उनका क्या, जिन तक आज भी नहीं पहुंचा है आरक्षण


सोशल मीडिया के जमाने का चलन है कि बड़े लोग मुद्दों को उछालते हैं और छोटे लोग उस पर बहस करते हैं. उसी परंपरा का निर्वाह करते हुए वरिष्ठ कांग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी ने जो आरक्षण पर बहस छेड़ी है उस पर हम उस पर बहस करने के लिए तैयार हो गये हैं. होना भी चाहिये, हो सकता है खुद जनार्दन द्विवेदी के लिए यह मामला उतना गंभीर नहीं रहा होगा, मगर गांव गिरांव के हम जैसे लोगों के लिए यह मसला साधारण नहीं है. माननीय महोदय के द्वारा उपलब्ध कराये गये इस मौके का हम बहस करने के लिए इस्तेमाल जरूर करेंगे और कोशिश करेंगे कि इस बहस का कोई सार्थक नतीजा सामने आये.
अभी कुछ ही दिन पहले मैं अपने गांव धमदाहा गया था एक पारिवारिक उत्सव में भागीदारी करने के लिए. उस दौरान बचपन के एक सहपाठी से मुलाकात हुई. सहपाठी पिछड़ी जाति से संबंधित था और ऑटो चलाया करता था. हम उसी की ऑटो से गाड़ी पकड़ने पूर्णिया जा रहे थे. दोस्त से पारिवारिक मसले पर बातें होने लगी. मुङो याद आया कि मेरा वह मित्र पढ़ने लिखने में ठीक-ठाक था, मुझे आश्चर्य हुआ कि पढ़ाई-लिखाई में औसत से बेहतर होने के बावजूद उसे आरक्षण का लाभ क्यों नहीं मिला. उसने बताया कि उसकी आर्थिक क्षमता पटना में रहकर कोचिंग करने की नहीं थी, लिहाजा उसे आरक्षण वर्ग में रहने के बावजूद आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाया. वह काफी बिफरा हुआ था. उसका कहना था कि आरक्षण का मसला सिर्फ अमीर और सामथ्र्यवान पिछड़ों और दलितों का है. वह कह रहा था - तुम देखो अपने गांव में किसको-किसको आरक्षण का लाभ मिला है? ये वही लोग हैं जिनके पास पहले से काफी जमीन थी. जिनके परिवार में नौकरी करने वाले लोग पहले से थे. यादवों और कुरमियों को छोड़कर किसी और जाति को आरक्षण का लाभ मिला है क्या, देख कर बताओ. वह कह रहा था कि यादवों में भी कई उपजातियां हैं, जो गरीब हैं, दूध बेचती हैं और कुछ और छोटा-मोटा धंधा करती हैं, उनके बच्चे आज क्या कर रहे हैं? कोई मेरी तरह टैंपो चला रहा है, तो कोई किसी छोटे-मोटे डॉक्टर के क्लीनिक में कंपाउंडर है. कई लोग तो हलवाही ही कर रहे हैं. उसने कहा कि देखो अपने यहां धानुख जाति भी ओबीसी है. उसके कितने लोग सरकारी नौकरी में हैं. एक भी नहीं हैं. आरक्षण ने हम लोगों को क्या दिया? सिर्फ बदनामी कि हमलोग आरक्षण श्रेणी में हैं.
दोस्त की बातों ने मेरी आंखें खोल दीं. अगड़ी जाति समूह का होने के बावजूद मंडल आंदोलन के वक्त मैंने पिछड़ों के आरक्षण का समर्थन किया था और यह समर्थन अभी भी जारी है. मगर उक्त जिन पिछड़ों के हालात बदलने का हमने सपना देखा था, वे लोग तो आज भी वहीं हैं. उसी मोड़ पर. पिछड़ों में उन्हीं लोगों को आरक्षण का लाभ मिला है जिनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति कमोबेस हमलोगों जैसी ही है. पटना में जब हम पढ़ाई करते थे तो वे भी हमारी तरह ही पढ़ाई करते थे. एक जैसे कमरों में रहते थे, एक जैसे कोचिंग में पढ़ते थे और उनके घर से भी उतना ही पैसा आता था जितना हमारे घर से. बांकी, जो लोग हमारे खेतों में बटेदारी करते थे और हैं, जो नाई, बढ़ई और कुम्हार का काम करते थे. जो हल चलाते थे और जो मछली पकड़ते थे. उनके बच्चे क्या कर रहे हैं? वे आज भी अपने मां-बाप के पेशे को ही आगे बढ़ा रहे हैं, अगर बदले भी तो सिर्फ इतना कि कुछ लोगों ने चाय-पान की दुकान खोल ली, तो कोई रिक्शा-टैंपो चलाने लगा. अधिकतर लोग दिल्ली-पंजाब जाने लगे हैं. आखिर इन लोगों को आरक्षण का लाभ क्यों नहीं मिला. जबकि हम देखे हैं कि आरक्षित श्रेणी वाले कई परिवारों में एक ही घर में दस-दस लोग सरकारी नौकरी में हैं. हमनें क्या उन्हीं के लिए आरक्षण के जरिये हालात बदलने का सपना देखा था?
इन हालातों को देखकर मैं जनार्दन द्विवेदी को सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि अभी आरक्षण को आर्थिक आधार पर करने का वक्त नहीं आया है. मगर आरक्षित समूह की आंतरिक संरचना को समझने और उसकी विसंगतियों को दूर करने का वक्त जरूर है. कमोबेस यही हालात एससी-एसटी वर्ग का है. कुछ जातियां, कुछ परिवार इसका लाभ लेकर सामान्य श्रेणी के लोगों को टक्कर देने लायक हो गये हैं, मगर बड़ी आबादी आज भी हाशिये पर है. जाति जनगणना के सामने आने के बाद ऐसे कई तथ्य सामने आयेंगे कि आरक्षण का लाभ कहां तक पहुंचा और किस तरह के लोग आज भी डार्क एरिया में हैं? मगर यह समझना सबसे जरूरी है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ, क्यों विसंगतियों को दूर करने के लिए बनी इस नीति ने समाज में विसंगतियों को घटाने के बदले बढ़ा दिया है. क्योंकि पिछड़ों में सिर्फ कुरमी-यादव और दलितों में सिर्फ पासवान जाति के लोगों को इस आरक्षण नीति का लाभ मिला, शेष दसियों जाति हाशिये पर ही छूट गयीं. बेहतर आर्थिक स्थिति की वजह से कैसे पूरी आरक्षण व्यवस्था को कुछ जातियों ने हाई-जैक कर लिया.
इसकी सबसे बड़ी वजह है कि हमारे देश की राजनीति ने आरक्षण को बहसों से परे बना दिया है. जैसे ही आरक्षण का मसला उठता है कि कई लोगों की भावनाएं आहत होने लगती हैं. बहस बहस नहीं रह जाती, वह सिर-फुटौव्वल में बदल जाती है. हम एक सुर में कहते हैं कि समाज के एक बड़े तबके के साथ हजारो सालों से अन्याय हुआ है, उसका प्रतिकार आरक्षण के जरिये ही हो सकता है, इसलिए इस पर कोई बहस नहीं की जा सकती. मगर क्या इसकी सफलता-असफलता पर विचार भी नहीं किया जा सकता. सरकार अपनी तमाम योजनाओं के प्रभाव का आकलन किसी बाहरी एजेंसी से करवाती रही है. अगर उसने हर दस साल में ही आरक्षण की सफलता-असफलता का आकलन कराया होता तो ये घाव पहले ही नजर आ जाते और इसका समाधान निकाला जा सकता था. मगर आरक्षण को राजनीतिक तौर पर ऐसा नंगा तार मान लिया गया है, जिसे छूना मौत को दावत देना है.
इसका नतीजा यही निकलता है कि इस नीति का सारा लाभ कुछ समृद्ध जातियों ने हासिल कर लिया है और पिछड़े और पिछड़ गये हैं. वे हताश हैं, अपनी स्थितियों से समझौता करने के लिए मजबूर हैं. सरकार सोचती है कि उसने आरक्षण की सुविधा देकर उनके लिए सारा इंतजाम कर दिया है.
इस लिहाज से देखें तो सबसे बड़ी जरूरत यह है कि आरक्षण की सफलता-असफलता का आकलन कराया जाये. यह पता लगाने की कोशिश की जाये कि किन जातियों को आरक्षण से बहुत कम या नहीं के बराबर लाभ मिला. इसके बाद समीक्षा करके ऐसी नीति बनायी जाये कि इस व्यवस्था का लाभ हर वंचित समुदाय के लोगों को मिले और आरक्षण की व्यवस्था का जो सामाजिक न्याय का सपना था वह ठीक से पूरा हो. अलग-अलग जातियों के लिए जगह निर्धारित करके भी यह विवाद खत्म किया जा सकता है. इसके अलावा यह भी सोचा जा सकता है कि किन जातियों-उपजातियों ने इस व्यवस्था का समुचित लाभ ले लिया है और उन्हें इस व्यवस्था से बाहर जाने की जरूरत है. कई जातियां जो तमाम पिछड़ा समुदाय की पैरोकारी करती हैं, वे वालिंटियरली खुद को इस व्यवस्था से बाहर कर उदाहरण पेश कर सकती हैं, ताकि अत्यंत पिछड़ी जातियों को अधिक लाभ मिल सके. कई जातियों के लिए तय किया जा सकता है कि अगर वे बीपीएल श्रेणी में हों तभी उन्हें आरक्षण का लाभ मिले.
जहां तक गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की बात है, मैं आज भी इसके खिलाफ हूं. आरक्षण गरीबी उन्मूलन की व्यवस्था नहीं है, यह सामाजिक न्याय है. सदियों से जिन जातियों को पिछड़ा रखने का अन्याय किया गया, उन्हें न्याय देना है. सवर्णो ने हमेशा प्रिविलेज का लाभ उठाया है, वे अगर गरीब हैं तो अपनी कमजोरी की वजह से. उन्हें किसी ने गरीब होने के लिए मजबूर नहीं किया. उनके लिए दूसरी कई योजनाएं हैं, उन्हें उसका लाभ लेना चाहिये. गरीब सवर्णो को आरक्षण देने की मांग एक पॉलिटिकल स्टंट से अधिक कुछ भी नहीं.
नोट- इस पोस्ट में दिखायी गयी तसवीरें खगड़िया के गुलरिया गांव की है. इस गांव में आज भी एक व्यक्ति सरकारी नौकरी में नहीं जा सका है, जबकि पूरा गांव महादलितों का है. इन्हें आरक्षण का लाभ क्यों न मिल पाता इसके पड़ताल की भी जरूरत है.

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