सिर्फ हंगामा खड़ा करना कोई मकसद नहीं


पता नहीं यह इस देश की नियति है या हम जैसे लोगों की विडंबना, पिछले दो-ढाई सालों से हम उम्मीद और निराशा के सी-शॉ के बीच झूल रहे हैं. .. और हमारी इस दुविधा की वजह वह आंदोलन है, जो कभी तो लगता है कि देश की तमाम राजनीतिक विसंगतियों को बदलकर रख देगा और कभी अपनी ही कमजोरियों पर परदा डालने के चक्कर में ऐसी हरकतें करने लगता है कि हम उसे विध्वंसवादी मानने पर मजबूर हो जाते हैं. इस आंदोलन की वजह से अस्तित्व में आयी आम आदमी पार्टी की वजह से पिछले दो दिनों से अराजक नामक शब्द मीडिया में चक्कर खा रहा है और यह शब्द उस इंसान ने उछाला है, जिस पर महज कुछ ही दिनों पहले पूरा देश यह उम्मीद बांध बैठा था कि यह देश की राजनीतिक विसंगतियों का इलाज कर देगा. वैसे तो अराजक होना इतना बुरा भी नहीं है, हमारा देश तो चार्वाक के दर्शन को भी स्वीकारता है. .. और हिंदी के सबसे विद्रोही कवि राजकमल चौधरी ने भी अपनी सबसे महत्वपूर्ण कृति मुक्ति प्रसंग की आखिरी पंक्तियों में लिखा है ..
इंसान को गांजाखोर साधुओं की दुनिया में चला जाना चाहिये
सड़ी-गली लाशों को खाना कहीं श्रेयस्कर है
बनिस्पत अपने ही पड़ोसियों को जिंदा खा जाने के
मगर इसी कवि ने अपने सबसे प्रसिद्ध उपन्यास मछली मरी हुई में यह भी लिखा है कि असामान्य होना कोई मुश्किल काम नहीं है, मुश्किल है सामान्य और सहज होना. दारू की एक बोतल पीकर इंसान असहज और असामान्य हो सकता है, मगर सामान्य और सहज होने के लिए बड़े आत्म नियंत्रण की जरूरत है. अब जबकि आम आदमी पार्टी महज एक महीने में सचिवालयों से ऊबकर सड़कों पर उतर आयी है यह बात और शिद्दत से समझ आती है. वही धरना, वही नारेबाजी, शोर-शराबा, विरोधियों को गालियां यह सब जैसे आम आदमी पार्टी नामक इस प्रवृत्ति का कंफर्ट जोन हो. दुख तो यह है कि लोग इसे लोकतंत्र भी करार देते हैं. सिर्फ विरोध और प्रदर्शन पूरा लोकतंत्र कैसे हो सकता है. लोकतंत्र में बदलाव का जितना महत्व है रचनात्मक निर्माण का उससे अधिक महत्व. सड़कों पर उतरकर बदलाव की मांग करना आम जनता और विपक्षियों के हथियार हैं, जबकि एक बार आप सरकार का हिस्सा बन जाते हैं तो आपको संवैधानिक संस्थाओं के जरिये बदलाव की प्रक्रिया चलानी पड़ती है.
यह ठीक है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं है और तकनीकी कारणों से पुलिस प्रशासन राज्य सरकार के जिम्मे नहीं है. मगर यह कोई अनहोनी बात नहीं है. इस पर बहस हो सकता है कि आदर्श व्यवस्था क्या होनी चाहिये. मगर यह अंतिम सत्य नहीं है कि दिल्ली पुलिस का नियंत्रण वहां की राज्य सरकार के हाथों में ही हो. आज भी देश के जिलों में सामान्य प्रशासन का जिम्मा आइएएस अधिकारी संभालते हैं और पुलिस प्रशासन आइपीएस अधिकारी. दोनों की सत्ता अलग होती है और दोनों एक दूसरे के नियंत्रण से बाहर होते हैं. फिर भी शासन-प्रशासन काम करता है. आपसी सामंजस्य से चीजें चलती हैं. ऐसा नहीं है कि दिल्ली पुलिस देश की सबसे वाहियात पुलिस है और आम आदमी पार्टी से पहले देश में किसी ने आदर्श का नाम ही नहीं सुना था. कई इमानदार अधिकारी जिलों में भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों से साथ काम करते रहे होंगे, मगर आज तक कोई ऐसी मिसाल नहीं सुनी कि एक आइएएस अधिकारी किसी आइपीएस अधिकारी के खिलाफ धरने पर बैठ गया हो. दोनों के बीच अगर सामंजस्य न हो तो फिर दोनों अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का ठीक से वहन करते हैं और एक दूसरे के मामले में ज्यादा हस्तक्षेप नहीं करते. वैसे ही लोग दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में अरविंद केजरीवाल से यह अपेक्षा करते हैं कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए दिल्ली की जनता को बेहतर जीवन सुविधा उपलब्ध कराने का प्रयास करें. दो काम उनके दायरे से बाहर हैं उनके बारे में न सोचें. यह जिनका जिम्मा है उन्हें ही करने दें.
दरअसल जिस तरह से इस आंदोलन की कुछ प्रवृत्तियों ने इस देश की राजनीति में सकारात्मक बदलाव की राहें खोली उसी तरह इस आंदोलन की कुछ गलत प्रवृत्तियां हैं जो इसे आगे बढ़ने से रोक रही हैं और इसे पतन की ओर ले जा रही हैं. इसमें सबसे बड़ी वजह है, इनके लोगों में रचनात्मकता का अभाव.
1. रचनात्मकता का अभाव- इस दल के लोगों रचनात्मक कार्य करने की प्रवृत्ति का घोर अभाव है. ये लोग सरकार में आ चुके हैं और ऐसे में इनका काम है सकारात्मक बदलाव लाना. रैन बसेरों की स्थिति को सुधारने के जरिये इन लोगों ने इसकी शुरुआत तो की मगर फिर राखी बिड़लान और सोमनाथ भारती जैसे मंत्रियों ने सरकार का फोकस रचनात्मक प्रक्रियाओं से हटा दिया.
2. हड़बड़ी और दो नाव की सवारी- दरअसल आम आदमी पार्टी हड़बड़ी में है. अब उसके आगे लोकसभा चुनाव का लक्ष्य है. इस वजह से वह सरकार चलाने पर फोकस कम कर रही है और अपना सारा फोकस लोक सभा चुनाव लड़ने पर कर रही है. पार्टी के पास इतने सक्रिय लोग नहीं हैं कि दोनों काम अलग-अलग किया जा सके. साथ ही वह यह भी नहीं समझ रही है कि दिल्ली सरकार की विफलता अगले चुनाव में उसके गले की घंटी साबित होगी.
3. व्यक्तिवाद- आम आदमी पार्टी का दावा मौजूदा राजनीति के रंग-ढंग बदलने का है मगर वह भी दूसरे दलों की तरह व्यक्तिवाद के फेर में फंस गयी है. वह अरविंद के वन मैन शो के भरोसे में है. इसी वजह से दिल्ली के सीएम भी वही बनते हैं और आंदोलन में भी उन्हें ही उतारा जाता है और पीएम कैंडिडेट के रूप में भी उन्हें ही प्रोजेक्ट किया जाता है. बेहतर तो होता कि मनीष या किसी और को दिल्ली का जिम्मा दिया जाता और अरविंद को राष्ट्रीय राजनीति के लिए फ्री रखा जाता. मगर ऐसा हुआ नहीं.
4. मीडिया का मोह- शुरुआत से ही यह आंदोलन मीडिया के मोह में फंसी है. टीवी कैमरे के बिना यह आंदोलन भी नहीं कर सकती और जैसे ही कैमरे का फोकस इनसे हटता है ये इंसिक्योर हो जाते हैं. बहुत संभव है यह ताजा आंदोलन उसी इंसिक्योरिटी का नतीजा हो. काश इनका आंदोलन गांव की गलियों और कस्बों तक भी पहुंच पाता.
5. कल्चर ऑफ डिनायल- सबसे दुखद तो यह है कि गांधीवाद के तौर तरीके से उभरा यह आंदोलन खुद गांधी की प्रवृत्तियों को अपना नहीं पाया है. ये लोग अपनी ही गलतियों को स्वीकार नहीं करते और उसके खिलाफ तर्क गढ़ने लगते हैं. जबकि उचित यही था कि वे अपनी गलतियों को स्वीकार करते और उसमें सुधार करने का प्रयास करते.

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