं लगा सकते हैं. मैं कतई भावनाओं के उस लहर में बहने के लिए तैयार नहीं हूं जो उनके त्याग के किस्सों के बीच उमड़ा था और न ही मैं यह साफ तौर पर स्वीकार करने की स्थिति में हूं कि ऐसा विदेशी मुद्दे के दबाव में हुआ होगा. मगर वजह चाहे जो हो और जिन परिस्थितियों में हुआ हो, मगर कांग्रेस द्वारा सत्ता के दो ध्रुव गढ़े गये और आज हम पिछले दस सालों पर जब नजर डालते हैं तो इस दो ध्रुवीय शासन प्रणाली का असर साफ नजर आता है. आपको शायद याद हो कि कुछ महीने पहले दिग्विजय सिंह ने खुले तौर पर स्वीकार किया था कि 2004 में सत्ता के दो ध्रुवों के आधार पर शासन चलाने का जो फैसला लिया गया था वह नुकसानदेह साबित हुआ. और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जो अपने प्रेस कांफ्रेस में कहा उसे याद कीजिये कि सत्ता के दो ध्रुव होने में कोई परेशानी की बात नहीं है. हमें सोनियाजी और राहुलजी के सलाहों का हमेशा लाभ मिला है. इस आलेख को लिखे जाने के पीछे इस दो ध्रुवीय शासन प्रणाली को समझने की तीव्र इच्छा भी प्रेरक के रूप में काम करती रही है. क्योंकि हम देखते हैं कि जब राहुल और सोनिया यूपीए के शासन काल की उपलब्धियों का जिक्र करते हैं तो वे काम का अधिकार, सूचना का अधिकार, वनाधिकार, भोजन का अधिकार और भूमि अधिग्रहण कानून का उल्लेख करते हैं. मगर मनमोहन सिंह ने अपने प्रेस वार्ता में अपनी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि परमाणु करार को बताया, अगर उनसे दूसरी उपलब्धि के बारे में पूछा जाता तो संभवतः वे रिटेल सेक्टर में विनिवेश की स्वीकृति लेने को बताते. यूपीए सरकार के इस द्वंद्व की वजह क्या है? यह द्वंद्व क्यों है और क्या इस द्वंद्व के नतीजे न सिर्फ सरकार बल्कि देश के लिए भी घातक हुए?
यूपीए-1 की शुरुआत में ही सोनिया गांधी ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का गठन किया था. उस सलाहकार परिषद के जरिये इस देश को कई महत्वपूर्ण कानून मिले. जैसे सूचना का अधिकार, मनरेगा के जरिये काम का अधिकार, वनाधिकार कानून, शिक्षा का अधिकार और यूपीए-2 के जमाने में भोजन की गारंटी, भूमि अधिग्रहण कानून और चाहे जैसा भी हो मगर लोकपाल कानून. इन कानूनों की व्यवहारिकता और इसे लागू करने के तरीकों पर सवाल जरूर उठाये जा सकते हैं, मगर इसमें कोई संदेह नहीं है कि ये कानून उस आम आदमी को मजबूत करने की दिशा में इमानदारी से बनाये गये थे, जिसने 2004 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी सुनिश्चित की थी. वामदलों का कांग्रेस को बाहर से दिया गया समर्थन यूपीए-1 में एक नकेल का काम करता था, जो उन्हें जबरन पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्यवृद्धि और कॉरपोरेट को लूट की खुली छूट से रोकता था.
मगर मनमोहन सिंह आज जिसे अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि कहते हैं, यानी परमाणु करार. उसने यूपीए-1 के आखिरी सालों में इस गंठबंधन से उस शक्ति को बाहर का रास्ता दिखा दिया जो उसे आम आदमी से जुड़े रहने के लिए मजबूर करती थी. परमाणु करार का क्या महत्व है और इससे देश को क्या हासिल हुआ? आजतक इस करार से कितनी बिजली मिली है, कितने रिएक्टर लगे और देश की उर्जा तसवीर कैसे बदली यह कह पाना मुश्किल है. मगर उस साल 2008 में जब इस करार के कारण वामदलों से यूपीए का नाता टूटा, उसी साल टू-जी के स्पैक्ट्रम भी बांटे गये. 2008 यूपीए के लिए निर्णायक साल साबित हुआ. हालांकि नरेगा ने यूपीए की 2009 के चुनाव में जोरदार वापसी करा दी. मगर 2008 के बाद से जो यूपीए की राह बदली वह बदली ही रह गयी.
जब यूपीए को 2008 के पहले और 2008 के बाद के भागों में बांटकर देखते हैं तो हम महसूस कर सकते हैं कि बाद के सालों में कितनी तेजी से सरकार कॉरपोरेट कंपनियों के आगे नतमस्तक होती चली गयी. आम आदमी की पार्टी के नाम पर सरकार में आयी यूपीए के नेताओं के बर्ताव कैसे बदलते चले गये और कैसे यह गठबंधन जनता की बदनसीबी को 32 रुपये दिन और 5 रुपये टाइम के बीच तय करने लगा. कैसे योजना आयोग के दफ्तर का टायलेट 32 लाख में बनने लगा, कैसे कृषि मंत्री कहने लगे कि मैं कोई ज्योतिषी नहीं और पीएम कहने लगे मेरे हाथ में जादू की छड़ी नहीं है.
यह क्योंकर हुआ कि एक तरफ राहुल गांधी नियमगिरी के आदिवासियों को कहते थे कि फिक्र मत करो दिल्ली में तुम्हारा अपना आदमी बैठा है और चिदंबरम झारखंड-छत्तीसगढ़ और ओड़िशा के जंगलों में आपरेशन ग्रीन हंट चलाते थे. ऐसा क्यों होता रहा कि एक तरफ भोजन के अधिकार की गारंटी के कानून बनते रहे और दूसरी तरफ सिलेंडर का कोटा तय होता रहा. क्यों एक तरफ भूमि अधिग्रहण कानून बन रहा था और दूसरी तरफ नगड़ी, चुटका, सिवनी मालवा और नियमगिरी में जमीन पर हक के लिए लड़ाइयां लड़ी जा रही थी. क्यों एक तरफ लोकपाल कानून बन रहा था और राहुल गांधी भ्रष्टाचार को मिटाने की बात कर रहे थे और दूसरी तरफ महाराष्ट्र विधानसभा आदर्श घोटाले की जांच को खारिज करने में जुटी थी. यह द्वंद्व 2008 के बाद के यूपीए की पहचान है और परमाणु करार की देन है, जिसे माननीय मनमोहन सिंह की अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं. और कहीं न कहीं परमाणु करार की सबसे बड़ी उपलब्धि वाम दलों से यूपीए का छुटकारा और कॉरपोरेट को लूट की खुली छूट मिलना ही है.
आज जब दिग्विजय सिंह सत्ता के दो ध्रुव की शिकायत करते हैं तो उनका रोना इसी द्वंद्व की वजह से है. 2008 के बाद से केंद्र सरकार का एक धड़ा जहां लोककल्याणकारी कानून बनाने में जुटा है तो दूसरा धड़ा कॉरपोरेट को लाभ पहुंचाने की कोशिशें कर रहा है. दुर्भाग्यवश पहले धड़े में सरकार के बहुत कम मंत्री हैं, कांग्रेस के ज्यादातर मंत्री और समर्थक दलों के सभी मंत्री दूसरे धड़े में हैं. कांग्रेस में सोनिया को सुप्रीम पावर मानने का जो चलन है, वह संभवतः कहने-सुनने और दिखावा करने तक सीमित है. मंत्री सोनिया को जीत दिलाने की मशीन और उसके राष्ट्रीय सलाहकार परिषद को गेमचेंजर कानून गढने की फैक्टरी समझते रहे हैं.
इस बीच एक नये सिद्धांत को भी हवा दी जा रही है. वह यह कि उन तथाकथित गेमचेंजर कानूनों की वजह से देश की अर्थव्यवस्था का कचूमर निकला है और उसकी वजह से देश का विनिवेश रुक गया है. विकास दर में भारी गिरावट आयी है और रुपया लगातार लुढक रहा है. मनमोहन सोनिया की लोक कल्याणकारी योजनाओं के लिए कमाते-कमाते पस्त हो गये हैं. मगर यह एक अर्धसत्य है. मनरेगा जैसी लोक कल्याणकारी योजना के लिए बड़ा पैसा खर्च होता है. मगर यह पैसा किसी तरह से अर्थ व्यवस्था को नुकसान नहीं पहुंचाता. इन योजनाओं के जरिये गांवों तक जो बड़ा पैसा हाल के वर्षों में पहुंचा है उसने गांव की शक्ल बदल दी है और बाजार आज के दिन गांवों की तरफ ललचाई नजरों से देख रहा है. दूसरी बात, इन योजनाओं के क्रियान्वयन में जो लापरवाही बरती गयी और अरबों-खरबों रुपया गलत हाथों में चला गया, इसके लिए कानून या उसे बनाने वाले जिम्मेदार नहीं हैं. क्रियान्वयन कार्यपालिका की जिम्मेदारी है, मगर सरकारों ने ढीला-ढाला रवैया अपनाया और इसे कार्यकर्ताओं के जेब भरने की योजना बनाकर रख दिया. इसी वजह से गांवों में ठेकेदारों और बिचौलियों की जमात उठ खड़ी हुई है. मगर छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्यों में जहां क्रियान्वयन में सतर्कता बरती गयी वहां तसवीर बदली है. यह जरूर है कि मनरेगा में लोगों के स्वाबलंबन की बात नहीं उभरकर आती, वह लोगों को लाचार और पराश्रित बनाती है. मगर यह दूसरी बहस का विषय है.
तीसरी बात, जितना पैसा इन कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च होता है उससे कई गुना अधिक पैसा कॉरपोरेट कंपनियों को 2008 की मंदी के बहाने बेल-आउट पैकेज के रूप में या सब्सिडी के रूप में दिया गया. इसके अलावा टू-जी और कोल-ब्लॉक आवंटन में जो ढिलायी बरती गयी उससे इससे कई गुना बड़ी राशि जानबूझकर गंवाई गयी. कोल ब्लॉक आवंटन का खेल तो मनमोहन सिंह के दफ्तर से हुआ. वे भूल जाते हैं कि जब इतिहासकार आकलन करेगा तो ये तथ्य भी उसकी निगाह में आयेंगे.
आज कांग्रेस और यूपीए की पहचान एक महाभ्रष्ट और संवेदनहीन सरकार के तौर पर है जो महंगाई को बढ़ाती है और लोगों की तकलीफ का मजाक उड़ाती है. 2004 में आम लोगों का साथ देने के नारे की बदौलत बनी यूपीए का यह हश्र क्यों हुआ. और यह हश्र इस कदर हुआ कि आज आम आदमी का नारा भी एक नये दल ने उससे छीन लिया है. छवि और क्रियाकलाप दोनों तौर पर यूपीए के इस पतन का जिम्मेदार कौन है, कभी इसका भी आकलन होगा. और चुनावी नारों के शोर में दबे उन लोक कल्याणकारी कानूनों की भारत के गांवों को देन की भी कभी चर्चा होगी. साथ ही यह भी उल्लेख किया जायेगा कि इस दस साल के शासन का अंत उस सूचना का अधिकार कानून की वजह से हुआ जिसे इसी सरकार ने बनाया था. इसी कानून ने यूपीए सरकार के सारे घोटलाओं की पोल खोली. इस आलेख के शीर्षक में जो मैंने चार स्टार जोड़े हैं और दो घटाये हैं, वह आप तय कर सकते हैं कि चार स्टार किसके लिए हैं और दो किसके खाते से निकले हैं.

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